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ग्रीनलैंड को लेकर सहयोगियों को दी गई ट्रंप की धमकी का कैसा असर?
- Author, फ़ैसल इस्लाम
- पदनाम, आर्थिक मामलों के संपादक
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की यह जबरन दी गई धमकी कि पश्चिमी सहयोगी उनके प्रस्तावित ग्रीनलैंड विलय का विरोध न करें, वरना उन्हें अमेरिका के साथ अपने व्यापार में और नुकसान झेलना पड़ेगा – इस तरह का पहले कभी कुछ नहीं हुआ है.
पिछले साल हमें राष्ट्रपति ट्रंप की तरफ़ से कुछ अजीब और अप्रत्याशित आर्थिक धमकियां मिली हैं, लेकिन मेरा मानना है कि यह उन सब से कहीं आगे निकल जाती है और हमें एकदम अजीबो-गरीब और बेहद ख़तरनाक स्थिति में पहुंचा देती है.
अगर इसे सीधे तौर पर देखा जाए, तो यह व्हाइट हाउस की तरफ़ से अपने सबसे क़रीबी सहयोगियों पर थोपी गई एक तरह की आर्थिक जंग है. क्योंकि इसने अमेरिका के सहयोगियों को धमकाने के लिए बहुत कम समय लिया और वह भी ऐसे मक़सद के लिए जो असल में नेटो और पश्चिमी गठबंधन को तोड़ सकता है.
इससे उन देशों के अधिकारी पूरी तरह से हैरान रह जाएंगे. दरअसल, यह इतना अजीब है कि वे शायद गुस्से से ज़्यादा हैरान ही हों.
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दुनिया में कोई भी यह नहीं सोच सकता था कि ऐसी धमकी - जो आपके सहयोगी की ज़मीन हथियाने को लेकर हो - कभी सच में दी जा सकती है.
क्या ट्रंप को वाकई अमेरिका में, संसद में, यहां तक कि अपने ही प्रशासन में, ऐसा करने के लिए समर्थन मिल रहा है?
क्या यह, जैसा कि कुछ व्यापार अधिकारियों को मानना पड़ रहा है, अब तक का सबसे बड़ा 'टाको' है? (TACO- Trump Always Chickens Out) यानी कि 'ट्रंप हमेशा बड़े फ़ैसले लेने के बाद इन्हें वापस ले लेते हैं या फिर इनमें देरी करते हैं'.
ऐसी चीज़ें आती-जाती रहती हैं और आर्थिक तौर पर इन देशों ने अब तक हुए नुक़सान को संभाल ही लिया है.
कनाडा की चुनौती
कनाडा के बारे में सोचिए. उसके अमेरिका के साथ व्यापार में भारी गिरावट आई है. लेकिन प्रधानमंत्री मार्क कार्नी की रणनीति ने कनाडा के व्यापार को बाकी दुनिया के साथ 14 फ़ीसदी तक बढ़ा दिया है – यह आश्चर्यजनक रूप से अमेरिका के साथ हुए व्यापार घाटे को पूरा करने से भी ज़्यादा है.
कार्नी इस हफ़्ते चीन में रहे हैं, जहां उन्होंने 'एक नई विश्व व्यवस्था' की बात की. उन्होंने चीन के साथ व्यापार और बढ़ाने की कोशिश की, न कि वह दूरी बनाने की जो कुछ अमेरिकी प्रशासनिक अधिकारी चाहते थे.
तीन महीने पहले ही ट्रंप प्रशासन दुनिया को समझाने की कोशिश कर रहा था कि 'यह चीन बनाम दुनिया' है.
कार्नी इस सोच को चुनौती दे रहे हैं, यही बात शायद आज दिए गए दख़ल की अहम वजह बनी है.
लेकिन, फिर भी, हम अगर ट्रंप की ताज़ा धमकियों को गंभीरता से लें, तो वे बेहद परेशान करने वाली हैं. ज़्यादा इसलिए नहीं कि यह 10 फ़ीसदी टैरिफ़ है, बल्कि इसलिए कि इसका आधार क्या है - एक सहयोगी से ज़मीन लेना, और खुलेआम अपने सहयोगियों को दबाव में लेने की कोशिश करना.
अगर चीन या रूस ने अपने किसी सहयोगी को ऐसी धमकी दी होती, तब दुनिया की प्रतिक्रिया कैसी होती?
इस धमकी का आधार साफ़ तौर पर बेहद चिंताजनक है. दुनिया भर की राजधानियों में बहुत से लोग ट्रंप की सोशल मीडिया घोषणा पढ़कर अमेरिका की निर्णय प्रक्रिया पर सवाल उठाएंगे.
राष्ट्रपति ट्रंप बुधवार को वर्ल्ड इकोनॉमिक फ़ोरम में उन सहयोगी देशों के नेताओं से मिलने पहुंचेंगे जिनकी अर्थव्यवस्थाओं को उन्होंने अभी-अभी धमकी दी है.
दुनिया के ज़्यादातर लोग यही उम्मीद करेंगे कि तब तक यह ग़ज़ब धमकी किसी तरह ग़ायब हो चुकी होगी.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.