नवजात बच्ची को 35 हज़ार रुपये में क्यों बेचना पड़ा मां-बाप को?

    • Author, सुब्रत कुमार पति
    • पदनाम, ओडिशा के भद्रक से बीबीसी न्यूज़ हिन्दी के लिए

ओडिशा के भद्रक ज़िले में एक नवजात बच्ची को बेचने का मामला सामने आया है. यह घटना ज़िले के भंडारीपोखरी थाने के अंतर्गत बयांबनापुर गांव की है.

बच्ची की मां रंजीता नायक ने मीडिया से बातचीत में यह स्वीकार किया है कि 80 हज़ार रुपये का क़र्ज़ चुकाने के लिए उन्होंने अपने एक रिश्तेदार को 35 हज़ार रुपये के लिए बच्ची को बेच दिया था.

रंजीता के मुताबिक़, उन्होंने अपने पति सीपू दास के साथ मिलकर यह फ़ैसला लिया था.

दरअसल, बच्ची को बेचे जाने की आशंका सबसे पहले बच्ची की दादी को हुई और उन्होंने इस बारे में 13 जनवरी को भंडारीपोखरी थाने में मामला दर्ज कराया, जिसके बाद बच्ची को कटक के राजाबगीचा इलाक़े से 14 जनवरी को रेस्क्यू किया गया.

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बच्ची को रंजीता नायक के एक रिश्तेदार के घर से बरामद किया गया. बच्ची को फ़िलहाल बाल कल्याण समिति की निगरानी में रखा गया है. समय से पहले जन्म लेने और वज़न कम होने के कारण बच्ची को इलाज की ज़रूरत है.

पुलिस ने गिरफ़्तार करने के बाद छोड़ा

बाल कल्याण समिति अध्यक्ष सुब्रत कुमार बिश्वाल ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी को बताया, "शिशु की हालत स्थिर है. भद्रक ज़िला हेडक्वार्टर हॉस्पिटल में उसका इलाज चल रहा है. बच्ची की मां उसके साथ है."

सुब्रत कुमार बिश्वाल ने कहा, "क़ानूनी प्रक्रिया के तहत आगे बच्ची की देख-रेख कैसे की जाएगी, वह तय किया जा रहा है. बाल कल्याण समिति आगे यह तय करेगी कि जुवेनाइल जस्टिस एक्ट के तहत बच्ची के माता-पिता के ख़िलाफ़ क्या एक्शन लिया जाएगा."

वहीं, भद्रक के पुलिस अधीक्षक मनोज कुमार राउत ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी को बताया, "बच्ची को बेचे जाने की घटना में पुलिस ने बच्ची के माता-पिता के अलावा मध्यस्थ का काम करने वाली बच्ची की नानी रम्भावती नायक और बच्ची को ख़रीदने वाली शांति नायक के ख़िलाफ़ एक्शन लिया है."

ज़िला पुलिस ने इन चार लोगों को गिरफ़्तार किया है और भारतीय न्याय संहिता की धारा 35 के अंतर्गत सभी अभियुक्तों के ख़िलाफ़ मामला दर्ज किया है. भारतीय न्याय संहिता की धारा 35 में निजी शरीर और संपत्ति की सुरक्षा से जुड़े प्रावधान हैं.

ज़िला पुलिस अधीक्षक के मुताबिक़, प्राथमिक जांच से पता चला है कि शांति नायक किसी दूसरे को इस बच्ची को देने वाली थीं. पुलिस जांच जारी है. प्रमाण मिलने पर मामले से जुड़े और कुछ लोगों के ख़िलाफ़ भी पुलिस एक्शन लिया जा सकता है.

इस मामले में पुलिस ने इन चार लोगों को पहले तो गिरफ़्तार किया था और बाद में उन्हें इस शर्त पर छोड़ा कि वो जांच में सहयोग करेंगे और इसके लिए ज़रूरी पड़ने पर जब भी उन्हें थाने बुलाया जाएगा, वो आएंगे और शहर छोड़कर नहीं जाएंगे

ये मामला कैसे सामने आया?

यह मामला बच्ची की दादी सावित्री दास की ओर से एफ़आईआर कराने के बाद सार्वजनिक हुआ. सावित्री दास ने अपनी शिकायत में आरोप लगाया था कि उनके बेटे और बहू नवजात बेटी को घर से बाहर लेकर गए और उसके बाद बच्ची को वापस लेकर नहीं आए.

सावित्री दास ने बताया, "मैं खेत में काम करने गई थी. खेत से धान काटकर शाम को घर वापस आई तो मैंने बहू से पूछा कि बच्चा किधर है. फिर बहू ने मुझे गाली देना शुरू कर दिया. उसने कहा कि वो 'अपने बच्चे के साथ कुछ भी करे या बेचे, उनका क्या मतलब.' इस पर मुझे संदेह हुआ तो मैंने थाने में एफ़आईआर दर्ज कराई."

इस बारे में सावित्री दास ने बेटे सीपू दास से भी बातचीत की, लेकिन जब उन्हें कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिला तो उन्होंने 13 जनवरी को स्थानीय भंडारीपोखरी पुलिस थाने से संपर्क किया. शिकायत मिलने के बाद पुलिस, चाइल्ड लाइन और बाल संरक्षण इकाइयों ने संयुक्त रूप से मामले की जांच शुरू की.

कैसी है परिवार की स्थिति?

