पंजाब के पहले ओलंपियन ब्रिगेडियर दलीप सिंह, जब दूसरे विश्व युद्ध के दौरान लापता हो गए

ब्रिगेडियर दलीप सिंह ग्रेवाल
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    • Author, सौरभ दुग्गल
    • पदनाम, खेल पत्रकार, बीबीसी पंजाबी के लिए

ब्रिगेडियर दलीप सिंह ग्रेवाल की नन्हीं पोतियां जब उनके पैरों पर छोटे-छोटे छेदों के निशान के बारे में पूछती थीं, तो वो उनसे बड़े गर्व के साथ कहते थे, “उनके पैरों पर इतिहास लिखा हुआ है.”

और ऐसा हो भी क्यों ना, उनके पैर इतिहास को दर्शाते हैं. ये वही पैर हैं, जिन्होंने भारतीय खेलों और सेना के इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ा था.

दिवंगत दलीप सिंह के नाम पर ये कीर्तिमान दर्ज है कि उन्होंने दो ओलंपिक खेलों (1924 और 1928) में भारत का प्रतिनिधित्व किया.

एशियाई खेलों की जब शुरुआत हुई, तो उसकी मशाल प्रज्ज्वलित करने का मौक़ा भी उन्हें ही मिला. उन्होंने कई ओलंपिक खिलाड़ियों को तैयार किया.

दूसरे विश्व युद्ध में अपने कार्यों के लिए उन्हें एमबीई यानी मोस्ट एक्सीलेंट ऑर्डर ऑफ द ब्रिटिश एम्पायर से नवाज़ा गया.

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दलीप सिंह की पोती, 61 साल की हरीना गिल याद करती हैं, “दूसरे विश्व युद्ध के दौरान हमारे दादाजी मेजर दलीप सिंह के पैरों में छर्रे लगे. जब हम बच्चे थे, उनसे पूछते थे कि वो इन्हें बाहर क्यों नहीं निकाल देते, तो वो कहते थे कि उनके पैरों पर इतिहास लिखा है और वो इसे मिटाना नहीं चाहते. उनका ये मानना था कि एक एथलीट होने की वजह से उनके पैर इतने मज़बूत बने कि इन छर्रों से उन्हें दर्द नहीं होता.”

दलीप सिंह को याद करते हुए हरीना बताती हैं, “हमारे बाबाजी ने सौ साल पहले ओलंपिक खेलों में हिस्सा लिया था, जो हमारे परिवार के लिए बड़े सम्मान की बात है. उस ज़माने में चंद लोगों को ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपने देश का प्रतिनिधित्व करने का मौका मिलता था.”

“तब विदेश जाना बहुत बड़ी बात थी. हम पेरिस और एमस्टर्डम खेलों की कहानियां सुनते हुए बड़े हुए. अपने परिवार में हम जब भी अपने दादा या पिता (ओलंपिक गोल्ड-मेडलिस्ट बालकिशन सिंह) से बात करते थे, तो चर्चा अक्सर खेलों के इर्द-गिर्द ही होती थी.”

दलीप सिंह एक हरफ़नमौला खिलाड़ी थे, जिन्होंने ओलंपिक में एथलेटिक्स प्रतिस्पर्द्धा में हिस्सा लिया, पटियाला टाइगर्स के लिए हॉकी खेली, जो उस ज़माने में बेहद लोकप्रिय टीम थी.

साथ ही उन्होंने लाहौर में साल 1927 में क्वॉड्रेंगुलर क्रिकेट टूर्नामेंट में सिखों का प्रतिनिधित्व किया, जो औपनिवेशिक दौर में अलग-अलग समुदायों या धर्मों के खिलाड़ियों से बनी टीमों के बीच खेला जाता था.

