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'क्रिकेट में वोट भी हैं, नोट भी', पाकिस्तान से ब्लॉग
- Author, मुहम्मद हनीफ़
- पदनाम, पत्रकार और लेखक
हमारा इलाक़ा, जिसे आम तौर पर पाक-ओ-हिंद और सबकॉन्टिनेंट कहा जाता है, वहां कई धर्म हैं.
हिंदू धर्म में आपको हर तरह के हिंदू मिल जाएंगे, ईसाइयों के अनगिनत गोत्र हैं और सिख समुदाय में भी आपको हर तरह के सिख भाई मिल जाएंगे. अगर कहीं चार मुसलमान बैठ जाएं, तो बात बहस से शुरू होकर मरने मारने तक आ जाएगी कि सही मुसलमान कौन है.
अंग्रेज़ यहां आए और अपने पीछे कई कमियां छोड़ गए, लेकिन वे हमें एक नया धर्म भी दे गए, जिसका नाम है - क्रिकेट.
यह हिंदुस्तान और पाकिस्तान और फिर पाकिस्तान, बांग्लादेश बन गया. बॉर्डर बदल गए लेकिन क्रिकेट के धर्म की पूजा करने वालों के अपने ही बॉर्डर हैं, उनके अपने कौमी तराने हैं, अपने रीति-रिवाज हैं और यहां तक कि उनकी तारीखें भी अपनी हैं.
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यदि सच पूछो तो क्रिकेट वालों ने जन्नत-दोज़ख (स्वर्ग और नर्क) भी अपना ही बनाया हुआ है.
कोई पाकिस्तान के शहर ल्यारी में पैदा होता है, इंडिया उसने सिर्फ़ फ़िल्मों में देखा है. वह इंडिया को दुश्मन भी मानता है, लेकिन साथ ही उसने अपने कमरे में पोस्टर विराट कोहली का लगा रखा है.
और दूसरी तरफ, एक व्यक्ति जो कलकत्ता में पैदा हुआ और अपनी पूरी ज़िंदगी वहीं बिताई, वह भी यूट्यूब पर जाकर वसीम अकरम की गेंदों के पुराने वीडियो स्लो मोशन में देख कर मज़े लेता है.
'खुद खेलो और खुद ही देखो'
इंडिया में दुनिया का सबसे बड़ा और महंगा क्रिकेट मेला लगता है - आईपीएल.
दुनिया भर से खिलाडियों की बोलियां लगती हैं. हर जगह विज्ञापनों की चकाचौंध दिखाई देती है. हज़ारों करोड़ों का एक सीज़न लगता है और पूरी दुनिया घर बैठे इसका मज़ा लेती है.
पहले इसमें पाकिस्तानी खिलाड़ी होते थे, लेकिन उन्हें हटा दिया गया. फिर वसीम अकरम किसी टीम के कोच थे, उन्हें भी निकाल दिया गया. बांग्लादेशी खिलाड़ी खेलते थे. इस बार सिर्फ़ एक प्लेयर था - मुस्तफ़िज़ुर रहमान. बांग्लादेश में दंगे हुए. एक गरीब हिंदू मारा गया.
बीसीसीआई ने कहा कि बांग्लादेश के खिलाड़ी को आईपीएल से बाहर करो. शाहरुख खान की टीम थी - कलकत्ता नाइट राइडर्स. उन्होंने तुरंत निकाल दिया.
आगे से बांग्लादेश ने कहा है कि अब जो टी20 वर्ल्ड कप आने वाला है , उसके मैच हम इंडिया में नहीं खेलेंगे. हमारे मैच अब श्रीलंका में करवाएं. यहां तक तो ठीक था. पाकिस्तान और भारत के मैच लंबे समय से अगर हुए भी हैं तो वे सिर्फ़ दुबई या फिर विदेश में ही होते हैं.
कभी-कभी तो ऐसा भी होता है कि खेलना ही नहीं , अगर खेल लिया है तो हाथ नहीं मिलाना. लेकिन अब बांग्लादेश ने कहा है कि हम आईपीएल के मैच अपने देश में दिखाने भी नहीं देंगे. खुद खेलो और खुद ही देखो.
पुरानी आदतें जल्दी नहीं जातीं
बॉर्डर हमने धर्म के नाम पर बनाए थे , लेकिन मोहल्ला तो हमसे नहीं बदला गया.
किसी दुश्मनी वाले मोहल्ले में बड़े-बुज़ुर्ग कहते थे कि तुम फलां के लड़कों के साथ मत खेलना, वे हमारे दुश्मन हैं. लेकिन लोग छतों पर चढ़कर फिर भी मैच देख लेते थे.
बात शुरू यहां से हुई कि हम फलां देश के खिलाड़ी को खेलने नहीं देंगे. फिर इंटरनेशनल टूर्नामेंटस में खेलना तो पड़ेगा, लेकिन आपके देश में नहीं खेलना, कहीं और खेलेंगे.
अब बात यहां तक आ गई है कि न तो खेलने देंगें , न ही खेलेंगे और न ही किसी को देखने देंगे.
धर्म का खेल खेलने वालों को पता है कि इसमें वोट भी है और नोट भी.
और क्यों न हम क्रिकेट के धर्म को भी वैसे ही ख़त्म करें जैसे हम हिंदुस्तान , मुसलमान, सिख, ईसाई वाला बंटवारा करके हमेशा से जीतते आए हैं.
अब जब आप क्रिकेट मैच देखें तो याद रखें कि यहां वोट खेले जा रहे हैं, यहां नोट खेले जा रहे हैं. क्रिकेट का बहाना अच्छा है, क्योंकि पुरानी आदतें जल्दी नहीं जातीं.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.