दरअसल यह पूरा मामला ओडिशा के ग्रामीण इलाक़े के उस परिवार की बेबसी की भी कहानी है जो काफ़ी ग़रीबी में जीवनयापन करने को मजबूर हैं.

अनुसूचित जाति से ताल्लुक रखने वाली बच्ची की मां रंजीता नायक ने बीबीसी को बताया, "परिवार की आर्थिक स्थिति सही नहीं है. पति कोई रोज़गार नहीं करते. सास कभी-कभार मज़दूरी करने जाती हैं. 20 प्रतिशत मासिक के ब्याज की दर पर 80 हज़ार का कर्ज़ा लिया था. पैसे लौटाने के लिए यह करना पड़ा."

हालांकि, दूसरी ओर सावित्री दास ने बताया है, "मेरे बेटे से शादी होने से पहले भी बहू की शादी हुई थी. पहली शादी से भी बच्चे हैं, वो उनको पैसे भेजती है. दोनों ने हमारे खेतों को बंधक रखकर जो पैसा लिया था, वो सब ख़र्च कर दिया है."

सावित्री दास के इन आरोपों की बीबीसी स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं कर सका है. वहीं दूसरी ओर सीपू दास से कोई संपर्क नहीं हो पाया है.

घर कैसे चलता है? यह सवाल पूछे जाने पर सावित्री दास कहती हैं, "घर चलाने के लिए मैं ख़ुद मेहनत करती हूं. मज़दूरी करती हूं. सरकार मुफ्त चावल देती है और थोड़ी पेंशन भी. उसी से घर चलता है."

भद्रक के ज़िलाधिकारी दिलीप राउत्रे ने इस मामले में बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा है, "पुलिस ने मामले का पता चलते ही तेज़ी से अपना काम किया है. मां और बच्ची को भद्रक डिस्ट्रिक्ट हेडक्वार्टर हॉस्पिटल में रखा गया है. मामले की जांच जारी है."

मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने जताई चिंता

ओडिशा में ऐसी घटनाओं को लेकर मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने चिंता जताई है. मानवाधिकार कार्यकर्ता नसीम अंसारी ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा, "भद्रक की घटना शर्मनाक और दर्दनाक है. भद्रक में मां-बाप ने अपनी बच्ची को 35 हज़ार में बेच दिया है. लेकिन हमें मूल समस्या के ऊपर ध्यान देना होगा. उन्होंने अपने कर्ज़ चुकाने के लिए यह किया."

नसीम अंसारी ने कहा, "कोई मां-बाप खुशी से अपने बच्चों को बेचता नहीं है. यह उपहार की चीज़ नहीं है जो किसी को दे दे. भारत में हर साल 40 हज़ार बच्चे गुमशुदा होते हैं या उनका अपहरण होता है. ओडिशा इसमें कम नहीं है. ओडिशा में एक के बाद एक ऐसी घटनाएं घटती रहती हैं. सरकार का यह दायित्व है कि वह मूल समस्या के ऊपर ध्यान दे."

स्टेट जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड की पूर्व सदस्य नम्रता चड्ढा कहती हैं, "ओडिशा में लगातार बच्चों की बिक्री की ख़बर सुर्खियों में आती हैं. ज़्यादातर समय ग़रीब परिवार बच्चों की सही देखभाल नहीं कर पाते इसलिए बेहतर आर्थिक स्थिति वाले परिवार को बच्चा दे देते हैं, जो कानूनी तौर पर सही नहीं है."

उनका कहना है, "ओडिशा में लीगल एडॉप्शन प्रोसेस काफ़ी कॉम्प्लिकेटेड है. अगर गोद लेने की प्रक्रिया सरल हो तो शायद इस तरह की घटनाएं देखने को नहीं मिलेंगी. इसके अलावा सरकार को ग़रीब लोगों की आर्थिक स्थिति को बेहतर बनाने और सरकारी सुविधाओं को लोगों तक सही से पहुंचाने की भी ज़रूरत है. इससे ग़रीबी की वजह से किसी को अपना बच्चा बेचने की नौबत नहीं आएगी."

दरअसल ओडिशा में इस तरह की घटनाएं पहले भी ख़बरों में रही हैं. ज़्यादातर मामलों में ये देखा गया है कि बच्चियों को ही उन्होंने किसी को दिया है.

तीन महीने पहले भद्रक के ही बासुदेवपुर ब्लॉक में पांच दिन की एक बच्ची को बेचे जाने की ख़बर आई थी. मामले को लेकर गांव के लोगों ने बाल कल्याण समिति में शिकायत दर्ज की थी.

पिछले साल रायगढ़ा के एक परिवार ने अपनी नौ दिन की बच्ची को आंध्र प्रदेश के एक परिवार को बेच दिया था. बाद में उसे रेस्क्यू किया गया और ओडिशा वापस लाया गया. इस मामले में बाल कल्याण समिति के पांच कर्मचारियों को सस्पेंड भी किया गया था.

पांच महीने पहले इस तरह का और एक मामला टिटलागढ़ के बागडेर गांव में सामने आया था. 20 हज़ार रुपये के लिए एक बच्ची को बेचे जाने की ख़बर आई थी. ग़रीबी के कारण एक व्यक्ति और उनके परिवार ने ऐसा किया था.

नवंबर 2024 में बलांगीर के खपराखोल में एक आशा कर्मी ने परिवार द्वारा एक बच्ची को बेचे जाने का मामला प्रकाश में लाया था. बाद में लाठोर थाने में इसे लेकर मामला भी दर्ज हुआ था.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.