वर्ष 1924 का पेरिस ओलंपिक

ओलंपियन बालकृष्णा राष्ट्रपति से सम्मान स्वीकार करते हुए.
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फ़र्स्ट पटियाला इन्फैंट्री (पटियाला स्टेट फोर्सेज़) में भर्ती हुए दलीप सिंह का जन्म लुधियाना के डोलोन खुर्द गांव में 27 अप्रैल, 1899 में हुआ था. दलीप सिंह पंजाब से पहले व्यक्ति थे, जिन्हें ओलंपिक में खेलने का अवसर मिला.

उन्होंने लंबी-कूद स्पर्धा में 1924 के पेरिस ओलंपिक में ब्रिटिश शासन के दौरान भारत का प्रतिनिधित्व किया. वे सात सदस्यीय एथलेटिक्स दल के कप्तान भी थे.

तब पेरिस ओलंपिक के लिए भारतीय दल में 14 सदस्य थे, जिनमें सात खिलाड़ी टेनिस के थे.

भारतीय दल पेरिस ओलंपिक में कुछ ख़ास नहीं कर पाया, लेकिन लॉन्ग जंपर दलीप सिंह ने उम्दा प्रदर्शन किया और वे फ़ाइनल तक पहुंचने में मामूली अंतर से चूक गए.

1924 के ओलंपिक में शामिल भारतीय खिलाड़ियों में अविभाजित पंजाब से दो खिलाड़ी थे. ये थे दलीप सिंह (एथलेटिक्स) और मोहम्मद सलीम (लॉन टेनिस).

दलीप सिंह का इवेंट आठ जुलाई को जबकि मोहम्मद सलीम का इवेंट 13 जुलाई को हुआ. इस तरह दलीप सिंह, पंजाब से पहले ओलंपिक खिलाड़ी बने.

1924 के ओलंपिक में दो सिख खिलाड़ी खेले. दलीप सिंह पंजाब के थे जबकि पाला सिंह यूनाइटेड प्रॉविंस से थे, जिसे अब उत्तर प्रदेश कहा जाता है. बाद में क्वॉड्रेंगुलर क्रिकेट टूर्नामेंट में पंजाब की ओर से खेलने वाले पहले सिख खिलाड़ी भी दलीप सिंह ही थे.

1928 के एम्सटर्डम ओलंपिक के लिए भी दलीप सिंह का चयन हुआ और इस तरह वे दो ओलंपिक में खेलने वाले पंजाब के पहले खिलाड़ी बने.

पहले एशियाई खेलों की मशाल और दलीप सिंह

ओलंपियन दलीप सिंह, तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद के साथ
इमेज कैप्शन, ओलंपियन दलीप सिंह, तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद के साथ.

भारत के आज़ाद होने के बाद साल 1948 में पटियाला स्टेट फोर्सेज़ का भारतीय सेना में विलय हो गया और ब्रिगेडियर दलीप सिंह की फ़र्स्ट पटियाला इंफैंट्री को नए सिरे से गठित करके 15-पंजाब नाम दिया गया.

भारतीय सेना में ब्रिगेडियर दलीप सिंह को मार्च 1951 में हुए पहले एशियाई खेलों की मशाल प्रज्जवलित करने के लिए चुना गया. तब उनकी उम्र 52 साल थी.

दलीप सिंह की सबसे बड़ी पोती इंतु गुमान बताती हैं, “उस समय तो हम पैदा भी नहीं हुए थे लेकिन हमारे पिता बालकिशन सिंह बताते थे कि जब ब्रिगेडियर दलीप सिंह एशियन गेम्स की मशाल लेकर नेशनल स्टेडियम में दाख़िल हुए, पूरा स्टेडियम तालियों से गूंज उठा और लोगों ने खड़े होकर उनका अभिवादन किया. उस पल के बारे में सोचकर मैं आज भी रोमांचित हो जाती हूं.”

