छत्तीसगढ़: 'अप्राकृतिक सेक्स' के लिए पति को मिली नौ साल की सज़ा का फ़ैसला अहम क्यों?

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    • Author, आलोक प्रकाश पुतुल
    • पदनाम, रायपुर से बीबीसी हिंदी के लिए

छत्तीसगढ़ के दुर्ग ज़िले की एक फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट ने पत्नी के साथ अप्राकृतिक सेक्स के लिए पति को नौ साल के सश्रम कारावास और 10 हज़ार रुपये जुर्माने की सज़ा सुनाई है.

इसके अलावा पत्नी के साथ मारपीट करने के आरोप में एक साल की सज़ा और एक हज़ार रुपये का जुर्माना भी पति को चुकाना होगा.

यह फ़ैसला शनिवार को ऐसे समय में आया है, जब देश में मैरिटल रेप और अप्राकृतिक यौन कृत्य को लेकर बहस जारी है.

सोमवार को ही राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने भारतीय न्याय संहिता समेत तीन विधेयकों को अपनी मंज़ूरी दे दी है. नए भारतीय न्याय संहिता में अप्राकृतिक यौन कृत्य की धारा 377 को ही समाप्त कर दिया गया है.

इधर, दुर्ग की अदालत के ताज़ा फ़ैसले के बाद निमिष अग्रवाल को जेल भेज दिया गया है.

क्या है मामला

पुलिस थाना

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पति और पीड़िता दोनों के ही परिवार बड़े कारोबार से जुड़े हुए हैं.

इस फ़ैसले के बाद पीड़िता ने कहा, "मुझे हर तरह से प्रताड़ित किया गया. मैं मानसिक, शारीरिक, सामाजिक, आर्थिक रूप से प्रताड़ित होती रही. मैं दूसरी महिलाओं से उम्मीद करती हूँ कि जो अप्राकृतिक यौन संबंध के मामले को शर्म की वजह से या डर की वजह से आगे नहीं लाती हैं, वो आगे बढ़ कर अपने हक़ में आवाज़ उठाएँ."

पीड़िता ने कहा कि चाहे अप्राकृतिक यौन संबंध का मामला हो या मारपीट का या दहेज प्रताड़ना का, क़ानून आपकी मदद करता है. भले ही आप किसी भी तबके से हों.

पीड़िता ने कहा, "मैं महिलाओं से कहना चाहती हूँ कि आपका मन आहत हो या देह, आपको आवाज़ उठानी चाहिए. समाज और क़ानून अब बहुत जागरूक हो चुका है."

इस बीच, पीड़िता के बुज़ुर्ग पिता ने बीबीसी से बातचीत में कहा कि पिछले कई सालों से जो प्रताड़ना उनके और उनके परिवार ने झेली है, उसके बारे में तो कोई सोच भी नहीं सकता.

बेटी के जन्म के बाद बढ़ी प्रताड़ना

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पीड़िता के पिता ने बीबीसी से कहा, "अदालत ने जो फ़ैसला सुनाया है, उस पर मैं क्या टिप्पणी करूँ! मैं तो इसे सज़ा या न्याय भी नहीं कहूँगा. मैं ख़ुद 70 पार का हूँ. मेरी पत्नी लकवाग्रस्त हैं. पूरे परिवार ने जो इतने सालों तक झेला, उसके सामने अदालत के इस फ़ैसले के बारे में मैं क्या कहूँ!"

पीड़िता के वकील नीरज चौबे के अनुसार इस मामले में पीड़िता के सास-ससुर को भी 10 महीने की सज़ा सुनाई गई है. इसी तरह पीड़िता की ननद को अदालत ने छह महीने की सज़ा सुनाई है.

ये मामला पीड़िता के प्रताड़ना के आरोप से भी जुड़ा हुआ है.

अदालत में दायर इस मामले के अनुसार दुर्ग के कारोबारी निमिष अग्रवाल की शादी, 16 जनवरी 2007 को दुर्ग के ही एक कारोबारी की बेटी से हुई.

आरोप है कि सगाई के बाद से ही निमिष और उनके पिता ने पैसों की तंगी का हवाला देते हुए पीड़िता से पैसे की मांग शुरू कर दी. शादी के बाद यह सिलसिला और बढ़ गया.

