महेंद्र सिंह धोनी ने छक्का मार कर जीता था भारत के लिए विश्व कप
- Author, रेहान फ़ज़ल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता

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जब भारत 2011 के विश्व कप के सेमी फ़ाइनल में पहुंचा और मोहाली में उसका पाकिस्तान से मुक़ाबला होना तय हुआ तो तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने वो मैच देखने के लिए पाकिस्तान के प्रधानमंत्री यूसुफ़ रज़ा गिलानी को मोहाली आमंत्रित किया.
मैच के दिन 30 मार्च को भारत और पाकिस्तान के बहुत से राज्यों ने छुट्टी घोषित कर दी ताकि ज़्यादा से ज़्यादा लोग उस मैच को टीवी पर देख सकें. टॉस जीतकर भारत ने पहले खेलते हुए निर्धारित 50 ओवरों में 9 विकेट पर 260 रन बनाए थे.
सचिन तेंदुलकर ने 85 रन बनाए, लेकिन उसमें उनकी मदद की तीसरे अंपायर और पाकिस्तानी फ़ील्डरों ने. जब वो 23 रन पर थे तो अंपायर गोल्ड ने उन्हें एलबीडब्लू आउट दे दिया, लेकिन तीसरे अंपायर ने कहा कि वो गेंद लेग स्टंप मिस कर रही थी.
इसके बाद पाकिस्तानी क्षेत्ररक्षकों ने चार बार उनका कैच छोड़ा. जवाब में पाकिस्तानी टीम दो विकेट खोकर 103 रनों पर पहुंच गई. 42वें ओवर में उनका स्कोर था 7 विकेट खोकर 184 रन.
लेकिन तभी पाकिस्तानी टीम के कप्तान शाहिद अफ़रीदी ने हरभजन सिंह की गेंद को मैदान से बाहर मारने के चक्कर में कैच दे दिया.
इसके बाद पाकिस्तानी टीम बिखर गई. इस तरह भारत 29 रनों से वो मैच जीत कर फ़ाइनल में पहुंच गया.
धोनी के पास विनोद कांबली का फोन आया

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जब सचिन तेंदुलकर श्रीलंका के ख़िलाफ़ फ़ाइनल मैच खेलने मुंबई पहुंचे तो उनके कान में रवि शास्त्री के शब्द गूँज रहे थे कि इस मैच में धोनी की तुलना में तुम्हारे ऊपर दबाव अधिक होगा, क्योंकि मुंबई और भारत के दर्शक सिर्फ़ कप ही जीतना नहीं चाहेंगे बल्कि वो ये भी चाहेंगे कि तुम अपने होम टाउन में शतक भी लगाओ.
मैच से एक दिन पहले महेंद्र सिंह धोनी के पास एक शख़्स का फ़ोन आया जिसे वो जानते तो थे लेकिन वो फ़ोन पर उसकी आवाज़ पहचान नहीं पाए. उस शख़्स का नाम था विनोद कांबली. कांबली फ़ोन पर रो रहे थे.
उन्होंने धोनी से कहा, ''कल की रात तुम्हारी होगी, होनी पड़ेगी, तुम जीतोगे.'' उन्होंने याद किया किस तरह भारतीय प्रशंसकों ने उन्हें 1996 में श्रीलंका के ख़िलाफ़ सेमीफ़ाइनल हारने के लिए कभी माफ़ नहीं किया है. फ़ोन काटने से पहले उन्होंने कहा, ''तुम्हें इस बार जीतना ही होगा.''
महेला जयवर्धने की शानदार पारी

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जब मैच रैफ़री जेफ़ क्रो ने टॉस करने के लिए सिक्का उछाला तो श्रीलंका के कप्तान कुमार संगकारा ने कहा ‘हेड्स’ लेकिन दर्शकों के शोर के कारण क्रो संगकारा की आवाज़ नहीं सुन पाए. इसलिए टॉस दोबारा करवाया गया. संगकारा ने इस बार भी ‘हेड्स’कहा. जब सिक्का नीचे गिरा तो वो ‘हेड्स’ था. संगकारा ने पहले बैटिंग चुनने में देर नहीं की.
श्रीलंका की पारी के अधिकतर समय तक भारत नियंत्रण में था. श्रीलंका की टीम ने 5 विकेट पर 182 रन बना लिए थे, लेकिन महेला जयवर्धने ने 103 रनों की नाबाद पारी खेलते हुए स्कोर 274 पहुंचा दिया था.
सचिन तेंदुलकर अपनी आत्मकथा ‘प्लेइंग इट माई वे’ में लिखते हैं, ''हम युवराज सिंह सिंह की वजह से मैच में वापस आए जब उन्होंने संगकारा को 48 रनों के स्कोर पर विकेट के पीछे कैच करवाया. ज़हीर ख़ान ने एक के बाद एक तीन मैडेन ओवर फेंके, लेकिन महेला जयवर्धने के शतक के बाद श्रीलंका ने जो लक्ष्य हमें दिया वो आसान नहीं था.''
भारत के दो विकेट बहुत जल्दी जल्दी गिरे

