वो पांच महिला खिलाड़ी जिनसे है भारत को ओलंपिक मेडल दिलाने की उम्मीद

पीवी सिंधु

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इमेज कैप्शन, भारतीय ओलंपिक दल में पीवी सिंधु पदकों की मज़बूत दावेदार खिलाड़ियों में से एक हैं
    • Author, मनोज चतुर्वेदी
    • पदनाम, वरिष्ठ खेल पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए

भारतीय ओलंपिक दल में पांच ऐसी महिला खिलाड़ी हैं, जो पेरिस ओलंपिक खेलों में पदक जीतने की प्रबल दावेदार हैं.

सही मायनों में भारतीय पदक उम्मीदों में इस बार महिला शक्ति का योगदान कहीं अहम रहने की संभावना है.

इन भारतीय खिलाड़ियों में वेटलिफ्टर मीराबाई चानू, पिछले दो ओलंपिक खेलों की पदक विजेता पीवी सिंधु, मुक्केबाज़ निकहत ज़रीन, महिला पहलवान अंतिम पंघाल और निशानेबाज़ सिफत कौर सामरा शामिल हैं.

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मीराबाई चानू को है लगातार दूसरे पदक की उम्मीद

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इस ओलंपिक में शामिल वेटलिफ़्टर्स में मीराबाई चानू से बेहतर प्रदर्शन करने वालीं सिर्फ़ एक वेटलिफ्टर ही हैं. इसलिए वह लगातार दूसरे ओलंपिक में पदक जीतने की दावेदार हैं.

टोक्यो ओलंपिक में रजत पदक जीतने वाली मीराबाई चानू हांगझू में चोटिल होने की वजह से पदक नहीं जीत सकी थीं.

वह एशियाई खेलों से जब दिल्ली एयरपोर्ट पर व्हीलचेयर पर उतरीं तो उनके स्वागत के लिए कोई नहीं था. उन्होंने उस समय ही तय कर लिया था कि वह जब पेरिस ओलंपिक से लौटेंगी तो उनके गले में पदक होगा.

मीराबाई चानू भारत की सबसे सफल महिला वेटलिफ्टर हैं. वह ओलंपिक रजत के अलावा विश्व चैंपियनशिप में स्वर्ण और रजत, कॉमनवेल्थ गेम्स में स्वर्ण पदक जीत चुकी हैं.

मीराबाई अपने ग्रुप में शामिल 12 वेटलिफ्टरों में इकलौती हैं, जो 200 किलो के वज़न को पार करती हैं.

मीराबाई स्नैच में 90 किलो और क्लीन एंड जर्क में 115 किलो के साथ कुल 205 किलो वज़न उठा रही हैं. इस प्रदर्शन पर पदक तो पक्का है. वह अगर अपने स्नैच के प्रदर्शन में पांच किलो का सुधार कर सकें तो गोल्ड भी आ सकता है.

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भारत के लिए ओलंपिक खेलों में दो पदक रजत और कांस्य जीतने वाली सिंधु इकलौती महिला खिलाड़ी हैं. सिंधु को बड़े मौकों पर अपना बेस्ट देने वाली खिलाड़ी के तौर पर माना जाता है.

इसमें कोई दो राय नहीं है कि पीवी सिंधु अभी अपनी पूरी रंगत में नहीं हैं. इसकी वजह उनका पिछला कुछ समय से चोटिल रहना है. पर सिंधु के लिए बीडब्ल्यूएफ सर्किट में अच्छी फॉर्म में रहना ओलंपिक में प्रदर्शन के लिए मायने नहीं रखता है.

सिंधु का साल 2024 में जीत का प्रतिशत 62.5 है. वहीं उन्होंने 2016 के रियो ओलंपिक में जब 21 साल की थीं, तब वह रजत पदक जीतने वाली पहली शटलर बनी थीं, उस साल भी उनका जीत का प्रतिशत 63 रहा था. इसी तरह 2020 के टोक्यो ओलंपिक में कांस्य पदक जीतने वाले साल उनका जीत का प्रतिशत 62.1 था.

पीवी सिंधु के साथ मेंटर के तौर पर जुड़े भारत के महानतम शटलर प्रकाश पादुकोण कहते हैं कि वह उनकी रणनीति पर काम कर रहे हैं.

वह कहते हैं कि किसी भी खिलाड़ी की सफलता में इस बात की बड़ी भूमिका होती है कि वह सही मौकों पर सही शॉट खेलना कितना जानता है. वो कहते हैं कि वह उन्हें यही सिखा रहे हैं कि किस समय स्मैश और किसी समय वॉली और किस समय ड्रॉप शॉट खेलना चाहिए.

