सहमति से पनपने वाले संबंध और नैतिकता के द्वंद्व- ब्लॉग

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- Author, नासिरुद्दीन
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
अगर दो बालिग़ व्यक्ति अपने निजी दायरे में रज़ामंदी से किसी रिश्ते में हैं तो क्या यह ग़लत होगा?
अगर इनमें से एक शादीशुदा है या दोनों शादीशुदा हैं और शादी से अलग इनके रिश्ते हैं, तो क्या यह अपराध होगा? क्या ऐसे मामले में मर्द की ‘बेवफ़ाई’ के लिए लड़की ही ज़िम्मेदार होती है?
क्या इसकी सार्वजनिक तौर पर लानत-मलामत करने की इजाज़त दी जा सकती है? क्या ऐसे मामले में हिंसा करना, उस हिंसा का वीडियो बनाना और उस वीडियो को सार्वजनिक करना सही है?
ऐसे कई सवाल बार-बार सामने आते हैं और पिछले दिनों सोशल मीडिया पर घूम रहे एक वीडियो को देखने के बाद ज़हन में उठते रहे हैं.
इसमें कुछ पुरुष और महिलाएँ एक मर्द और स्त्री को पकड़े हैं. उन पर चिल्ला रहे हैं. उनकी पिटाई कर रहे हैं.
पता चला कि जिन दो व्यक्तियों की पिटाई हो रही है, वे पुलिस विभाग से जुड़े हैं. मर्द शादीशुदा है. पिटाई करने वालों में उसकी पत्नी और उसके ससुराल के रिश्तेदार शामिल हैं.
ऐसा नहीं है कि इस तरह का यह कोई पहला वीडियो था या ऐसी कोई पहली घटना थी.
अगर इंटरनेट पर सर्च करें तो ऐसी अनेक घटनाएं मिल जाएंगी. इन सबका इस्तेमाल ख़बर के तौर पर मिल जाएगा. यह घटना चर्चा में ज़्यादा रही क्योंकि दोनों पुलिस वाले हैं.
ऐसे मामले को देखने का कई नज़रिया है. एक नज़रिया सामाजिक है तो दूसरा नैतिकता का है. तीसरा नज़रिया क़ानून का है. चौथा नज़रिया है कि सभ्य समाज में सार्वजनिक तौर पर ऐसे मामले को कैसे देखा जाना चाहिए.

समाज की नज़र में

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समाज की नज़र में शादीशुदा व्यक्तियों का शादी से बाहर यौन रिश्ता ग़लत है. अनैतिक है. बेवफ़ाई है. व्यभिचार है. जुर्म है.
वैसे तो समाज ऐसे किसी भी यौन रिश्ते को सार्वजनिक तौर पर मंज़ूर नहीं करता, जो शादी के रिश्ते के बाहर हो. चाहे वह रिश्ता दो शादीशुदा व्यक्तियों के बीच हो या दोनों में से एक शादीशुदा हों या दोनों ही अविवाहित हों.
इसलिए वह शादी के रिश्ते में रह रहे व्यक्तियों का अन्य व्यक्तियों से आपसी रज़ामंदी से बनाए यौन रिश्ते को भी नामंज़ूर करता है. ज़रूरी नहीं कि ऐसा यौन रिश्ता बनाने वाले दोनों व्यक्ति शादीशुदा हों.
कुछ लोग इसे अनैतिक भी मानते हैं. इसलिए कहा जा सकता है कि नैतिकता का तकाज़ा होना चाहिए कि अगर किसी को ऐसे रिश्ते में रहना है तो वह अपने पहले के रिश्ते से अलग हो जाए.
हालाँकि, यह कहना आसान है. किसी भी रिश्ते से निकलना कठिन.
क़ानून की नज़र में रिश्ता