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भारत की शुरुआत बहुत ही ख़राब थी. वीरेंद्र सहवाग दूसरी ही गेंद पर बिना खाता खोले एलबीडब्लू आउट हो गए. तेंदुलकर ने 14 गेंद खेलकर 18 रन बनाए. मुंबई उनसे शतक की उम्मीद करने लगा लेकिन तभी उन्होंने मलिंगा की एक गेंद को एज किया और संगकारा ने उन्हें विकेट के पीछे लपक लिया.
सचिन तेंदुलकर लिखते हैं, ''आउट फ़ील्ड पर ओस गिर रही थी. मैंने सोचा कि हमारे लिए ज़रूरी है कि हम गेंद को तीस गज़ के सर्किल के बाहर मारने की कोशिश करें ताकि वो गीली हो जाए. गीली होने की वजह से गेंद स्विंग होना बंद हो जाएगी. लेकिन इससे पहले कि ये योजना अमल मे आती, सहवाग शून्य पर आउट हो गए. मैंने दो चौके लगाए. मैं गेंद को अच्छा टाइम कर रहा था. मुझे लगा कि गेंद ने स्विंग होना बंद कर दिया है, मुझे लालच हुआ कि मैं मलिंगा की ऑफ़ स्टंप के बाहर फेंकी गई गेंद को ड्राइव करूँ लेकिन गेंद ने स्विंग किया और मैंने विकेटकीपर को कैच थमा दिया.''
इसके बाद विराट कोहली और गौतम गंभीर ने शानदार स्ट्रोक प्ले और बेहतरीन रनिंग बिटवीन द विकेट के ज़रिए भारतीय पारी को सँभालने की कोशिश की. ये दोनों स्कोर को 114 तक ले गए लेकिन तभी विराट कोहली को 35 रनों के उनके निजी स्कोर पर दिलशान ने कॉट एंड बोल्ड कर दिया.
नंबर चार पर धोनी बैटिंग करने उतरे

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तभी धोनी ने ऐसा फ़ैसला लिया जिसने मैच के रुख़ को बदल दिया. उन्होंने अपनेआप को प्रमोट किया और युवराज सिंह की जगह ख़ुद बैटिंग करने उतरे. इससे पहले भी वो कई बोल्ड फ़ैसले कर चुके थे. उन्होने आशीष नेहरा और पीयूष चावला को टीम में चुनने पर ज़ोर दिया, जबकि रविचंदन अश्विन टीम में मौजूद थे और चेन्नई सुपर किंग में उनकी टीम में खेलते थे. फिर भी उन्होंने उन्हें एक भी मैच में नहीं खिलाया.
फ़ाइनल मैच में जब नेहरा की उंगली टूट गई तो वो उनकी जगह श्रीसंत को टीम में लाए जबकि उन्होंने तब तक बांग्लादेश के खिलाफ़ सिर्फ़ एक मैच खेला था. उसमें भी पाँच ओवरों में उन्होंने 55 रन लुटाए थे.
खुद को प्रमोट करने के पीछे उनकी सोच ये थी कि श्रीलंका के पास दो ऑफ़ स्पिनर मुरलीधरन और सूरज रंडीव थे. रंडीव को वो चेन्नई सुपर किंग के अपने दिनों से जानते थे. उनका मानना था कि इन दोनों को खेलने मे अन्य भारतीय बल्लेबाज़ों की तुलना में उन्हें कम मुश्किल होगी.
धोनी ये भी जानते थे कि जैसे-जैसे रात गहरी होगी मैदान पर ओस बढ़ती जाएगी और अगर वो श्रीलंका के स्पिनर्स पर हावी हो गए तो वो खेल के रुख़ को भारत की तरफ़ मोड़ देंगे. उन्होंने कोच गैरी कर्स्टन से इस बारे में सलाह ली और कर्स्टन ने भी कहा कि युवराज की जगह तुम क्रीज़ पर उतरो. तब तक धोनी ने पूरे टूर्नामेंट में सिर्फ़ 150 रन बनाए थे. उनका सर्वोच्च स्कोर 34 था, जो उन्होंने आयरलैंड की टीम के ख़िलाफ़ बनाए थे.
धोनी का विजयी शॉट

