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समुद्रगुप्त: 'भारत के नेपोलियन' जिनके राज में चलते थे सिर्फ़ सोने के सिक्के
- Author, रेहान फ़ज़ल
- पदनाम, बीबीसी हिंदी
जब चंद्रगुप्त प्रथम बूढ़े हो चले तो उन्होंने राजपाट छोड़कर शासन की ज़िम्मेदारी अपने बेटे समुद्रगुप्त को सौंप दी. समुद्रगुप्त चंद्रगुप्त प्रथम के सबसे बड़े बेटे नहीं थे.
समुद्रगुप्त एक योग्य उत्तराधिकारी साबित हुए. अपनी निष्ठा, न्यायप्रियता और वीरता से उन्होंने अपने पिता का दिल जीत लिया.
समुद्रगुप्त के चंद्रगुप्त का उत्तराधिकारी बनने का जीवंत वर्णन इलाहाबाद के स्तंभ शिलालेख में मिलता है, "चंद्रगुप्त प्रथम ने अपने बेटे समुद्रगुप्त को यह कहते हुए गले लगा लिया कि तुम एक महान आत्मा हो. जब चंद्रगुप्त ये शब्द कह रहे थे तो कोमल भावनाओं से उनके शरीर के सारे बाल खड़े हो गए थे."
"जैसे ही ये घोषणा हुई कुछ दरबारी हर्ष से फूले नहीं समाए लेकिन कुछ लोगों के चेहरे उतर गए. चंद्रगुप्त प्रथम ने आँसू भरी आँखों से समुद्रगुप्त की ओर देखते हुए कहा कि अब दुनिया की रक्षा की ज़िम्मेदारी तुम्हारी है."
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हालांकि समुद्रगुप्त के उत्तराधिकारी चुने जाने के बारे में कोई संदेह नहीं है लेकिन कुछ आधुनिक इतिहासकारों का मानना है कि समुद्रगुप्त को राजा बनने के लिए सत्ता के कुछ दूसरे दावेदारों से संघर्ष करना पड़ा था.
संघर्ष के बाद मिली थी समुद्रगुप्त को सत्ता
इन दावेदारों में सबसे पहला नाम काच का आता है जो चंद्रगुप्त प्रथम का सबसे बड़ा बेटा था. कुछ समय के लिए काच ने गद्दी भी संभाली थी क्योंकि उसके नाम के स्वर्ण सिक्के पाए गए हैं. काच के अस्तित्व पर इतिहासकारों में एक राय नहीं है.
केपी जायसवाल अपनी किताब 'इंपीरियल हिस्ट्री ऑफ़ इंडिया' में लिखते हैं कि काच समुद्रगुप्त के विद्रोही भाई भष्म का ही दूसरा नाम है. परमेश्वरी लाल गुप्ता, श्री रामगोयल और लालता प्रसाद पांडे का भी मानना है कि काच और भष्म एक ही व्यक्ति के नाम हैं. भष्म ने समुद्रगुप्त के विरुद्ध गुप्तवंश के सिंहासन को प्राप्त करने के लिए युद्ध किया था.
कुछ हल्कों में कहा जाता है कि समुद्रगुप्त किसी व्यक्ति का नाम नहीं बल्कि एक उपाधि है.
राधाकुमुद मुखर्जी अपनी किताब 'द गुप्ता एमपायर' में लिखते हैं, "इस उपाधि का अर्थ ये है कि समुद्र उसकी रक्षा करता है जिसका साम्राज्य समुद्र के तट तक फैला हुआ है. मथुरा में चंद्रगुप्त द्वितीय के शिलालेख में दर्ज भी है कि समुद्रगुप्त की प्रसिद्धि चार समुद्रों तक फैली हुई थी."
कवि के साथ पराक्रमी भी
ऐसा माना जाता है कि समुद्रगुप्त का जन्म सन 318 में हुआ था. पांच वर्ष की आयु के बाद उन्हें लिपि और गणित की प्रारंभिक शिक्षा दी गई थी. प्रारंभिक शिक्षा के बाद उन्हें शासन और नीति की शिक्षा दी गई.
इलाहाबाद के शिलालेख से पता चलता है कि समुद्रगुप्त कई शास्त्रों का ज्ञाता थे. काव्य कला में वह ख़ास तौर पर दक्ष थे इसलिए उसे 'कविराज' की उपाधि दी गई थी. उनके दरबार में हरिषेण और वासुबंधु जैसी विख्यात साहित्यिक हस्तियां मौजूद थीं.
