वर्ल्ड कप में टीम इंडिया विराट कोहली की है या महेंद्र सिंह धोनी की?

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- Author, सुरेश मेनन
- पदनाम, वरिष्ठ खेल पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
भारतीय क्रिकेट टीम 1987 के वर्ल्ड कप से ही हर बार खिताब जीतने के दावेदारों में शामिल रही है और 2011 में तो भारतीय टीम ने ये करिश्मा कर भी दिखाया.
अमूमन किसी भी वर्ल्ड कप के दौरान चार टीमों को दावेदार माना जाता रहा है. इस बार भी यही हाल है.
क्रिकेट विश्लेषकों और सट्टेबाजों की नजरों में मेज़बान इंग्लैंड के अलावा ऑस्ट्रेलिया और भारत को दावेदार माना जा रहा है. इन टीमों के सेमीफाइनल में पहुंचने की उम्मीद की जा रही है और ये टीमें वास्तव में बेहद संतुलित भी दिख रही हैं.
सेमीफाइनल की चौथी टीम के लिए दक्षिण अफ्ऱीका और न्यूजीलैंड के बीच होड़ है. हालांकि कभी क्रिकेट का बादशाह कहलाने वाली वेस्टइंडीज के लिए भी यहां अच्छा मौका है.
इस वर्ल्ड कप में खेलने के लिए वेस्टइंडीज को क्वालिफाईंग टूर्नामेंट से गुज़रना पड़ा है लेकिन यह टीम प्रतिभाशाली खिलाड़ियों से भरी हुई है और इसके बारे में कुछ भी अंदाजा लगा पाना असंभव है. वहीं दूसरी ओर न्यूजीलैंड की टीम किसी अन्य टीम के मुकाबले सबसे ज़्यादा बार सेमीफाइनल में पहुंची है.
लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या भारत इस बार वर्ल्ड जीत सकता है?
इसका जवाब बिलकुल हां में है, लेकिन सेमीफाइनल में पहुंचने वाली चार टीमों में कोई भी टीम यह कारनामा कर सकती है.

