मलयालम फ़िल्म इंडस्ट्री में आम है महिलाओं का यौन शोषण, कोडवर्ड भी तय: जस्टिस हेमा कमेटी की रिपोर्ट में क्या-क्या बताया गया?

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- Author, इमरान क़ुरैशी
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
केरल हाई कोर्ट की रिटायर्ड जज की अगुवाई वाली एक कमेटी ने कहा है कि मलयालम फ़िल्म उद्योग में "कास्टिंग काउच" बहुत गहरे तौर पर जड़ जमाए हुए है.
रिपोर्ट में कहा गया है कि फ़िल्म उद्योग में विभिन्न स्तरों पर प्रवेश का मौका पाने के लिए 'समझौता' और 'एडजस्टमेंट्स' शब्दों का इस्तेमाल कोडवर्ड के रूप में किया जाता है.
इन दोनों शब्दों का मतलब है कि महिला को 'सेक्स ऑन डिमांड' के लिए खुद को उपलब्ध बनाए रखना चाहिए.
फिल्म निर्माण से जुड़े लोग नए लोगों के सामने ये छाप छोड़ने की कोशिश करते हैं कि फ़िल्म उद्योग में कास्टिंग काउच का प्रचलन है.
जो इसमें फंसते हैं, उन्हें 'कोड नंबर' दिए जाते हैं.
जस्टिस के हेमा की अगुवाई वाली कमेटी की रिपोर्ट जमा किए जाने के साढ़े चार साल बाद केरल सरकार ने इसे जारी किया है.
290 पन्नों की इस रिपोर्ट के 44 पन्ने गायब हैं क्योंकि इन पन्नों में महिलाओं ने अपने साथ शोषण और उत्पीड़न करने वाले पुरुषों के नाम बताए थे.
रिपोर्ट से हटाए गए दूसरे हिस्से के ठीक बाद यौन उत्पीड़न की शिकार एक महिला का ज़िक्र है, जिन्हें उस शख़्स के साथ पति और पत्नी के तौर पर भूमिका निभानी पड़ी और गले लगाना पड़ा, जिसने एक दिन पहले ही उनका यौन उत्पीड़न किया था.
रिपोर्ट में कहा गया है, "यह बहुत भयानक था. शूटिंग के दौरान महिला के साथ जो कुछ हुआ था, उसकी वजह से उनके चेहरे पर ग़ुस्सा और नफ़रत साफ़ झलक रही थी. सिर्फ़ एक शॉट के लिए 17 रीटेक लेने पड़े थे. इसके लिए डायरेक्टर ने महिला की आलोचना की."

2017 में हुआ था कमेटी का गठन


रिपोर्ट के अनुसार, "सिनेमा (उद्योग) में एक आम धारणा है कि महिलाएं सिनेमा में पैसे बनाने आती हैं और वो किसी भी चीज़ के लिए आत्मसमर्पण कर देंगी. सिनेमा में काम करने वाले आदमी इस बात की कल्पना भी नहीं कर सकते कि कला और अभिनय के प्रति जुनून की वजह से वो आती हैं. लेकिन धारणा ये है कि वो पैसे और मशहूर होने के लिए आती हैं और फ़िल्म में एक मौका पाने के लिए वो किसी भी आदमी के साथ सो जाएंगी."
साल 2017 में जस्टिस हेमा कमेटी का गठन किया गया था, जब वुमेन इन सिनेमा कलेक्टिव (डब्ल्यूसीसी) ने मुख्यमंत्री पिनराई विजयन को एक ज्ञापन देते हुए फ़िल्म उद्योग में काम के हालात पर अध्ययन करने की मांग की थी.
यह ज्ञापन उस घटना के बाद दिया गया था जब एक प्रतिष्ठित अभिनेत्री का उनकी ही कार में कुछ पुरुषों ने यौन उत्पीड़न किया था.
इस कमेटी में वयोवृद्ध अभिनेत्री टी शारदा और केरल की प्रिंसिपल सेक्रेटरी रह चुकीं केबी वाल्सालाकुमारी को शामिल किया गया था.
साल 2017 में बनी डब्ल्यूसीसी जागरूकता और नीतियों में बदलाव के मार्फ़त सिनेमा में महिलाओें की लैंगिक समानता के लिए काम करती है.
इसमें वो महिलाएं सदस्य हैं, जो मलयालम उद्योग में काम करती हैं.
कमेटी के सदस्यों को लगता है कि उनकी चिंताएं आखिरकार सही साबित हुईं और उन्होंने सरकार से कार्रवाई की मांग की है.
डब्ल्यूसीसी की सदस्य और मलयालम फ़िल्मों की पुरस्कृत एडिटर बीना पॉल ने बीबीसी हिंदी से कहा, "सालों से हम कहते आ रहे हैं कि उद्योग में व्यवस्थागत समस्या है. यह रिपोर्ट इसे साबित करती है."
"यौन उत्पीड़न इनमें से एक है. हमेशा हमें यही बताया गया कि ये सवाल उठा कर हम केवल समस्या पैदा करने वाले लोग हैं. यह रिपोर्ट साबित करती है कि हालात उससे भी बुरे हैं जैसा हम सोचते थे."
'माफ़िया राज'