अप्राकृतिक सेक्स

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पीड़िता का दावा है कि उनके पिता ने सगाई के बाद से अलग-अलग अवसर पर 3 करोड़ 5 लाख की रक़म दी.

लेकिन निमिष और उनके परिजन 10 करोड़ रुपये और एक बीएमडबल्यू कार की मांग पर अड़े रहे. इसके बाद पीड़िता के साथ मारपीट शुरू कर दी गई. मारपीट में निमिष अग्रवाल के पिता, मां और बहन भी शामिल रहते थे.

पीड़िता का आरोप है कि 2011 में जब वह गर्भवती हुई और जाँच के बाद पता चला कि गर्भ में पल रही संतान बेटी है, तो पति और उनके परिवार के सदस्यों ने गर्भपात की सलाह दी. लेकिन पीड़िता नहीं मानी.

पीड़िता के अनुसार बेटी के पैदा होने के बाद उन्हें मारपीट का एक और बहाना मिल गया.

आरोप के मुताबिक़ इसके बाद पति ने प्रताड़ित करने के लिए पीड़िता के साथ अप्राकृतिक सेक्स शुरू किया. पीड़िता का कहना है कि उनके पति इस दौरान पोर्न फ़िल्में देखते थे और पीड़िता के साथ ऐसी वीडियो भी बनाते थे.

अग्रवाल परिवार की दलील

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मई 2016 में पीड़िता ने आख़िरकार पति, सास-ससुर और ननद के ख़िलाफ़ पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराई. पुलिस और अदालती कार्रवाई के अलावा, सामाजिक बैठकों में भी इस मामले को सुलझाने की कोशिशें हुईं. लेकिन ऐसी तमाम कोशिशें असफल रहीं.

हालाँकि निमिष अग्रवाल और उनके परिवार के वकीलों ने दलील दी कि पीड़िता के सारे आरोप मनगढ़ंत और ससुराल पक्ष को प्रताड़ित करने के उद्देश्य से गढ़े गए हैं और इनमें कोई सच्चाई नहीं है. लेकिन अदालत ने पीड़िता के आरोपों से सहमति जतायी.

स्थानीय अदालत के बाद यह मामला हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक गया. अंततः इस शनिवार को दुर्ग की फ़ास्ट ट्रैक अदालत ने गवाहों और सबूतों के आधार पर अपना फ़ैसला सुनाया.

अदालत ने अपने फ़ैसले में कहा है कि अपराध की प्रकृति को देखते हुए निमिष अग्रवाल को भारतीय दंड संहिता 1860 की धारा 377 के तहत नौ साल के सश्रम कारावास की सज़ा सुनाई जाती है. साथ ही अदालत ने उन पर 10 हज़ार रुपये का जुर्माना भी लगाया है.

मैरिटल रेप, अप्राकृतिक कृत्य और भारतीय न्याय संहिता

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जानकारों का कहना है कि इस फ़ैसले की काफ़ी अहमियत है और ऐसे मुद्दों पर समाज में एक समझ भी विकसित होती है, क्योंकि ऐसे विषयों पर कम ही चर्चा होती है.

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के वकील दिवेश कुमार का कहना है कि दुर्ग की अदालत ने जो फ़ैसला सुनाया है, उसमें अभी अभियुक्तों के पास अदालत में अपील के अवसर बचे हुए हैं. लेकिन इस तरह के फ़ैसलों से इन मुद्दों पर एक सामाजिक समझ का भी विकास होता है.

दिवेश कुमार कहते हैं, "यह फ़ैसला ऐसे समय में आया है, जब भारत में मैरिटल रेप यानी पत्नी के साथ ज़बरदस्ती शारीरिक संबंध बनाने को अपराध बनाए जाने से संबंधित याचिकाएँ सुप्रीम कोर्ट में लंबित हैं. ये ऐसे वर्जित विषय मान लिए गए हैं, जिन पर समाज में चर्चा नहीं होती या कम होती है."

गौरतलब है कि भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 375 में बलात्कार की परिभाषा बताई गई है और उसे अपराध बताया गया है. धारा 376 के अंतर्गत इस अपराध की सज़ा का प्रावधान है. इसी तरह धारा 377 में अप्राकृतिक यौन कृत्य को रखा गया गया है.