भारत के पहले पिता-पुत्र ओलंपिक खिलाड़ी

बालकिशन और उनके पिता दलीप सिंह रेडियो पर कमेंट्री सुनते हुए
इमेज कैप्शन, बालकिशन और उनके पिता दलीप सिंह रेडियो पर कमेंट्री सुनते हुए

दलीप सिंह के नाम एक और अनूठा कीर्तिमान है. वो और उनके बेटे बालकिशन सिंह, भारत की पहली पिता-पुत्र जोड़ी है, जो ओलंपिक में खेले हैं.

अपने पिता के पद-चिह्नों पर चलते हुए बालकिशन सिंह ने पंजाब यूनिवर्सिटी में एथलेटिक्स में झंडे गाड़े. वे लॉन्ग जंप और ट्रिपल जंप में यूनिवर्सिटी चैंपियन रहे. साथ ही उन्होंने 1951-52 में ऑल इंडिया इंटर-यूनिवर्सिटी चैंपियनशिप में ट्रिपल जंप में गोल्ड मेडल हासिल किया. बाद में वे हॉकी की ओलंपिक टीम में अपनी जगह बनाने में कामयाब हुए.

बालकिशन भारत की उस हॉकी टीम के सदस्य थे, जिसने 1956 के ओलंपिक में गोल्ड और 1960 के ओलंपिक में सिल्वर मेडल जीता.

दलीप सिंह 1924 और 1928 के ओलंपिक में खेले थे, जबकि उनके बेटे बालकिशन सिंह 1956 और 1960 के ओलंपिक में भारतीय दल के सदस्य थे.

बाद में बालकिशन ने कोचिंग का ज़िम्मा संभाला और वो ऐसे पहले भारतीय बने, जिसने खिलाड़ी और कोच के तौर पर ओलंपिक में अपनी टीम को गोल्ड मेडल दिलाया. वे 1980 के मॉस्को ओलंपिक में गोल्ड मेडल जीतने वाली पुरुष हॉकी टीम के कोच थे.

इतना ही नहीं, उन्होंने ऑस्ट्रेलिया की टीम को हॉकी के गुर सिखाने में अहम भूमिका निभाई. इसके लिए 1967 में उन्होंने पांच महीने ऑस्ट्रेलिया में गुजारे. ऑस्ट्रेलिया के तत्कालीन प्रधानमंत्री मैल्कम फ्रेज़र ने भारतीय प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई से मुलाकात के दौरान बालकिशन के योगदान की सराहना की थी.

बालकिशन ने भारतीय महिला हॉकी के विकास में भी बड़ी भूमिका अदा की. वे 1982 के एशियन गेम्स में गोल्ड मेडल जीतने वाली भारतीय महिला हॉकी टीम के कोच थे.

मेजर ध्यानचंद का सानिध्य

दलीप सिंह

दलीप सिंह की पोती इंतु गुमान अपनी यादों को टटोलते हुए कहती हैं, “हमारे दादा और पिता अपने समय के लेजेंड थे और उनकी वजह से हमें उस ज़माने के बड़े खिलाड़ियों से बात करने का मौक़ा मिला.

1961 में जब पटियाला में नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ स्पोर्ट्स (एनआईएस) की स्थापना हुई, तब जानेमाने हॉकी खिलाड़ी मेजर ध्यानचंद ने मुख्य कोच का ज़िम्मा संभाला.”

“मेरे पिता ने उनके मार्गदर्शन में अपना कोचिंग डिप्लोमा पूरा किया और बाद में एनआईएस में बतौर फैकल्टी शामिल हुए. ध्यानचंद और दलीप सिंह, दोनों ही 1928 के ओलंपिक दल में शामिल थे, तो ध्यानचंद हमारे दादा से मिलने अक्सर आते थे.”

“वो दोनों रेडियो पर कमेंट्री साथ बैठकर सुनते थे. हम ध्यानचंद के इतने क़रीब थे कि उन्हें भी दादा कहते थे. उन्होंने मेरी सबसे छोटी बहन को मीनू नाम दिया, जो साल 1968 में पैदा हुई थी और अब न्यूज़ीलैंड में रहती हैं.”

