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जयशंकर ने पोलैंड के डिप्टी पीएम से क्यों कहा- 'हमारे पड़ोस में आतंकवाद को मदद न दें'
भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने सोमवार को पोलैंड के उप प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री रादोस्वाव सिकोर्सकी से मुलाक़ात के दौरान भारत के पड़ोस का ज़िक्र करते हुए ये कहा कि पोलैंड को आंतकवाद के प्रति ज़ीरो टॉलरेंस अपनाना चाहिए.
उन्होंने ये भी कहा कि पोलैंड को भारत के पड़ोस में किसी भी 'टेररिस्ट इन्फ़्रास्ट्रक्चर' को मदद नहीं करनी चाहिए.
जयशंकर ने सोमवार को सिकोर्सकी के साथ मुलाक़ात में भारत को ख़ासतौर पर निशाना बनाने का भी मुद्दा उठाया और कहा कि 'यह ग़लत और अन्यायपूर्ण दोनों है.'
हालांकि, पोलैंड के डिप्टी पीएम ने जयशंकर के इन दोनों ही बयानों से सहमति जताई और कहा है कि सीमा-पार आतंकवाद को काउंटर करने की ज़रूत है. साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि टैरिफ़ के ज़रिए सिर्फ़ भारत को निशाना बनाना ग़लत है.
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जयशंकर ने क्या-क्या कहा?
विदेश मंत्री जयशंकर ने अपने संबोधन की शुरुआत में ही कहा कि दोनों नेताओं की मुलाक़ात ऐसे समय हो रही है जब दुनियाभर में उथल-पुथल का माहौल है.
उन्होंने कहा, "पोलैंड सेंट्रल यूरोप में भारत के सबसे बड़े व्यापारिक साझेदारों में से एक है. मेरा मानना है कि हमारा द्विपक्षीय व्यापार लगभग सात अरब अमेरिकी डॉलर के आसपास पहुंच चुका है, जिसमें पिछले एक दशक में लगभग 200 फ़ीसदी की बढ़ोतरी हुई है. पोलैंड में भारतीय निवेश तीन अरब अमेरिकी डॉलर से ज़्यादा हो चुका है. इससे पोलिश नागरिकों के लिए रोज़गार के कई अवसर पैदा हुए हैं. भारत की मज़बूत आर्थिक वृद्धि, विशाल बाज़ार और निवेश के अनुकूल नीतियां, पोलैंड के कारोबारों के लिए ढेरों मौके देती हैं."
जयशंकर ने कहा, "हाल के कुछ समय में, जैसे बीते साल सितंबर में न्यूयॉर्क की मुलाक़ात और इस साल जनवरी में पेरिस में हुई मुलाक़ात के दौरान मैंने आपसे यूक्रेन संघर्ष और इसके असर को लेकर अपने विचार खुलकर साझा किए. इस दौरान मैंने बार-बार ये भी रेखांकित किया कि भारत को चुनकर निशाना बनाना न सिर्फ़ ग़लत है बल्कि ये अन्यायपूर्ण भी है. मैं यही आज भी दोहराना चाहूंगा."
दरअसल जयशंकर इसी महीने एंबेस्डर्स कॉन्फ़्रेंस ऑफ़ फ़्रांस में हिस्सा लेने पेरिस पहुंचे थे. उस समय वहां पोलैंड के डिप्टी पीएम सिकोर्सकी भी मौजूद थे.
उनका वहां दिया एक बयान भारत में भी चर्चा में आया था. सिकोर्सकी ने जयशंकर और अन्य यूरोपीय नेताओं के साथ मंच साझा करते हुए कहा था कि, "मैंने इस बारे में अपनी संतुष्टि को ज़ाहिर किया है कि भारत ने रूस से तेल आयात घटाना शुरू कर दिया है क्योंकि ये पुतिन की वॉर मशीन को बढ़ावा दे रहा है."
इस पर भारत में विपक्षी दलों ने केंद्र सरकार पर सवाल उठाए थे और पूछा था कि क्या भारत ने अपने तेल आयात से जुड़े फ़ैसले बाहरी दबाव यानी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की वजह से बदले हैं.
जयशंकर ने आगे कहा, "उपप्रधानमंत्री जी, आप इस क्षेत्र से अनजान नहीं हैं और आपको लंबे समय से चुनौती बने हुए सीमा-पार आतंकवाद के बारे में भी जानकारी है. मुझे उम्मीद है कि हम इस बैठक में आपके इस क्षेत्र के हालिया दौरों के बारे में भी चर्चा करेंगे. पोलैंड को आतंकवाद के प्रति ज़ीरो-टॉलरेंस दिखाना चाहिए और हमारे पड़ोस में टेररिस्ट इन्फ़्रास्ट्रक्चर को बढ़ावा देने में मदद नहीं करनी चाहिए."
तीन महीने पहले सिकोर्सकी गए थे पाकिस्तान
27 देशों वाले यूरोपीयन यूनियन और पश्चिमी देशों के सैन्य गठजोड़ नेटो के सदस्य पोलैंड की हाल के कुछ वर्षों में पाकिस्तान से नज़दीकी बढ़ती दिखी है.
इसी क्रम में बीते साल अक्तूबर में सिकोर्सकी ने पाकिस्तान का भी दो दिवसीय दौरा किया था. इससे पहले सिकोर्सकी साल 2011 में भी पाकिस्तान दौरे पर गए थे.
इस दौरे पर पोलैंड के डिप्टी पीएम ने एनर्जी, एग्री-फूड प्रोसेसिंग, पब्लिक फ़ाइनेंस, ग्रीन टेक्नोलॉजी जैसे सेक्टर में सहयोग की इच्छा जताई थी.