इस वजह से समुद्रगुप्त को साहित्य का बड़ा संरक्षक माना जाता है. कई सिक्कों पर उन्हें वीणा बजाते हुए दिखाया गया है. वह अपने पराक्रम के लिए भी विख्यात था.
इलाहाबाद के शिलालेख में लिखा है, 'समुद्रगुप्त का शरीर 'परशु' यानी फरसे, 'शर' यानी बाण, 'शंकु' यानी भाला, 'शक्ति' यानी बर्छी, 'असि' यानी तलवार , 'तोमर' यानी गदा जैसे अस्त्रों के सैकड़ों घावों से सौभाग्यवान और अति सुंदर हो गया था.'
समुद्रगुप्त को असाधारण क्षमताओं वाला व्यक्ति माना जाता है जिसमें एक साथ योद्धा, शासक, कवि, संगीतज्ञ और परोपकारी के गुण थे.
समुद्रगुप्त के मन में शुरू से ही भारत को एक राजनीतिक सूत्र में बांधने और उसे अपने अधिकार में लाने की ज़बरदस्त महत्वाकांक्षा थी जिसके लिए उन्होंने जीवन भर प्रयास किया.
उत्तर और दक्षिण के राजाओं के प्रति अलग-अलग नीति
उत्तरी भारत के नौ राज्यों पर जीत दर्ज करने में समुद्रगुप्त ने दूरदृष्टि का सहारा लिया. उत्तरी भारत के नौ राजाओं के प्रति उनके तेवर कठोर थे.
उन्होंने अपनी सैन्य श्रेष्ठता के बल पर उनके राज्यों को अपने राज्य में मिलाया लेकिन दक्षिण में उन्होंने जीते गए बारह राज्यों को अपने राज्य में मिलाने का कोई प्रयास नहीं किया.
साथरोंगला संगटम अपनी किताब 'समुद्रगुप्त अ मिलिट्री जीनियस' में लिखती हैं, "इसके पीछे शायद ये कारण रहा हो कि इन राज्यों पर पाटलिपुत्र से नियंत्रण करना इतना आसान नहीं था क्योंकि उस समय संचार और यातायात के साधन बहुत सीमित थे. यही नहीं उन्होंने दूरदराज़ के इलाके पंजाब, पूर्वी राजपूताना और मालवा को भी स्वायत्तता दे रखी थी. वह इन राज्यों को विदेशी शासकों जैसे शकों और कुषाणों के लिए 'बफ़र स्टेट' के तौर पर इस्तेमाल करता था."
समुद्रगुप्त के ज़माने में पाटलिपुत्र ने एक बार फिर अपने पुराने वैभव को प्राप्त कर लिया था. अपने चरम पर समुद्रगुप्त का करीब-करीब पूरी गंगा घाटी पर नियंत्रण था. पूर्वी बंगाल, असम और यहां तक कि नेपाल के शासक उसे नज़राना भेजते थे.
एएल बाशम अपनी किताब 'द वंडर दैट वाज़ इंडिया' में लिखते हैं, "समुद्रगुप्त की ताकत असम से लेकर पंजाब की सीमा तक फैली हुई थी. उसका इरादा मौर्यों की तरह एकजुट साम्राज्य बनाने का था. इलाहाबाद के शिलालेख में साफ़ लिखा है कि उन्होंने उत्तरी भारत के नौ राज्यों को अपने राज्य में मिलाया था. लेकिन राजस्थान की लड़ाकू जनजातियों और सीमावर्ती राज्यों ने उसके प्रति सिर्फ़ अपनी श्रद्धा जताई थी और अपनी आज़ादी बरक़रार रखी थी. दक्षिण में समुद्रगुप्त ने कांचीवरम तक अपनी जीत दर्ज की थी लेकिन नज़राना अदा करने के बाद समुद्रगुप्त ने वहां के राजाओं को बहाल कर दिया था और उनका नाममात्र का शासक बना रहा था."
समुद्रगुप्त और अशोक दो अलग-अलग व्यक्तित्व
धर्म के प्रति उसकी सेवाओं के कारण इलाहाबाद के शिलालेख में उसके लिए 'धर्म-प्राचीर बंधु' शब्द का प्रयोग किया गया है लेकिन इस बात के प्रमाण मिलते हैं कि दूसरे धर्मों के प्रति उसके मन में सहिष्णुता की भावना थी. हालांकि समुद्रगुप्त भगवान विष्णु को मानता था लेकिन श्रीलंका के राजा के अनुरोध पर उसका बोध गया में बौद्ध मठ की स्थापना की अनुमति देना बताता है कि समुद्रगुप्त दूसरे धर्मों का सम्मान करता था.