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रिटायर्ड जस्टिस हेमा कमेटी की रिपोर्ट, महिलाओं के काम के हालात को लेकर, बहुभाषी फ़िल्म उद्योग वाले भारत के किसी भी हिस्से से आने वाली पहली रिपोर्ट है.
रिपोर्ट की सबसे अहम टिप्पणी शायद ये है कि "इसके सामने रखे गए सबूतों के अनुसार, फ़िल्म उद्योग में यौन उत्पीड़न हैरतअंगेज़ रूप से आम है और यह बेरोकटोक और अनियंत्रित बना हुआ है."
"कई महिलाओं ने मर्दों द्वारा यौन उत्पीड़न किए जाने के सबूत के तौर पर ऑडियो, वीडियो क्लिप और व्हाट्सऐप संदेशों के स्क्रीनशॉट मुहैया कराए."
एक "प्रमुख एक्टर" ने कमेटी को बताया कि वहां एक ताक़तवर लॉबी है जो फ़िल्म उद्योग में एक "माफ़िया की तरह काम" करती है और ये कुछ भी कर सकती है. यहां तक कि प्रतिष्ठित निर्देशकों, निर्माताओं, अभिनेता-अभिनेत्रियों या किसी भी व्यक्ति को बैन कर सकती है, "भले ही ऐसा प्रतिबंध ग़ैरक़ानूनी और अनधिकृत हो."
कमेटी को मौखिक और दस्तावेज़ों के साथ सबूत दिए गए कि कुछ अभिनेता, निर्माता, वितरक, निर्देशक, "जो सभी मर्द हैं उन्होंने बड़े पैमाने पर प्रसिद्धि और पैसा दोनों पा लिया है और अब मलयालम उद्योग पर उनका पूरी तरह कब्ज़ा है. उद्योग के कई लोगों ने हमारे सामने ज़ोर देकर कहा कि कई लोगों को सिनेमा से बैन कर दिया गया था, जिनमें प्रसिद्ध एक्टर तक थे. उनके नाम भी दिए गए थे."
फ़िल्म हिस्टोरियन ओके जॉनी ने बीबीसी हिंदी से कहा, "मलयालम फ़िल्म उद्योग देश में मौजूद अन्य भाषाओं के फ़िल्म उद्योग के मुकाबले सबसे छोटा है. लेकिन यह बहुत कुख्यात भी है. ये बड़ा माफ़िया है, जो महिला विरोधी और जनता विरोधी है."
जॉनी की बात, महिला कलाकारों को मामूली भुगतान किए जाने के मामले में कमेटी के नतीजों से भी पुष्ट होती है.
भुगतान के मामले में कोई भी ऐसा तरीक़ा नहीं है जिस पर कोई सवाल उठा सके या क़ानूनी सहारा ले सके क्योंकि किसी कॉन्ट्रैक्ट पर हस्ताक्षर नहीं किया जाता.
कमेटी को बताया गया कि कैसे कुछ फ़िल्म निर्देशक न्यूड सीन या अंग दिखाने को लेकर अभिनेत्रियों से किए अपने वादों से पलट गए थे.
जब महिलाओं ने उस काम को छोड़ दिया तो तीन महीने काम करने के बावजूद पैसा नहीं दिया गया. महिलाओं ने कहा कि शूट के दौरान उन्हें होटल में भी सुरक्षित नहीं लगता था.
रिपोर्ट में कहा गया है, "दरवाज़े को इतनी ज़ोर से पीटा जाता था (नशे में धुत लोगों द्वारा) कि कई बार तो लगता था कि दरवाज़ा टूट जाएगा और पुरुष ज़बरदस्ती उनके कमरे में घुस जाएंगे."
जूनियर कलाकारों के साथ ग़ुलामों जैसा बर्ताव