वो बताती हैं, “आर्मी कनेक्शन की वजह से मिल्खा सिंह भी मेरे दादा के क़रीबी थे और वो कभी-कभी मेरे पिता को भी ट्रेनिंग देते थे.”

“मिल्खा सिंह और मेरे पिता 1956 और 1960 के ओलंपिक में भारतीय दल के सदस्य थे. कभी-कभी बुरा लगता है कि हमारे बच्चे मेरे दादा दलीप सिंह से मिल ही नहीं पाए. 12 मार्च, 1975 में उनका देहांत हो गया था.”

दलीप सिंह की तीनों पोतियों- इंतु, हरीना और मीनू ने लॉन टेनिस में राष्ट्रीय स्तर पर पंजाब का प्रतिनिधित्व किया है.

जब लगा कि युद्ध में मारे गए...

दलीप सिंह और बालकिशन के मेडल
इमेज कैप्शन, घर पर रखे दलीप सिंह और बालकिशन के मेडल्स.

दलीप सिंह ने एक खिलाड़ी के तौर पर अपने अंतरराष्ट्रीय करियर की शुरुआत तब की थी, जब वो सेना में सैनिक के तौर पर फर्स्ट पटियाला इंफेंट्री में काम कर रहे थे.

ये 1924 के ओलंपिक से पहले की बात थी. उन्होंने दूसरे विश्व युद्ध के दौरान ब्रितानी फौज के लिए जंग भी लड़ी.

दूसरे विश्व युद्ध के दौरान वे मेजर रैंक पर नॉर्थ वेस्ट फ्रंटियर प्रॉविंस में तैनात थे, जो अब पाकिस्तान का हिस्सा है. बाद में उन्हें असम-बर्मा मोर्चे पर भी तैनात किया गया, जहां उन्हें भीषण लड़ाई का अनुभव मिला.

अप्रैल 1944 में लड़ाई के दौरान उनकी यूनिट के कई लोग हताहत हुए. दूसरे विश्व युद्ध के दौरान अनुकरणीय योगदान के लिए उन्हें एमबीई यानी मोस्ट एक्सीलेंट ऑर्डर ऑफ द ब्रिटिश एम्पायर से नवाज़ा गया.

दलीप सिंह की पोती हरीना बताती हैं, “दूसरे विश्व युद्ध के दौरान बर्मा मोर्चे पर दलीप सिंह कुछ महीनों के लिए लापता हो गए थे. पटियाला में उनके परिवार को आशंका थी कि वे जंग के दौरान मारे गए होंगे. बमबारी के समय वे अपनी यूनिट के साथ थे.”

“उनके पास ही खड़े एक अधिकारी के सिर में कुछ नुकीली चीज़ लगी थी. दलीप सिंह भी घायल हुए थे. भूलवश एक रिपोर्ट में उनके मारे जाने की बात कही गई. लेकिन किस्मत से उनकी चोट जानलेवा नहीं थी और कुछ महीनों के बाद परिवार को उनकी हालत के बारे में ख़बर मिली.”

शिक्षा और खेल का केंद्र लाहौर

दलीप सिंध लुधियाना के रहने वाले थे. उन्होंने शहर के मिशन स्कूल से 1914 में अपनी मैट्रिक की पढ़ाई पूरी की.

आगे की पढ़ाई के लिए वे लाहौर चले गए, जहां उन्होंने 1920 में बीए की डिग्री हासिल की. बाद में उन्होंने लाहौर के लॉ कॉलेज में भी दाख़िला लिया.

लाहौर में इस दौरान उन्हें खेल के लिहाज से प्रतिस्पर्धी माहौल मिला. तब ऑल इंडिया इंटर-यूनिवर्सिटी टूर्नामेंट शुरू नहीं हुए थे, लेकिन पंजाब यूनिवर्सिटी की इंटर-कॉलेज प्रतियोगिताओं में एथलेटिक्स में उनका दबदबा रहा.