समुद्रगुप्त के ज़माने की आर्थिक संपन्नता का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने अपने राज्य में सिर्फ़ सोने के सिक्के चलवाए और सिक्कों में चांदी का इस्तेमाल कभी नहीं किया.
राधाकुमुद मुखर्जी लिखते हैं, "समुद्रगुप्त ने आठ तरह के सिक्के ढलवाए. अपने सिक्कों के लिए सोना उसे अपनी विजय अभियानों के दौरान मिला."
डॉक्टर एचसी रॉयचौधरी ने समुद्रगुप्त और अशोक की दिलचस्प तुलना की है.
रॉयचौधरी अपनी किताब 'पॉलिकल हिस्ट्री ऑफ़ एनशिएंट इंडिया' में लिखते हें, "वैचारिक रूप से अशोक और समुद्रगुप्त में ज़मीन आसमान का अंतर था. जहां अशोक शांति और अहिंसा का हिमायती था, समुद्रगुप्त युद्ध और आक्रामकता में विश्वास रखता था. अशोक जीत को तिरस्कार की दृष्टि से देखने लगा था जबकि समुद्रगुप्त को जीत का एक तरह का जुनून था. समुद्रगुप्त अशोक की तुलना में अधिक बहुमुखी था. अशोक की महानता सिर्फ़ धर्मग्रंथों तक सीमित थी लेकिन समुद्रगुप्त कला और संस्कृति के हर पहलू में पारंगत था. जहां अशोक ने अपने लोगों के आध्यात्मिक उत्थान के लिए काम किया था, समुद्रगुप्त ने अपने लोगों के आर्थिक कल्याण के लिए काम किया था. समुद्रगुप्त का मानना था कि अगर लोग आर्थिक रूप से संपन्न नहीं हैं, आध्यात्मिक उत्थान का उनके लिए कोई मतलब नहीं रह जाता है."
भारतीय इतिहास के स्वर्णयुग का प्रतिनिधित्व करने वाला सम्राट
भारत से बाहर दूसरे राजाओं जैसे गांधार, काबुल, बैक्ट्रिया और श्रीलंका से समुद्रगुप्त का कूटनीतिक संबंध रखना बताता है कि उनकी अंतरराष्ट्रीय छवि थी. दिलचस्प बात यह थी कि तमिल राज्यों से सीधा संबंध न होने के बावजूद श्रीलंका से उनके नज़दीकी संबंध थे.
समुद्रगुप्त को उनके मानवीय गुणों के लिए भी याद किया जाता है. गरीबों के लिए उसके मन में हमेशा करुणा की भावना रही. भारतीय इतिहास के स्वर्णयुग का प्रतिनिधित्व करने का श्रेय समुद्रगुप्त को दिया जाता है.
कई मामलों मे उसका व्यक्तित्व न केवल गुप्त सम्राटों में भारत के अन्य सम्राटों में सबसे अधिक भव्य दिखाई देता है. मशहूर इतिहासकार डॉक्टर राधेशरण अपनी किताब 'सम्राट समुद्रगुप्त' में लिखते हैं, 'वह अपने समय का अनूठा सम्राट था. उसके काम करने का तरीका अन्य सम्राटों से अधिक व्यवहारिक था. आर्थिक रूप से उसका साम्राज्य संभवतः दुनिया का सबसे समृद्ध साम्राज्य था.'
एक भी युद्ध नहीं हारा समुद्रगुप्त
समुद्रगुप्त को तीन शताब्दी पहले लुप्त हो चुकी मौर्य साम्राज्य की सेना के बराबर सेना फिर से बनाने का गौरव हासिल है. समुद्रगुप्त ने लगभग अपना पूरा जीवन सैनिक अभियानों और अपने सैनिकों के साथ बिताया.
डॉक्टर विसेंट स्मिथ ने समुद्रगुप्त को भारत का नेपोलियन कहा है. उसमें एक योग्य सेनानायक के सभी गुण थे. वह उन सेनापतियों में से नहीं था जो दूर से सैन्य संचालन करते थे.
इलाहाबाद के शिलालेख में ज़िक्र है कि उन्होंने सैकड़ों युद्धों में भाग लिया था. समुद्रगुप्त का साम्राज्य उत्तर में हिमालय से लेकर दक्षिण में लंका द्वीपों तक, पश्चिमोत्तर भारत और पूर्व में बंगाल, असम और नेपाल तक फैल चुका था.
