सोमालिया के पूर्व राष्ट्रपति के शव के साथ ख़ुफ़िया उड़ान भरने का जोखिम भरा मिशन

    • Author, बुशरा मोहामेद
    • पदनाम, बीबीसी वर्ल्ड सर्विस

9 जनवरी 1995 की तारीख थी. कीनिया के दो पायलट राजधानी नैरोबी के पास विल्सन हवाई अड्डे पर अपने दफ्तर में थे.

तभी एक अनजान व्यक्ति वहां आया. उसने दोनों पायलटों से एक पूर्व राष्ट्रपति के शव को एक देश से दूसरे देश ले जाने के लिए कहा.

काम जोखिम भरा था, क्योंकि शव सोमालिया पर शासन कर चुके सियाद बर्रे का था, जिन्हें अपने ही देश से निर्वासित किया जा चुका था. जो शख्स उनके शव को ले जाने की गुज़ारिश लेकर आया था, वह नाइजीरिया का एक राजनयिक था.

ब्लू बर्ड एविएशन नाम की कंपनी चलाने वाले दो पायलट हुसैन मोहम्मद अंशूर और मोहम्मद आदन ऐसे आग्रह को सुनकर हैरान रह गए थे.

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अंशूर पहले कीनिया वायु सेना में कैप्टन थे. उन्होंने करीब 31 साल बाद पहली बार इस घटना के बारे में मीडिया से बात की है.

अंशूर ने बीबीसी को बताया, "राजनयिक ने हमसे कहा कि एक विमान किराए पर लें. फिर गुप्त तरीके से शव को नाइजीरिया के शहर लागोस से सोमालिया के गरबहारेय ले जाएं. गरबहारेय सियाद बर्रे का पैतृक गांव है. यह अफ़्रीका के दूसरी तरफ़ था, जिसकी दूरी करीब 4300 किलोमीटर थी."

पूर्व राष्ट्रपति का शव ले जाने में क्या जोख़िम था?

दरअसल, सियाद बर्रे को 28 जनवरी 1991 में विद्रोही गुटों ने सोमालिया की सत्ता से हटा दिया था. तब वह देश छोड़कर भाग गए थे.

2 जनवरी 1995 को उनकी नाइजीरिया में मौत हो गई थी. उनके शव को वापस उनके ही देश ले जाना राजनीतिक रूप से बहुत जोखिम भरा था. कई सरकारें नाराज़ हो सकती थीं और कूटनीतिक विवाद की आशंका भी गहरी हो सकती थी.

अंशूर ने बताया कि अगर कीनिया को पता लग जाता कि सोमालिया के पूर्व राष्ट्रपति का शव ले जाया जा रहा है, तो बड़ी मुश्किल हो जाती. खासकर, कीनिया के तत्कालीन राष्ट्रपति डेनियल अराप मोई की सरकार को पता चलने पर ख़तरा और बढ़ जाता.

दरअसल, सियाद बर्रे ने 1969 में बिना खून बहाए तख़्तापलट कर सत्ता हासिल की थी. उनके समर्थक उन्हें पूरे अफ़्रीका के नेता के तौर पर देखते थे, जो दक्षिण अफ़्रीका में नस्ली भेदभाव की मुख़ालफ़त करते थे.

हालांकि, आलोचक उन्हें तानाशाह कहते थे. विरोधियों का कहना था कि बर्रे के शासन के दौरान मानव अधिकारों का खूब उल्लंघन हुआ था.

गुप्त तरीके से क्यों ले जाया जा रहा था शव?

जब बर्रे का तख़्तापलट हुआ, तब वह पहले कीनिया भागे. इसके बाद यहां की संसद और राइट्स ग्रुप्स के दबाव में मोई सरकार घिर गई.

इसके बाद बर्रे को नाइजीरिया में शरण मिली. उस वक्त नाइजीरिया में जनरल इब्राहिम बबंगीदा का सैन्य शासन चल रहा था. लेकिन नाइजीरिया के लागोस में रहते हुए बर्रे की डायबिटीज़ की बीमारी से मौत हो गई.

यह एक ख़तरनाक मिशन था, इसलिए पायलटों ने राजनयिक से एक दिन का सोचने का समय मांगा. पैसों का ऑफर अच्छा था, लेकिन काम में ख़तरा बहुत ज़्यादा था.

अंशूर कहते हैं, "हमने राजनयिक को पहले यह सलाह दी कि वे नाइजीरिया वायु सेना का विमान इस्तेमाल करें, लेकिन उन्होंने मना कर दिया. हमने कहा कि यह काम बहुत नाज़ुक है और कीनिया सरकार को इस बारे में पता नहीं लगना चाहिए."

सोमालिया के पूर्व शासक सियाद बर्रे के बेटे ने भी इस मामले में पहली बार मीडिया से बातचीत की.

अयानले मोहम्मद सियाद बर्रे ने बीबीसी को बताया कि ऐसा कुछ भी गैरकानूनी नहीं था, जिसे छिपाने के लिए गुप्त तरीका अपनाया जा रहा था.

इस्लाम में जल्द से जल्द दफनाने का नियम है, इसलिए सामान्य काग़ज़ी कार्रवाई टाल दी गई. कुछ सरकारों को योजना के बारे में पता था. लेकिन वक्त हमारे ख़िलाफ़ था. सारे काग़ज़ात पूरे करने में लग जाते, तो शव को दफनाने में देरी हो जाती.

इन्हीं दो पायलटों को क्यों चुना गया?