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जूनियर कलाकारों और हेयर स्टाइलिस्ट का हाल तो इससे भी बुरा है. जूनियर कलाकारों के साथ "ग़ुलामों जैसा बर्ताव" किया जाता था.
सेट पर उन्हें टॉयलेट जैसी बुनियादी सुविधा भी नहीं दी जाती और उनसे सुबह 9 बजे से रात के दो बजे तक काम कराया जाता है. कुछ अपवादों को छोड़कर खाना भी नहीं दिया जाता.
हेयर स्टाइलिस्ट और मेकअप आर्टिस्ट के लिए काम के हालात और बदतर हैं क्योंकि उनकी यूनियनों ने कामकाजी हालात और वेतन को नियंत्रित करने वाले क़ानूनों का उल्लंघन किया था.
रिपोर्ट में दर्ज किए बयानों के अनुसार, उद्योग में एक ही नियम है कि, जो भी 'यस मैन या यस वुमन' नहीं है, उसे माफ़िया द्वारा उद्योग से प्रतिबंधत किया जा सकता है.
प्रतिबंधित होने वाले लोगों में डब्ल्यूसीसी की कुछ सदस्य भी थीं. इसी संगठन ने उद्योग में काम के हालात से संबंधित मुद्दे उठाए थे.
बीना पॉल ने कहा, " इंडस्ट्री से लोगों को बाहर करने का एक रवैया सा रहा है क्योंकि लोग इस सच्चाई का सामना नहीं करना चाहते कि हम सवाल पूछें. इसलिए कुछ सदस्यों ने मुश्किल हालात का सामना किया."
कमेटी ने फ़िल्म उद्योग को चलाने के लिए एक क़ानून और एक ऐसे ट्राइब्यूनल को गठित करने की सिफ़ारिश की है जिसकी अगुवाई महिला जज करें ताकि महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके.
विपक्ष ने सरकार को घेरा


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जैसे ही रिपोर्ट जारी हुई है, रिपोर्ट में देरी करने और आपराधिक मामलों के लिए ज़िम्मेदार लोगों के ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई नहीं शुरू करने को लेकर विपक्षी गठबंधन यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ़्रंट (यूडीएफ़) ने लेफ़्ट डेमोक्रेटिक फ़्रंट (एलडीएफ़) सरकार को घेरा.
मुख्यमंत्री पिनराई विजयन ने जवाब दिया कि सरकार ने कमेटी की कुछ सिफ़ारिशों को पहले ही लागू कर दिया है.
महिलाओं का उत्पीड़न करने वालों के खिलाफ़ कार्रवाई शुरू करने की जहां तक बात है, विजयन ने कहा कि अगर कोई भी महिला पुलिस में शिकायत दर्ज कराती है, सरकार उस पर तत्काल कार्रवाई करेगी.
इस रिपोर्ट पर एसोसिएशन ऑफ़ मलयालम मूवी आर्टिस्ट (एएमएमए) ने आधिकारिक रूप से अभी तक कुछ नहीं कहा है.
इसके पदाधिकारियों ने इस रिपोर्ट का अध्ययन करने के बाद प्रतिक्रिया देने की बात कही है.
'केरल में ये कैसे हो सकता है'