इलाहाबाद के शिलालेख में साफ़ कहा गया है कि भारत में उसका कोई प्रतिद्वंदी नहीं था. उन्होंने अपने साम्राज्य के बहुत बड़े हिस्से को स्वायत्त ही रहने दिया. ये स्वायत्त इकाइयां अपने आंतरिक प्रशासन में स्वतंत्र होते हुए भी सादर, सम्राट के प्रभुत्व को मानती थीं.
इतिहासकार बालकृष्ण गोविंद गोखले अपनी किताब 'समुद्रगुप्त : लाइफ़ एंड टाइम्स' में लिखते हैं, "निस्संदेह नेपोलियन एक योग्य विजेता था लेकिन दोनों सम्राटों की समकालीन परिस्थितियों, विजय अभियानों और उद्देश्यों पर नज़र दौड़ाने के बाद ऐसा लगता है कि कहीं समुद्रगुप्त नेपोलियन से बहुत आगे था. एक विजेता के रूप में वह मात्र सीमा विस्तारक ही नहीं था बल्कि उन्होंने विजय के नैतिक मूल्यों पर पर्याप्त ध्यान दिया था. नेपोलियन की तरह समुद्रगुप्त को एक बार भी सैन्य हार का सामना नहीं करना पड़ा. वकटकों के ख़िलाफ़ अभियान में उसे थोड़ी मशक्कत करनी पड़ी लेकिन अंत में जीत उसी की हुई."
भारतीय इतिहास का बेहतरीन सैन्य कमांडर
अपने पराक्रम की उद्घोषणा के तौर पर समुद्रगुप्त ने अश्वमेघ यज्ञ का आयोजन किया था. इलाहाबाद शिलालेख, जो कि समुद्रगुप्त के इतिहास का एक बड़ा स्रोत है, उसके अश्वमेघ यज्ञ के बारे में मौन है.
इससे स्पष्ट है कि यह अश्वमेघ यज्ञ इलाहाबाद शिलालेख के लिखे जाने के बाद कराया गया होगा.
बीजी गोखले अपनी किताब 'समुद्रगुप्त: लाइफ़ एंड टाइम्स' में लिखते हैं, "प्राचीनकाल में अश्वमेघ यज्ञ का अनुष्ठान सार्वभौमिक प्रभुता का सूचक माना जाता था. ऐसा लगता है कि समुद्रगुप्त ने अपनी अनेक विजयों के बाद अश्वमेघ यज्ञ का विधिवत आयोजन किया था. इस यज्ञ की स्मृति में उन्होंने कई सिक्के निकलवाए. इन सिक्कों के अग्र भाग में एक अश्व यज्ञ स्तंभ के सामने खड़ा दिखाया गया है. अश्व आभूषणों से सुसस्जित है. अश्व की पीठ पर मोतियों की लड़ी साफ़ देखी जा सकती है."
समुद्रगुप्त के कार्यकलापों को देखने से लगता है कि वह एक बहुमुखी प्रतिभा का व्यक्ति था. उसके समकालीन हरिषेण का मानना है, 'ऐसा कौन सा गुण हो सकता है जो उसमें न हो.'
समुद्रगुप्त की क़द काठी और शारीरिक सौष्ठव अद्वितीय था. इसकी कुछ झलक हमें उसकी मुद्राओं पर अंकित उसके कुछ चित्रों से मिलती है. इन सिक्कों से उसके गठे हुए संतुलित लंबे शरीर का साफ़ अंदाज़ा लगाया जा सकता है.
समुद्रगुप्त ने अपनी सभी लड़ाइयां प्रथम पंक्ति में एक सैनिक की तरह लड़ीं. राधाकुमुद मुखर्जी लिखते हैं, "समुद्रगुप्त एक निडर योद्धा था. उसमें चीते जैसी फुर्ती और गति थी. मध्य प्रदेश के एरान के शिलालेख में दर्ज है कि समुद्रगुप्त अजेय शक्तियों का मालिक था. उसके अधिकतर काम एक साधारण व्यक्ति के नहीं बल्कि एक सुपरमैन के थे. समुद्रगुप्त को भारत के सर्वकालीन महान सम्राटों में से एक और भारतीय इतिहास का सबसे बेहतरीन सैन्य कमांडर माना जाता है."
45 वर्ष राज करने के बाद सन 380 में भारत के इस महान योद्धा और शासक ने अंतिम सांस ली.
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