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भारतीय क़ानून में ‘व्यभिचार’ बहस का मुद्दा रहा है. पहले यह भारतीय दंड संहिता में धारा 497 के तहत आता था. इसे भेदभाव वाला और स्त्रियों के ख़िलाफ़ भी माना गया.
पुराने क़ानून के तहत होता यह था कि अगर कोई शादीशुदा स्त्री-पुरुष, अपनी शादियों से इतर रज़ामंदी से यौन रिश्ते में रहते थे तो यह व्यभिचार का अपराध था. यह अपराध भी सशर्त था.
इसके तहत पुरुष ही दोषी माना जा सकता था. स्त्री नहीं. यह अपराध भी तब माना जाता था, जब स्त्री का पति दूसरे पुरुष के ख़िलाफ़ मुक़दमा दर्ज कराए.
इसमें स्त्री के ख़िलाफ़ मुक़दमा दर्ज नहीं हो सकता था. अगर पति की सहमति से कोई दूसरा पुरुष स्त्री से संबंध बनाए तो वह व्यभिचार के अपराध के दायरे में नहीं आता था.
यही नहीं, अगर कोई शादीशुदा पुरुष किसी अविवाहित या ऐसी महिला से यौन सम्बंध बनाए, जिसका पति नहीं रहा, तो वह भी व्यभिचार के दायरे में नहीं आता था.
2018 में सुप्रीम कोर्ट की पाँच न्यायाधीशों की संवैधानिक पीठ ने ‘व्यभिचार’ को अपराध नहीं माना. इसे असंवैधानिक बताया और इस धारा को रद्द कर दिया.
कोर्ट के मुताबिक, इसे अपराध मानना सही नहीं है. यह स्त्री की गरिमा के ख़िलाफ़ है. स्त्री, पुरुष की जायदाद नहीं है. यह शादीशुदा ज़िंदगी की निजता में दख़लंदाज़ी होगी. हालाँकि सुप्रीम कोर्ट ने साफ़ किया था कि ‘व्यभिचार’ तलाक़ का आधार रहेगा.
भारतीय न्याय संहिता के तहत भी व्यभिचार यानी शादी से इतर यौन संबंध अपराध नहीं है. जब यह क़ानून बन रहा था तब ज़रूर मांग उठी थी कि इसे शामिल किया जाए और जेंडर निरपेक्ष बनाया जाए. यानी स्त्री-पुरुष दोनों पर मुक़दमा दर्ज हो सके.
आख़िरकार इसे शामिल नहीं किया गया.
सहमति को समझना ज़रूरी है

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यौन रिश्ते में रज़ामंदी को समझना निहायत ज़रूरी है.
चाहे वह रिश्ता शादीशुदा दायरे में हो या उसके बाहर. अगर दो व्यक्ति बालिग़ हैं, तो उनके बीच रज़ामंदी से बनाया गया रिश्ता ग़लत नहीं हो सकता… और असहमति से बनाया गया रिश्ता यानी ज़बरदस्ती बनाया गया रिश्ता ग़लत होगा. चाहे वह शादीशुदा रिश्ते में हो या उस दायरे से बाहर.
इसलिए ऐसे किसी मामले को जिसमें रज़ामंदी शामिल है, अपराध के तौर पर देखना या उसे अपराध की तरह निपटने का तरीक़ा अपनाना सही नहीं है.
हमला लड़की पर ज़्यादा

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यही नहीं, जब ऐसे मामले सामने आते हैं तो चर्चा के केन्द्र में लड़की होती है.
उसे ही निशाना बनाया जाता है. उसे ही ऐसे रिश्ते के लिए ज़िम्मेदार बनाया जाता है. पुरुष तो ‘बेचारा’ हो जाता है.
ज़्यादातर ऐसे मामलों में पत्नी ने और समाज ने पति को बेचारा माना और लड़की को ज़िम्मेदार. यानी लड़की ने अपने ‘जाल’ में बेचारे मर्द को ‘फँसा’ लिया.
लड़की का चरित्रहनन भी होता है. कोई पूछ सकता है कि आख़िर लड़की का अपराध क्या था?
ऐसे मामले पर प्रतिक्रिया कैसी हो