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पहली गेंद से ही महेंद्र सिंह धोनी ये सिद्ध करने में लग गए कि उन्हें एकदिवसीय क्रिकेट में सर्वश्रेष्ठ फ़िनिशर क्यों कहा जाता है. गंभीर और धोनी ने चौथे विकेट के लिए 109 रन जोड़े, लेकिन तभी गंभीर 97 रनों के अपने निजी स्कोर पर शतक के लिए चौका मारने के प्रयास में बोल्ड हो गए. तब तक भारत को 52 गेंदों पर 52 रन बनाने थे.
तभी धोनी का साथ देने युवराज सिंह आए. दोनों भारत को जीत के करीब ले गए. मिहिर बोस अपनी किताब ‘द नाइन वेव्स’ में लिखते हैं, ''आख़िर में भारत को 11 गेंदों पर सिर्फ़ 4 रनों की दरकार थी. इस परिस्थिति में ज़्यातर बल्लेबाज़ एक-एक रन लेकर लक्ष्य को प्राप्त करने की कोशिश करते, लेकिन राँची के इस लड़के ने क्लासिक अंदाज़ में भारत को जीत दिलाने का बीड़ा उठाया.
जैसे ही कुलशासेखर ने अपने आठवें ओवर की दूसरी गेंद की, धोनी ने अपना दाँया घुटना मोड़ा और गेंद को लॉन्ग ऑन पर छह रनों के लिए उठा दिया. उस समय 10 बज कर 49 मिनट हुए थे और धोनी की आँखें वानखेड़े स्टेडियम के नॉर्थ स्टैंड की तरफ़ लगी हुई थीं, जहाँ उन्होंने वो शॉट खेला था.
नॉन स्ट्राइकर एंड पर खड़े युवराज सिंह ने गेंद के बाउंड्री तक पहुंचने से पहले ही अपने हाथ हवा में उठा दिए थे. ये शॉट क्रिकेट जगत का सबसे मशहूर शॉट बन गया था. इसपर सुनील गावस्कर बोले थे, ''मरने से पहले मैं सबसे आख़िरी चीज़ धोनी का वो शॉट देखना चाहूँगा जिसे मार कर उसने हमें 2011 विश्व कप का विजेता बनवाया था.'' जैसे ही अंपायर ने छक्के का इशारा किया युवराज उछले और धोनी की तरफ़ दौड़ गए. उन्होंने धोनी को गले लगाया और वहीं रोने लगे.
उस दिन हुई प्रेस कॉन्फ़्रेंस में दोनों एक दूसरे का हाथ पकड़े रहे. युवराज ने कहा, ''धोनी के हाथों में जादू है. वो जिस चीज़ को छूते हैं, वो सोना बन जाती है.'' इस पर धोनी का जवाब था, ''युवराज राजा है. जब वो खेलते हैं, हम जीतते हैं.''
विराट कोहली और यूसुफ़ पठान ने सचिन तेंदुलकर को कंधों पर उठाया
सन 1983 में जब भारत ने विश्व कप जीता था कपिल देव सेंटर स्टेज में थे. उसके ठीक उलट 2011 की जीत में महेंद्र सिंह धोनी पूरी तरह स बैक ग्राउंड में थे. वो थोड़ी देर के लिए भावुक ज़रूर हुए लेकिन उन्होंने अपने आँसू छिपा लिए.
तेंदुलकर ने भले ही शतक न लगाया हो या विजयी रन स्कोर न किया हो लेकिन धोनी ने ये सुनिश्चित किया कि ये शाम उनके लिए हमेशा यादगार रहे. धोनी देख सकते थे कि तेंदुलकर की आँखों में आँसू थे. उन्होने उनके हाथ में भारत का झंडा पकड़ा दिया.
विराट कोहली और यूसुफ़ पठान ने उसी समय सचिन को अपने कंधों पर उठा लिया. बाद में उन्होंने कहा, ''अगर हम अब उन्हें अपने कंधों पर नहीं उठाएंगे तो कब उठाएंगे ? उन्होंने 21 सालों तक देश की उम्मीदों का बोझ अपने कंधों पर उठाया है. अब समय आया है कि हम उन्हें अपने कंधों पर उठा कर वानखेड़े स्टेडियम का चक्कर लगाएं.

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सचिन लिखते हैं, ''मुझे याद है मैंने यूसुफ़ पठान से कहा भाई मुझे गिरा मत देना. इस पर पठान बोले थे, 'गिर जाएंगे पर आपको नीचे नहीं आने देंगे.' मैंने क्रिकेट के एवरेस्ट को छू लिया था. मेरे साथ हर भारतवासी सड़कों पर आकर भारत की जीत की खुशी मना रहा था.''
अगले दिन दुनिया भर के अख़बारों में वो तस्वीर छपी जिसमें विराट के कंधों पर सवार सचिन तेंदुलकर आसमान की तरफ़ देख रहे हैं और उनके हाथ में भारत का झंडा है. उनके बगल में खड़े हरभजन सिंह की भी आँखें भरी हुई हैं. उनके भी हाथ में भारत का झंडा है.
महेंद्र सिंह धोनी बिना आस्तीनों की टीशर्ट पहने हुए हैं और लोगों की आँखों से इतने ओझल हैं कि आपको उन्हें पहचानने के लिए मशक्कत करनी पड़ रही है. उन्हें देख कर कतई नहीं लगता कि इस शख़्स ने विश्व कप जीतने वाली टीम की कप्तानी की है और उन्हीं के लगाए विजयी छक्के की बदौलत 28 सालों बाद विश्व कप भारत लौटा है.
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