नाइजीरिया के अधिकारियों ने बताया कि गरबहारेय की जिस हवाई पट्टी पर विमान को उतरना था, वह सैन्य विमान के लिहाज़ से बहुत छोटी है. बर्रे के बेटे ने कहा कि इसी वजह से ब्लू बर्ड एविएशन से संपर्क किया गया.

10 जनवरी 1995 को पायलटों ने राजनयिक को इस काम के लिए हामी भर दी. अंशूर ने बताया, "यह फ़ैसला आसान नहीं था, लेकिन हमें लगा कि यह ज़िम्मेदारी निभानी चाहिए."

दोनों पायलटों की बातचीत नाइजीरिया के राजनयिक से ही हुई थी. सीधे तौर पर बर्रे परिवार से कोई संपर्क नहीं हुआ था. हालांकि, इससे पहले दोनों पायलटों ने एक बार बर्रे परिवार तक मदद पहुंचाई थी.

दरअसल, जब बर्रे और उनका परिवार मोगादिशु से भागे थे, तो वे गरबहारेय वाले इलाके के बुरदुबो शहर पहुंचे थे. उस समय पायलटों ने परिवार के लिए खाना, दवा और ज़रूरी सामान पहुंचाया था.

बहरहाल, शव ले जाने के लिए पायलटों ने नाइजीरिया सरकार से गारंटी मांगी कि अगर राजनीतिक रूप से कुछ ग़लत होता है, तो नाइजीरिया ज़िम्मेदारी लेगा.

इस तरह तय किया हवाई सफ़र

11 जनवरी को सुबह करीब 3 बजे उनका छोटा विमान 'बीचक्राफ्ट किंग एयर B200' विल्सन हवाई अड्डे से उड़ा. उन्होंने काग़ज़ों में लिखा कि वे पश्चिमी कीनिया के झील किनारे शहर किसुमु जा रहे हैं, ताकि किसी को उनके मिशन के बारे में पता न लगे.

अंशूर ने बताया, "यह सिर्फ़ काग़ज़ पर था. किसुमु के पास पहुंचकर हमने रडार बंद कर दिया और युगांडा के एंटेबे की तरफ़ मुड़ गए."

उस दौरान इलाके में रडार कवरेज कम था. पायलटों ने इस कमज़ोरी का फ़ायदा उठाया. एंटेबे पहुंचकर उन्होंने हवाई अड्डे के कर्मचारियों को बताया कि वे किसुमु से आए हैं.

विमान में मौजूद दो नाइजीरियाई अधिकारी चुप रहे और बाहर भी नहीं उतरे. विमान में ईंधन भरवाया गया और बताया गया कि अगला पड़ाव कैमरून का याउंडे है, जहां नाइजीरियाई राजनयिक मदद के लिए इंतज़ार कर रहे थे.

थोड़ी देर वहां रुकने के बाद विमान लागोस पहुंचा. नाइजीरियाई हवाई क्षेत्र में घुसने से पहले ही वहां की सरकार ने पायलटों से कहा था कि वे नाइजीरियाई वायु सेना का कॉल साइन 'डब्ल्यू टी 001' इस्तेमाल करें, ताकि शक न हो.

11 जनवरी को दोपहर करीब एक बजे वे लागोस पहुंचे. वहां बर्रे का परिवार इंतज़ार कर रहा था.

अब पायलटों का आख़िरी पड़ाव शव को गरबहारेय ले जाना था. 12 जनवरी 1995 को लकड़ी का ताबूत विमान में रखा गया.

विमान में दो नाइजीरियाई अधिकारी और परिवार के छह लोग सवार हुए. इनमें बर्रे के बेटे भी थे.

अंशूर ने बताया, "कैमरून, युगांडा या कीनिया के हवाई अड्डों पर हमने यह नहीं बताया कि हम शव ले जा रहे हैं. विमान वापस उसी रास्ते से गया. याउंडे में थोड़ा रुका, फिर एंटेबे में ईंधन भरवाया."

उन्होंने युगांडाई अधिकारियों को बताया कि वे किसुमु जा रहे हैं. किसुमु के पास पहुंचकर वे सीधे गरबहारेय चले गए. यहां पहुंचकर ताबूत उतारा गया और दोनों पायलट दफन किए जाने की रस्म में शामिल हुए.

जब लगा कि पकड़े जाएंगे

इसके बाद पायलट और दोनों नाइजीरियाई अधिकारी विल्सन हवाई अड्डे वापस आए.

अंशूर ने बताया, "हमें लग रहा था कि यहीं पकड़े जाएंगे."

लेकिन विल्सन एयर ट्रैफ़िक कंट्रोल को सहज तरीके से बताया गया कि वे उत्तर-पूर्वी कीनिया के मंदेरा से आ रहे हैं. इससे यही प्रतीत हुआ कि यह कोई लोकल उड़ान है.

अंशूर ने आगे कहा, "किसी ने सवाल नहीं किया. तब जाकर हमें लगा कि हम सुरक्षित हैं."

इस तरह यह मिशन पूरा हो गया. अंशूर ने बताया कि हमें बाद में एहसास हुआ कि हमने असल में क्या किया है.

जब पायलट अंशूर से पूछा गया कि क्या वे अब ऐसा कर सकते हैं.

इस पर उन्होंने जवाब दिया, "अब मैं 65 साल का हो गया हूं और नहीं करूंगा. आज हवाई तकनीक इतनी आगे बढ़ गई है कि अफ़्रीका में रडार कवरेज पूरा हो गया है. 1995 वाली कमज़ोरियों का अब फ़ायदा उठाना नामुमकिन है."

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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