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लेकिन केरल जैसे राज्य में ऐसा कैसे घटित हो सकता है, जिसे इसकी फ़िल्मों के लिए फ़िल्म समीक्षकों और दर्शकों से भी सराहना मिल चुकी है.
मलयालम फिल्म उद्योग पर व्यापक रूप से रिपोर्ट करने वाली मशहूर फ़िल्म समीक्षक अन्ना एमएम वेट्टीकाड के पास इसका जवाब है.
वो कहती हैं, "मलयालम फ़िल्म उद्योग केरल का एक छोटा जगत है, एक ऐसा राज्य जहां बहुत प्रगतिशीलता और चरम पितृसत्ता एक साथ मौजूद हैं. यह मलयाली सिनेमा में भी झलकता है. पितृसत्ता की पड़ताल करने वाली कुछ बेहतरीन भारतीय फ़िल्में मलयालम में बनी हैं, लेकिन यही उद्योग बहुत ही पिछड़ी फ़िल्में भी बनाता है."
"इन हालात में, इसमें कोई ताज्जुब नहीं है कि स्त्री-द्वेषी लोग सिनेमा जैसे रचनात्मक क्षेत्र की धारणाओं का फ़ायदा उठाते हैं और महिलाओं का शोषण करते हैं, फिर भी उसी उद्योग से समानता के लिए एक अभूतपूर्व अभियान भी उभरा है जो किसी अन्य पेशे - फ़िल्म या अन्य क्षेत्र में भारत में कहीं नहीं देखा गया."
बदलाव की कोई उम्मीद है?


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फ़िल्म 'द ग्रेट इंडियन किचन' के डायरेक्टर जो बेबी ने बीबीसी हिंदी से कहा, "कुछ तो बदलाव हो रहा है. लेकिन इसमें जेंडर की वजह से काफ़ी दिक्कतें आ रही हैं. इसमें सुधार लाने का ये सही समय है. इसके लिए फ़िल्म उद्योग को एकजुट होकर लड़ना होगा."
बीना पॉल इस मामले में बिल्कुल साफ़ हैं कि "रातों रात किसी बदलाव की उम्मीद करना ग़लत है. मुझे लगता है कि सबसे पहले रवैये में बदलाव आना चाहिए, जिसकी रफ़्तार बेहद सुस्त है. लेकिन ये सुनिश्चित करने के लिए एक सिस्टम बनाया जा सकता है कि महिलाएं सुरक्षित महसूस करें और यह दूसरों को उद्योग में आने के लिए प्रोत्साहित करे."
अन्ना एमएम वेट्टीकाड ने बीबीसी हिंदी से कहा, "मलयालम फ़िल्म उद्योग में पितृसत्तात्मक ढांचे को जो लोग नियंत्रित करते हैं, उन्होंने महिलाओं के अधिकार आंदोलन को नज़रअंदाज़ करने की बहुत कोशिश की है, लेकिन डब्ल्यूसीसी ने बहुत बहादुरी दिखाई और उसे जनता का काफ़ी समर्थन मिला, इसीलिए ये उम्मीद की जा सकती है कि हेमा कमेटी रिपोर्ट एक सकारात्मक बदलाव का रास्ता दिखा सकती है."
उन्होंने कहा, "सामाजिक और संस्थागत प्रगति कभी रातों रात नहीं घटित होती, रास्ता अभी लंबा है, लेकिन कमेटी के सामने पेश हुए उद्योग जगत के कुछ लोगों और इस हफ़्ते प्रेस में जिन अन्य लोगों की प्रतिक्रियाएं आई हैं, उनका रक्षात्मक रुख़ दिखाता है कि उन्हें यथास्थिति में बदलाव का भान हो रहा है. यह असहजता एक सकारात्मक संकेत है."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित
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