लेकिन धारा 375 के अपवाद 2 के अनुसार कोई पुरुष 15 साल या उससे अधिक उम्र की अपनी पत्नी के साथ, बिना सहमति के शारीरिक संबंध बनाता है तो वो बलात्कार नहीं कहलाएगा. हालाँकि 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने महिला की उम्र 15 वर्ष से बढ़ाकर 17 वर्ष कर दी थी.

भारतीय दंड संहिता की धारा 375 के इसी अपवाद 2 पर आपत्ति जताते हुए याचिकाएँ दायर की गई हैं.

नए क़ानून में धारा 377 जैसा प्रावधान नहीं

अधिवक्ता और सामाजिक कार्यकर्ता प्रियंका शुक्ला

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हाईकोर्ट की ही अधिवक्ता और सामाजिक कार्यकर्ता प्रियंका शुक्ला दुर्ग के फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट के इस फ़ैसले के दूसरे पहलू की बात करते हुए कहती हैं कि सोमवार को राष्ट्रपति ने भारतीय दंड संहिता यानी आईपीसी की जगह लेने वाली भारतीय न्याय संहिता यानी बीएनएस के जिस विधेयक को मंज़ूरी दी है, उसमें भारतीय दंड संहिता की धारा 377 जैसा कोई प्रावधान ही नहीं है.

भारतीय दंड संहिता की धारा 377 के मुताबिक़ अगर कोई व्यक्ति अप्राकृतिक रूप से यौन संबंध बनाता है, तो उसे उम्र क़ैद या जुर्माने के साथ 10 साल तक की क़ैद का प्रावधान था.

प्रियंका शुक्ला कहती हैं, "2018 में सुप्रीम कोर्ट ने यह कहते हुए इस धारा को आंशिक रूप से रद्द कर दिया था कि वयस्कों के बीच सहमति से बनाए गए किसी भी तरह के यौन संबंध को अपराध नहीं ठहराया जा सकता क्योंकि यह संविधान द्वारा मिली समानता, जीवन और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकारों के ख़िलाफ़ है."

प्रियंका कहती हैं कि "दुर्ग की अदालत का यह फ़ैसला ऐसे समय में आया है, जब दिल्ली हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएँ लंबित हैं, जिनमें पति के ख़िलाफ़ 377 का इस्तेमाल किया जा सकता है या नहीं, उसे स्पष्ट करने की मांग की गई है."

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इसके अलावा इसी महीने इलाहाबाद हाई कोर्ट में जस्टिस राममनोहर नारायण मिश्रा की पीठ ने ऐसे ही एक मामले में, मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के एक फ़ैसले का समर्थन करते हुए कहा कि वैवाहिक रिश्ते में किसी भी 'अप्राकृतिक अपराध' यानी धारा 377 के लिए कोई जगह नहीं है.

इसी साल सितंबर के महीने में आए मध्य प्रदेश के एक फ़ैसले में अदालत ने कहा था कि पति और पत्नी के बीच वैवाहिक रिश्ते में प्यार शामिल होता है, जिसमें अंतरंगता, करुणा और त्याग होता है.

हालांकि पति और पत्नी की भावनाओं को समझना मुश्किल है, लेकिन यौन सुख, एक-दूसरे के साथ उनके निरंतर बंधन का अभिन्न अंग है.

अदालत की राय में, "पति और पत्नी के बीच यौन संबंधों में कोई बाधा नहीं डाली जा सकती. इस प्रकार, हमें यह संभव लगता है कि धारा 375 की संशोधित परिभाषा के मद्देनज़र, पति और पत्नी के बीच 377 के अपराध के लिए कोई जगह नहीं है."

प्रियंका कहती हैं, "वैवाहिक बलात्कार का मामला अभी सुप्रीम कोर्ट में लंबित है. इसी तरह भारतीय दंड संहिता की धारा 377 को लेकर भी याचिकाएं लंबित हैं. ऊपर से सोमवार को राष्ट्रपति ने जिन तीन विधेयकों पर हस्ताक्षर किए हैं, उस भारतीय न्याय संहिता में अप्राकृतिक यौन कृत्य से संबंधित कोई धारा ही नहीं है. ज़ाहिर है, अभी कई पेंच हैं और इन मुद्दों पर साफ़-साफ़ राय बनाने के लिए थोड़ा इंतज़ार करना होगा."

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