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हालाँकि, ऐसे मामले पर बोलना दोधारी तलवार पर चलना है. आमतौर पर सामाजिक नज़रिया इसके ख़िलाफ़ में खड़ा होता है.
ऐसी घटनाओं पर बोलने को ऐसे रिश्तों की हिमायत के तौर पर देखा जा सकता है. मगर कई बार यह जोखिम उठाना ज़रूरी हो जाता है.
जिस तरह से सार्वजनिक तौर पर दोनों व्यक्तियों को पीटने, शर्मिंदा और बेइज़्ज़त करने का तरीक़ा अपनाया गया, वह सभ्य समाज में नहीं होना चाहिए. यह भीड़ की सज़ा है. भीड़ कभी इंसाफ़ नहीं करती. यह एक संवेदनशील मुद्दे का अमानवीयकरण है.
यह किसी की निजता में दखलंदाज़ी भी है. जो लोग, इस मामले से सीधे नहीं जुड़े हैं, वे ऐसी घटनाओं का मज़ा ही लेते हैं. जैसे- दो लोग पिट रहे हैं और कुछ लोग खड़े होकर वीडियो बना रहे हैं.
इस घटना में भी जहाँ यह वीडियो साझा हो रहा था, उसके साथ की टिप्पणियाँ बताती हैं कि लोग मज़ा ले रहे थे. उनमें से किसी की दिलचस्पी इस बात पर नहीं थी कि किसी दुखी के दुख को कम करें.
हाँ, इससे किसी को बेइज़्ज़त करेंगे, यह सोच ज़रूर रही होगी.
कुछ लोगों को लग सकता है कि व्यभिचार का क़ानून रहता तो ऐसा न होता. वे भ्रम में हैं. पुराना क़ानून भी रहता तो भी वह महिला ‘व्यभिचार’ का मुक़दमा दर्ज़ नहीं करा पाती.
क्योंकि वह क़ानून स्त्री के स्वतंत्र अस्तित्व को मानता ही नहीं था. वह क़ानून स्त्री के ख़िलाफ़ था.
कुछ सवाल - ज़रूरी जवाब

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अब सवाल है, सभ्य समाज में ऐसे रिश्ते को कैसे देखना चाहिए?
ऐसी स्थिति से कैसे निपटना चाहिए? क्या इंसाफ़ का ज़िम्मा भीड़ को ले लेना चाहिए? क्या किसी की निजता को भंग करने की इजाज़त दी जा सकती है?
क्या पिटाई और सार्वजनिक निंदा से कुछ हासिल होने वाला है? क्या पिटाई या निंदा से वह पति लौट आएगा?
क्या उन दोनों के बीच के रिश्ते सामान्य हो पाएँगे? क्या वह मोहब्बत से रहने लगेंगे?
उस पत्नी को कैसे राहत मिलेगी? पत्नी के पास क्या रास्ते हैं? क्या ऐसे रिश्ते इकतरफ़ा होते हैं? क्या इसके लिए लड़की को दोषी ठहराया जा सकता है?
हमें ठहरकर इन सवालों पर तनिक सोचना चाहिए. वृहद समाज का नज़रिया सही ही हो, यह ज़रूरी नहीं है. समाज बहुत सारे मामले में दकियानूसी, सामंती और पितृसत्तात्मक सोच रखता है.
रिश्तों के मामले में ऐसा ज़्यादा होता है. उसने कुछ रिश्तों की ही इजाज़त दी है. क़ानून का नज़रिया भी कई बार समाज के नज़रिये को ही आगे बढ़ाता है.
मगर संविधान के मूल्यों के आधार पर तय क़ानून, ही हमारा नज़रिया होना चाहिए. ऐसे मामले को देखने का तरीक़ा भी इसी तरह निकलेगा. वीडियो बनाकर वायरल करने से टूटते रिश्ते नहीं जुड़ते.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित
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