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इस बार वर्ल्ड कप में अफ़गानिस्तान, बांग्लादेश और श्रीलंका जैसी टीमें भी जो किसी भी टीम को अपसेट करने का दमखम रखती हैं. श्रीलंकाई टीम तो 1996 में चैंपियन बनने के साथ तीन बार फ़ाइनल में पहुंच चुकी हैं.
लेकिन वर्ल्ड कप में वही टीम कामयाब होती है जिसमें निरंतर बेहतर करने का दमखम मौजूद हो, जो टीम किसी सेटबैक से वापसी कर पाए और लगातार मैचों में जीत हासिल करने का माद्दा भी रखे.
यह भी हकीकत है कि धमाकेदार शुरुआत करने और शुरुआत से ही टूर्नामेंट जीत लेने का दमखम दिखाने वाली टीमें अमूमन खिताब जीतने में नाकाम रही हैं. वर्ल्ड कप पर कब्जा उन टीमों ने जमाया है जिन्होंने अपेक्षाकृत धीमी शुरुआत की है, मैच दर मैच आत्मविश्वास को हासिल किया है, कमजोरियों के चलते एक-दो मैच गंवाए हैं और उन गलतियों को दुरुस्त करते हुए टूर्नामेंट में अपनी वापसी की है.
कई बार बीच टूर्नामेंट का कोई मैच, टीम के लिए टर्निंग प्वाइंट साबित हुआ है. 2011 के वर्ल्ड कप में भारतीय टीम ऑस्ट्रेलिया को हराने के बाद एक अलग टीम के तौर पर उभरी. इस टीम के फील्डिंग का स्तर भी काफ़ी सुधरा हुआ था.
इंग्लैंड में खेले जा रहे वर्ल्ड कप के सेमीफाइनल में पहुंचने के लिए किसी भी टीम को राउंड रोबिन लीग में कम से कम पांच मैच जीतने होंगे. शीर्ष चार टीमें सेमीफ़ाइनल में पहुंचेंगी.
भारतीय समर्थकों को उम्मीद है कि उनकी टीम निचले पायदान की तीन टीमों को आसानी से हरा देगी. इसके अलावा वेस्टइंडीज के खिलाफ भी टीम को जीत मिलने की उम्मीद की जा रही है. इसके बाद टीम को सेमीफाइनल में पहुंचने के लिए केवल एक मैच जीतने की ज़रूरत होगी. लेकिन यह इतना आसान नहीं होगा क्योंकि यही तर्क दूसरी टीमों के लिए भी लागू होगा.
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इन सबके साथ ही 16 जून भी आएगा, जिस दिन भारतीय टीम वर्ल्ड कप में पाकिस्तान का मुकाबला करेगी. दोनों टीमों के बीच हाल के सालों में कोई सिरीज़ नहीं हुई है. दोनों टीमों केवल मल्टी नेशनल टूर्नामेंट में आमने सामने हुई हैं.
वर्ल्ड कप क्रिकेट के अपने दो ख़ास बातों के लिए मशहूर है, एक तो दक्षिण अफ्रीकी टीम इस टूर्नामेंट में लगातार नाकाम रही है, जिसके चलते उन्हें चोकर्स भी कहा जाता है. वहीं दूसरी ख़ास बात यह है कि वर्ल्ड कप में भारत पाकिस्तान से अब तक नहीं हारा है.
दोनों टीमें वर्ल्ड कप क्रिकेट में अब तक छह बार एक दूसरे से टकरा चुकी हैं और भारत ने छहों बार जीत हासिल की है. इस वज़ह से भी इस बार भारत-पाकिस्तान के परंपरागत तौर पर रोमांचक रहे मुक़ाबले का रोमांच कुछ बढ़ जाएगा.
दोनों टीमों के कप्तान ने ऐसे मुकाबलों से पहले का मानक संदेश अपने-अपने खेल प्रेमियों को दे दिया है कि आखिरकार ये एक मैच ही होगा.
हालांकि उनके टीम के अपने खिलाड़ी भी इस मैच को लेकर तनाव में होंगे कि हार की सूरत में क्रिकेट फैंस उनका पुतला जला सकते हैं, उनके घरों पर पत्थर फेंक सकते हैं. क्योंकि हारने की सूरत में बात केवल क्रिकेट मुकाबले तक नहीं रहेगी.

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बहरहाल, इस वर्ल्ड कप में हिस्सा ले रही भारतीय टीम कितनी अच्छी है?
भारतीय टीम के शीर्ष तीन खिलाड़ी और आखिरी तीन खिलाड़ी विश्वस्तरीय हैं.
शिखर धवन और रोहित शर्मा की जोड़ी विश्व की सबसे बेहतरीन सलामी बल्लेबाजों की जोड़ी है. इसके बाद नंबर तीन पर विराट कोहली हैं, जिन्हें इस वक्त दुनिया का सबसे बेहतरीन ऑल राउंड बैट्समैन माना जा रहा है. इस शीर्ष क्रम में स्टाइल भी है और शानदार बैटिंग स्किल भी. अगर भारत कोई प्रयोग करे और विराट कोहली को नंबर चार बल्लेबाज़ के तौर पर आजमाए तब केएल राहुल नंबर तीन बल्लेबाज होंगे नहीं तो वे नंबर चार बल्लेबाज के तौर पर खेलेंगे.
वहीं दूसरे छोर पर, जसप्रीत बुमराह हैं, जिन्हें दुनिया का सबसे बेहतरीन गेंदबाज माना जा रहा है. बुमराह आखिरी ओवरों में शानदार गेंदबाजी करने के लिए मशहूर हो चुके हैं.
हालांकि उनके शुरुआती ओवर भी उतने ही घातक साबित हुए हैं. मोहम्मद शमी और भुवनेश्वर कुमार भी शानदार फॉर्म में चल रहे हैं.
इन तीन तेज गेंदबाजों के अलावा टीम में दो कलाई के स्पिनर भी हैं- यजुवेंद्र चहल और बाएं हाथ के स्पिनर कुलदीप यादव. ये दोनों गेंदबाज इंग्लैंड में अपनी काबिलियत पहले भी दिखा चुके हैं.