दोनों देशों की ओर से जारी किए गए साझा बयान के मुताबिक़, पाकिस्तान ने इस मुलाक़ात के दौरान जम्मू और कश्मीर के विवाद पर जानकारी दी थी. इस पर दोनों पक्षों ने अंतरराष्ट्रीय नियमों और संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुरूप समस्या का शांतिपूर्ण समाधान खोजने पर सहमति जताई थी.
अरब न्यूज़ पाकिस्तान की एक ख़बर के मुताबिक़, पाकिस्तान और पोलैंड के बीच साल 2023 में 92.2 करोड़ डॉलर का द्विपक्षीय व्यापार था. इसमें से पाकिस्तान ने 79.4 करोड़ डॉलर का निर्यात किया और 12.8 करोड़ डॉलर का पोलैंड से आयात किया.
इस रिपोर्ट के मुताबिक़, पोलैंड की तेल और गैस कंपनी (ORLEN) पाकिस्तान में साल 1997 से पाकिस्तान में तेल और गैस निकालती आ रही है.
पाकिस्तान के डॉन न्यूज़ के मुताबिक़, "पोलैंड और पाकिस्तान के रिश्ते द्वितीय विश्व युद्ध के समय से हैं. उस समय कराची और क्वेटा में पोलिश रेफ़्यूजियों के लिए बस्तियां बनाई गई थीं. साथ ही पोलैंड ने पाकिस्तानी वायु सेना को बनाने में अहम भूमिका निभाई थी."
इसी रिपोर्ट में यह भी बताया गया था कि पाकिस्तान में फ़िलहाल पोलैंड का 50 करोड़ डॉलर का निवेश है.
क्या बोले पोलैंड के डिप्टी पीएम
पोलैंड के डिप्टी पीएम ने जयशंकर की टिप्पणियों से सहमति जताते हुए कहा, "हम अपने-अपने क्षेत्रों में काफ़ी प्रगतिशील देश हैं. हम ऐसे देश भी हैं, जिन्हें 19वीं सदी में उपनिवेश बनाया गया था, इसलिए इस मामले में हमारी कुछ विशेष संवेदनशीलताएं हैं. सीमा-पार और अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद का मुक़ाबला करने की ज़रूरत पर मैं आपसे पूरी तरह सहमत हूं."
उन्होंने कहा, "जैसा आपने सुना होगा कि पोलैंड हाल ही में आगज़नी और आतंकवाद का शिकार रहा है. यहां एक चलती ट्रेन के नीचे रेलवे लाइन को विस्फोट से उड़ाने की कोशिश की गई. ग़नीमत ये रही कि आतंकवादियों की अक्षमताओं की वजह से कोई हताहत नहीं हुआ." सिकोर्सकी का इशारा रूस की ओर था, जो लंबे समय से यूक्रेन के साथ जंग में है.
17 जनवरी को भारत आए सिकोर्सकी के दौरे का सोमवार को आख़िरी दिन था. उन्होंने कहा, "टैरिफ़ के ज़रिए चुनिंदा देशों को निशाना बनाए जाने वाली बात पर भी मैं आपसे पूरी तरह सहमत हूं. यूरोप में हम भी इसके बारे में जानते हैं और हमें लगता है कि इससे वैश्विक व्यापार में उथल-पुथल बढ़ रही है."
हालांकि, सिकोर्सकी की बात के जवाब में जयशंकर ने कहा, "ये चुनिंदा देशों को निशाना बनाना सिर्फ़ टैरिफ़ तक सीमित नहीं है. मेरा मानना है कि सिलेक्टिव टार्गेटिंग के कई और तरीके़ भी हैं. लेकिन हम इस पर बात करेंगे."
सिकोर्सकी ने इससे पहले द हिंदू को दिए इंटरव्यू में रूस और उसके हथियारों की गुणवत्ता की आलोचना की थी.
उन्होंने कहा था, "भारत ने रूसी सैन्य उपकरणों में भारी निवेश किया है और ये हथियार अच्छे से काम नहीं कर रहे (यूक्रेन युद्ध में). राष्ट्रपति पुतिन को तो शुक्रगुज़ार होना चाहिए कि भारत उन्हें द हेग की अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय नहीं भेज रहा है, जहां उन पर यूक्रेनी बच्चों को चुराने, अगवा कर के उन्हें रूसी बनाकर फिर अपनी ही मातृभूमि के ख़िलाफ़ जंग में भेजने के आरोप हैं."
सिकोर्सकी से पूछा गया था कि क्या उन्होंने ये बातें भारत सरकार से भी कही हैं और क्या उन्हें लगता है कि भारत का रुख़ बदल रहा है?
इस पर उन्होंने कहा, "भारत इतना बड़ा देश है कि उसे सबके साथ संबंध बनाए रखने की ज़रूरत है. लेकिन मुझे लगता है कि भारत का रुख़ हमसे मेल खाता है कि सिद्धांत मायने रखते हैं और ऐसी दुनिया जहां जंगल क़ानून स्वीकार्य हो, वह अच्छी दुनिया नहीं है."
"मैं समझता हूं कि आयात करने वाले हमेशा मोलभाव करते हैं और रूस अपना तेल सस्ती दरों पर बेचने को मजबूर है, कभी-कभी इस फ़ायदे को देख लालच होता है. लेकिन देशों को सतर्क रहना चाहिए क्योंकि हमने रूस की 'शैडो फ्लीट' पर सफलतापूर्वक पाबंदियां लगाई हैं. इसलिए रूस अगर कच्चा तेल बेचता भी है, तो हो सकता है कि वो उसे डिलीवर ही न कर सके."
बीबीसी के लिए कलेक्टिवन्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.