अंतिम पंघाल का कोई जवाब नहीं

अंतिम पंघाल

इस महिला पहलवान ने 53 किलोग्राम वर्ग में सिर्फ पांच ही चैंपियनशिप खेली हैं और सभी में उन्होंने पदक जीते हैं. उनके पदकों में एशियाई चैंपियनशिप में रजत, विश्व चैंपियनशिप और एशियाई खेलों में कांस्य पदक शामिल हैं.

अंतिम पंघाल का दबदबा इसी से चलता है कि विनेश फोगाट जैसी पहलवान को यह वज़न वर्ग छोड़ना पड़ा है.

अंतिम को पेरिस में गोल्ड जीतने के लिए अकारी फुजीनामी को फ़तह करना होगा. वह 130 से ज़्यादा कुश्तियों में अजेय बनी हुई हैं. वह अगर अकारी के हाफ़ में रहती हैं तो रेपचेज से कांस्य पदक तक पहुंच सकती हैं और दूसरे हाफ में रहने पर रजत तक जा सकती हैं.

पिता रामनिवास ने अंतिम को पहलवान बनाने के लिए अपनी ज़मीन, ट्रेक्टर और गाड़ी आदि बेच दी थी. पर बेटी ने भी पिता के बलिदान को खाली नहीं जाने दिया है. अंतिम के खेल की सबसे बड़ी खूबी डिफेंस है. वह विपक्षी पहलवान को अंक लेने से रोके रखती हैं.

निकहत की निगाह गोल्ड पर

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निकहत ज़रीन का यह पहला ओलंपिक है. वह तीन साल पहले टोक्यो ओलंपिक में ट्रायल में मैरिकॉम के खिलाफ हारने की वजह से नहीं जा सकी थीं. लेकिन पिछले तीन सालों में वह देश की नंबर वन मुक्केबाज़ दर्जा हासिल करने में सफल रही हैं.

निकहत अब तक विश्व चैंपियनशिप में दो गोल्ड और कॉमनवेल्थ गेम्स में गोल्ड और एशियाई खेलों में कांस्य पदक जीत चुकी हैं. पर उनकी कैबिनेट में ओलंपिक गोल्ड की कमी है. बहुत संभव है कि वह इस कमी को इस बार पूरा कर दें.

निकहत ने 2022 में सुर्खियां बटोरनीं शुरू की थीं, उसके बाद से वह फ्लाईवेट वर्ग में सिर्फ दो मुकाबले हारी हैं. उन्होंने पेरिस पहुंचकर एक्स पर संदेश डाला कि वह अपना सपना साकार करने के लिए आ गई हैं.

निकहत ऐसे समाज से ताल्लुक रखती हैं, जहां लड़कियों को मुक्केबाज़ बनाना पसंद नहीं किया जाता. पर उनके पिता मोहम्मद जमील की तारीफ करनी होगी कि उन्होंने आलोचनाओं पर कान दिए बगैर बेटी को मुक्केबाज़ बनाने का प्रयास बनाए रखा. इन प्रयासों का ही नतीजा है कि उन्हें अब ओलंपिक में स्वर्ण पदक जीतने वाले मुक्केबाज़ों में शुमार किया जा रहा है.

गोल्डन शूटर सिफत कौर

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भारतीय निशानेबाज़ पिछले टोक्यो ओलंपिक में अच्छा प्रदर्शन नहीं कर सके थे, पर सिफत कौर पर इसका बोझ नहीं होगा क्योंकि वह उस दल का हिस्सा नहीं थीं. वह पिछले एशियाई खेलों में स्वर्ण और रजत पदक जीतकर सुर्खियों में आई थीं.

सिफत ने पिछले साल 50 मीटर थ्री पोजिशन राइफल स्पर्धा में ब्रिटेन की सियोनेड का विश्व रिकॉर्ड तोड़कर 469.6 अंकों का नया रिकॉर्ड बनाया था. उन्होंने नीलिंग में 154.6 , प्रोन में 157.9 और स्टेंडिंग में 157.1 अंक बनाए थे.

सिफत कौर के बारे में कहा जाता है कि वह दुर्घटनावश शूटिंग में आई हैं. उनका चचेरा भाई शेखों शूटिंग करता था और वह जब 9 साल की थीं, तब उसके साथ शूटिंग रेंज चली जाती थीं. वहां जाकर वह इस खेल की दीवानी हो गईं.

वह शूटिंग करने के समय डॉक्टर बनने की तरफ बढ़ रही थीं. उन्होंने नीट की परीक्षा पास करके फरीदकोट स्थित जीजीएस मेडिकल कॉलेज में एडमिशन ले लिया था. पर शूटिंग में गंभीरता लाने के लिए मेडिकल की पढ़ाई को छोड़कर इस खेल को पूरी तरह से अपना लिया.

सिफत कहती हैं कि इसमें बेहतर परिणाम निकालने के लिए दबाव से बचने की ज़रूरत होती है. वो कहती हैं, "मैं कभी भी दबाव नहीं लेती हूं, इसलिए बेहतर परिणाम निकालने में सफल रही हूं."

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