आज़ादी से पहले के दौर में पंजाब यूनिवर्सिटी स्पोर्ट्स का बड़ा केंद्र थी, जहां दलीप सिंह ने 100 यार्ड्स, 200 यार्ड्स, 440 यार्ड्स, लंबी-कूद और 120 यार्ड्स की बाधा दौड़ में सफलता के झंडे गाड़े.

पंजाब यूनिवर्सिटी के ही एक और छात्र मोहम्मद सलीम, लाहौर के गवर्नमेंट कॉलेज में पढ़ रहे थे. उन्होंने भी दलीप सिंह के साथ 1924 के पेरिस ओलंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व किया था.

दलीप सिंह की पोती हरीना ने बताया कि उनके पिता बालकिशन पढ़ने के लिए लाहौर गए थे. लेकिन भारत विभाजन के बाद लाहौर पाकिस्तान का हिस्सा बन गया. विभाजन के दौरान दलीप सिंह कर्नल थे और सीमा पर उनकी तैनाती थी. उन्होंने लाहौर में पुलिस के एक आला अधिकारी की मदद से बालकिशन को आख़िरी ट्रेन से किसी तरह भारत भिजवाया.

बालकिशन की पत्नी बलजिंदर कौर बताती हैं कि खिलाड़ी और सेना के अधिकारी के तौर पर दलीप सिंह को बहुत सम्मान मिला. लोग उन पर बड़ा भरोसा करते थे और विभाजन के दौरान उन्होंने लोगों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित की थी.

बलजिंदर कौर जब बच्ची थीं, तभी उनके सिर से पिता का साया उठ गया था. विवाह के बाद दलीप सिंह में उन्हें अपने पिता नज़र आए. वो बताती हैं कि उनके संबंध भी पिता-पुत्री की तरह ही थे.

दलीप सिंह की पोती इंतु और हरीना
इमेज कैप्शन, दलीप सिंह की पोती इंतु और हरीना.

पटियाला आर्मी: ओलंपिक का द्वार

फर्स्ट पटियाला इंफैंट्री में शामिल होने के बाद दलीप सिंह का पूर्व शासक महाराजा भूपिंदर सिंह से परिचय बढा, जिनके प्रभाव की वजह से उन्होंने खुद को एक नए खेल जगत में पाया. पटियाला आर्मी में रहते हुए दलीप सिंह ने बेहतर खिलाड़ी के तौर पर अपना परिचय दिया और पटियाला टाइगर्स हॉकी टीम में सेंटर-हाफ़ की जगह पक्की की.

लेकिन 1924 के ओलंपिक खेल में हॉकी शामिल नहीं थी, इसलिए उन्होंने एथलेटिक्स पर ध्यान लगाया. उन्होंने नई दिल्ली में 1924 में आयोजित ऑल इंडिया एथलेटिक्स मीट में गोल्ड मेडल जीता, जिससे उन्हें ओलंपिक के लिए सात सदस्यीय दल में जगह मिली.

उस समय सरकार की तरफ़ से खेलों में उतनी मदद नहीं मिलती थी. राजे-रजवाड़ों और आम लोगों की ओर से मिली आर्थिक मदद के बूते ही भारतीय खिलाड़ी खेलने के लिए बाहर जा पाते थे. पंजाब ओलंपिक एसोसिएशन ने तब 1100 रुपये का योगदान दिया था. ये राशि पंजाब के 47 स्कूलों के छात्रों और अन्य राज्यों की मदद से जुटाई गई थी.

महाराजा भूपिंदर सिंह 1928 से 1938 के दौरान इँडियन ओलंपिक एसोसिएशन के अध्यक्ष थे. उन्होंने ओलंपिक खेलों के लिए दलीप सिंह की आर्थिक मदद में अहम योगदान दिया.

