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'हमारा कैलेंडर आज भी गोरों के हिसाब से चलता है': हनीफ़ का व्लॉग
- Author, मोहम्मद हनीफ़
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार और लेखक
"नया साल शुरू हो गया है, मुबारक़ तो बनती है, लेकिन साथ ही यह भी ख़्याल आता है कि यह नया साल गोरों का शुरू हुआ है. यह कैलेंडर हमें गोरों ने दिया था.
हमारे अपने देसी लोगों का, पंजाबियों का भी एक कैलेंडर है जो अपने लोकल मौसम के हिसाब से बनाया गया था. उनका नया साल अभी चैत्र में शुरू होना है.
गोरों को यहां से गए हुए क़रीब 80 साल होने वाले हैं, लेकिन हमारे यहां कैलेंडर उनका ही चलता है. साथ ही बॉर्डर के नाम पर जो खूनी लाइनें वे खींच कर गए थे वे आज भी ना सिर्फ बरक़रार हैं, बल्कि पहले से भी ज़्यादा खूनी हो गई हैं.
यह जो साल बीता है उसमें पूरे साल जंग का माहौल बना रहा. चार-पांच दिन जंग भी चली, प्लेन गिराए गए, मिसाइलें दागी गईं. फिर सात समंदर पार बैठे एक और गोरे डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि उसने फ़ोन करके हमारा सीज़फ़ायर करवाया.
उसके बाद भारत कहता है कि हमने जंग जीत ली है. वहीं पाकिस्तान कहता है 'हमने नाको चने चबा दिए' हैं.
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'अफ़ग़ानिस्तान भी नाराज़'
जंग जीतने की खुशी में पाकिस्तान को एक फ़ील्ड मार्शल मिल गया और इंडिया ने जंग जीत कर फ़िल्म धुरंधर बना ली है. अब दोनों अपने-अपने घरों में खुश हैं.
जो खूनी लाइन गोरा खींच कर गया था उस पर अब बिजली की करंट की तारें हैं और ऊपर से ड्रोन उड़ते हैं.
भारत और पाकिस्तान ने एक-दूसरे को हराया. तो वहीं हमारे पड़ोस में एक और देश है अफ़ग़ानिस्तान. वह पूरी दुनिया को हरा चुका है. एक बार नहीं बल्कि दो बार.
पाकिस्तान के साथ उसका बहुत भाईचारा था. लोग भी आते-जाते थे और इधर का सामान उधर और उधर का सामान इधर भी आसानी से आता-जाता था.
अब वे भी हमसे नाराज़ हैं. उस बॉर्डर पर भी अब सिर्फ़ मिसाइल और रॉकेट ही आ-जा सकते हैं.
गेहूं और अनार की फसलें हम अपने घरों में रख कर खराब कर रहे हैं. सीमाओं के भीतर अपनी-अपनी अवाम को बंद करके और डराकर हमारे शासक खुश हैं.
अगर कोई शिकायत करता है कि हमारे दाल-रोटी के ख़र्चे पूरे नहीं होते या आप हमें आज़ादी से सांस नहीं लेने देते, तो वे हमसे कह देते हैं कि हमारा शुक्रिया अदा करो कि हमने तुम्हें तुम्हारे पड़ोसी दुश्मन से बचा लिया है.
ट्रंप का दावा
यहां से बहुत दूर बैठा अमरीका का सदर (राष्ट्रपति) ट्रंप अब भी जब मुंह खोलता है तो यही कहता है कि भारत और पाकिस्तान में डेढ़ अरब लोग रहते हैं और वे सब एक-दूसरे को मारने को तैयार थे और उन्हें सिर्फ़ 'मैंने ही बचा लिया है'.
गोरों की बातें और गोरों का नया साल मुबारक़ तो है ही लेकिन हमारे यहां जो देसी कैलेंडर है, उसमें भी 12 महीने होते हैं. वारिस शाह से लेकर बाबा फ़रीद तक, हमारे सभी महान कवियों ने इन मौसमों पर कविताएं लिखी हैं, जिन्हें बाराहमा कहा जाता है. जिसमें उन्होंने अपने मौसमों के हर महीने के दु:ख-सुख का वर्णन किया है.
गोरे लोगों का दिसंबर और जनवरी चल रहा है और हमारा यह पौष का महीना है. पंजाबी के महान कवि मौलवी गुलाम रसूल पौष महीने के बारे में कुछ इस तरह बताते हैं-
"पोह पाला पिया कमाल होइया थर थर काम्बे जान वेचारी हो
कुञ्ज वांग पुकारदी रात सारी , लगी हिजर दी सख्त बीमारी हो
बाग़ उजड़िया ते पत्र चढ़ गए बुलबुल क़ैद दे विच दुखारी हो
गुलाम रसूल की आखे माली तईं हुन मिट गयी सब अयारी हो"
"हैपी न्यू ईयर"
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.