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भारतीय टीम के लिए सब कुछ अच्छा ही हो, ऐसा भी नहीं है. मिडिल ऑर्डर टीम के लिए सबसे बड़ी चिंता की बात है.
हालांकि नंबर सात बल्लेबाज़ के तौर पर धोनी की मौजूदगी राहत की बात है. वार्मअप मैच में शतक बनाकर उन्होंने इसका संकेत भी दे दिया है. लेकिन भारतीय टीम प्रबंधन को यह तय करना होगा कि नंबर पांच पर वह एक विशुद्ध बल्लेबाज को खिलाए या फिर ऑलराउंडर को उतारे.
टीम में पांचवें गेंदबाज़ के तौर पर हार्दिक पांड्या मौजूद हैं, जो निचले क्रम में उपयोगी बल्लेबाजी कर सकते हैं. उनके अलावा बाएं हाथ के स्पिन गेंदबाज और आक्रामक बल्लेबाजी करने में सक्षम रविंद्र जडेजा भी है. केदार जाधव ऐसे बल्लेबाज़ हैं जिनका स्ट्राइक रेट 100 के ऊपर है जबकि ऑफ स्पिन गेंदबाजी में भी उनका स्ट्राइक रेट 40 के आसपास है. नंबर चार खिलाड़ी के तौर पर टीम में शामिल किए गए विजय शंकर, मीडियम पेस गेंदबाजी भी कर सकते हैं और बैटिंग ऑलराउंडर की भूमिका भी निभा सकते हैं.
विकेट के पीछ धोनी की मौजूदगी बेहद अहम होगी. हाल के मैचों में यह भी दिखा है कि भारतीय टीम दो कप्तानों के साथ खेल रही है- जब भारत बैटिंग कर रहा होता है तब कोहली कप्तान की भूमिका में होते हैं और जब भारतीय टीम फील्डिंग कर रही होती है तब धोनी कप्तान की भूमिका निभा रहे होते हैं. स्पिनरों के लिए विकेटकीपर के इनपुट्स बेहद उपयोगी होते हैं.

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आख़िर में सबसे अहम बात, वर्ल्ड कप में जीत का सेहरा कप्तान के सिर ही बंधता है.
1970 के दशक में क्लाइव लायड ने दो बार ये कारनामा कर दिखाया. 1980 के दशक में कपिल देव और एलन बॉर्डर वर्ल्ड चैंपियन बनकर उभरे. नब्बे के दशक में इमरान ख़ान, अर्जुन रणातुंगा और स्टीव वॉ ने अपनी अपनी टीमों के लिए वर्ल्ड कप जीता.
इस दशक में रिकी पॉन्टिंग, महेंद्र सिंह धोनी और माइकल क्लार्क वर्ल्ड चैंपियन कप्तान साबित हुए. इनमें से हर कप्तान ने वर्ल्ड कप के दौरान अपने लीडरशिप और अपनी पकड़ का परिचय दिया. हर किसी ने अपनी टीम को अपनी छवि के मुताबिक ढाला.
भारतीय क्रिकेट टीम का भी कोहलीकरण हो चुका है. भारत की मौजूदा कोहली की तरह ही आक्रामक, फिट और जीत की चाहत से भरी हुई है.
यह भारतीय टीम के लिए सबसे बड़ा फायदा हो सकता है. 1983 में जब भारतीय टीम ने पहली बार वर्ल्ड कप जीता था तब वह 66 के मुकाबले 1 के भाव से फेवरिट मानी जा रही थी लेकिन इस बार टीम इंडिया से उम्मीदें बहुत बहुत ज्यादा हैं.
(सुरेश मेनन विजडन इंडिया अल्मैनेक के एडिटर और द हिंदू अखबार के कांट्रिब्यूटिंग एडिटर हैं.)
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