ओलंपिक करियर के बाद दलीप सिंह ने पटियाला में एथलीट्स की ट्रेनिंग का ज़िम्मा संभाला. उनके मार्गदर्शन में पटियाला के एथलीट्स ने 1948 तक, लगातार 15 साल नेशनल चैंपियनशिप अपने नाम की.

दलीप सिंह के मार्गदर्शन में एथलीट निरंजन सिंह और रौनक सिंह ने 1936 के बर्लिन ओलंपिक में पटियाला का प्रतिनिधित्व किया. इसी तरह 1948 के लंदन ओलंपिक में साधु सिंह, छोटा सिंह और सोम नाथ ने अपनी मौजूदगी दर्ज कराई.

कोच के तौर पर नई पारी

पटियाला आर्मी का भारतीय सेना में विलय होने के बाद ब्रिगेडियर दलीप सिंह ने सर्विसेज़ टीम के लिए कोच-कम-मैनेजर का ज़िम्मा संभाला, जिसने 1949 में राष्ट्रीय ख़िताब अपने नाम किया.

उन्होंने पहले एशियाई खेलों के दौरान भी सर्विसेज़ के लिए कोच की भूमिका निभाई, जहां उसने चार स्वर्ण, छह रजत और छह कांस्य पदक जीते.

फिलीपींस में 1954 में दूसरे एशियन गेम्स के दौरान, ब्रिगेडियर दलीप सिंह भारतीय दल के मैनेजर थे. एथलेटिक्स के 22 सदस्यीय भारतीय दल में 14 खिलाड़ी सर्विसेज़ के थे, जिन्होंने पांच स्वर्ण, तीन रजत और पांच कांस्य पदक जीते.

ब्रिगेडियर दलीप सिंह ने सर्विसेज़ में ख़ासतौर पर एथलेटिक्स की मज़बूत नीव रखने में अहम योगदान दिया.

ब्रिगेडियर दलीप सिंह 1951 में सेना से रिटायर हुए. इसके बाद उन्होंने पटियाला स्पोर्ट्स में प्रशासक के तौर पर अपना योगदान दिया. वे पटियाला ओलंपिक एसोसिएशन के मानद सचिव भी रहे.

दलीप सिंह की विरासत

दलीप सिंह की पोती हरीना सौरभ दुग्गल को तस्वीरें दिखाती हुईं.
इमेज कैप्शन, दलीप सिंह की पोती हरीना ने सौरभ दुग्गल को तस्वीरें दिखाईं.

साल 1956 के नेशनल गेम्स पटियाला में हुए. तब उनके योगदान को सराहते हुए गेम्स विलेज को “दलीप नगर” नाम दिया गया.

आने वाली पीढ़ियां ओलंपिक में उनके गौरवशाली सफ़र से प्रेरणा लें, इसके लिए उनके परिवार ने दलीप सिंह और बालकिशन से जुड़ी स्मृतियां जैसे उनके ब्लेज़र्स, मेडल, हॉकी स्टिक, तस्वीरें और 1951 के एशियन गेम्स की मशाल- ये सभी पटियाला में नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ स्पोर्ट्स (एनआईएस) के नेशनल स्पोर्ट्स म्यूजियम को दान कर दी हैं.

दलीप सिंह की पोती हरीना कहती हैं, “मैंने नेशनल स्पोर्ट्स म्यूजियम में रिनोवेशन के बारे में सुना है. मुझे भरोसा है कि वहां अधिकारियों ने उन स्मृतियों को ठीक से सहेजकर रखा होगा. ये सब हमारे परिवार की विरासत है और उनसे किसी को इन लेजेंड्स के पद-चिह्नों पर चलने की प्रेरणा मिले, तो ये उनके लिए सबसे अच्छी श्रद्धांजलि होगी,”

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