भारतीय महिला हॉकी टीम की दो ताक़तवर महिलाओं का इस्तीफ़ा किस ओर इशारा करता है?

इमेज स्रोत, @TheHockeyIndia/X
- Author, शारदा उगरा
- पदनाम, वरिष्ठ खेल पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
पिछले महीने भारतीय हॉकी में नाटकीय ढंग से दो इस्तीफ़े हुए. दोनों ही इस्तीफ़े महिलाओं के थे. इसमें अहम बात ये है कि बड़े पदों पर महिलाएं मुश्किल से नज़र आती हैं.
24 फरवरी को पेरिस ओलंपिक में टीम के क्वालिफ़ाई नहीं करने के बाद भारतीय महिला हॉकी टीम की कोच जेनेक शोपमैन ने इस्तीफ़ा दिया था.
अपने इस्तीफ़े में उन्होंने कहा, ''बीते दो साल में मैंने खुद को कई बार अकेला महसूस किया. मैंने यह भी देखा कि किस तरह से पुरुष कोच के साथ अलग व्यवहार किया जाता है, पुरुष टीम और महिला टीम में कितना अंतर है, ये भी देखा.''
इसके बाद 28 फरवरी को हॉकी इंडिया की सीईओ एलिना नॉर्मन ने भी अपना इस्तीफ़ा देते हुए कहा कि दो गुटों के खींचतान वाले माहौल में रिज़ल्ट देना बहुत मुश्किल है.
भारतीय खेल प्रबंधन में महिलाएं

इमेज स्रोत, @TheHockeyIndia/X
भारतीय खेल की दुनिया में शोपमैन और नॉर्मन अपवाद सरीखी ही थीं. महिला होकर भी दोनों भारतीय खेल की दुनिया में पावरफुल पदों पर तैनात थीं. यह दुर्लभ ही है. शूटिंग को अगर आप अपवाद मान लें तो भारतीय खेलों में किसी महिला को आप मुख्य कोच के तौर पर नहीं देख सकते हैं.
भारतीय खेल संघों में महिला सीईओ भी मुश्किल से दिखती हैं. नॉर्मन केवल नाम के लिए सीईओ नहीं थीं, बल्कि पूरे दबदबे और रसूख के साथ हॉकी इंडिया को चला रही थीं. उनकी नियुक्ति हॉकी इंडिया के पूर्व अध्यक्ष और पावर सेंटर नरेंद्र बत्रा के कार्यकाल में हुई थी.
ऑस्ट्रेलियाई नॉर्मन के अपने देश में खेल संघों में महिलाओं का होना दुर्लभ नहीं है. ऑस्ट्रेलिया के कुछ राज्यों के प्रत्येक खेल संघों के बोर्ड में 40 फीसद महिलाओं की मौजूदगी अनिवार्य है.
भारतीय खेल की दुनिया में हालात एकदम अलग हैं. राष्ट्रीय खेल संहिता के लागू होने के बाद भी खेल संघों में ताक़त और निर्णायक भरे फ़ैसले शीर्ष के लोग ही लेते हैं. ज़्यादातर खेल संघ के सीईओ, पुराने अधिकारी या उनके परिवार के लोग ही हैं. कुछ जगहों पर नए पदों पर, वे लोग भी हैं जो पुराने अधिकारियों के प्रति सेवाभाव से काम कर रहे हैं. उदाहरण के लिए भारतीय कुश्ती संघ में कोई सीईओ नहीं है.
इसलिए शोपमैन ने ठीक ही कहा है, ''मैं उस संस्कृति से आई हूं जहां महिलाओं को सम्मान मिलता है, उन्हें अहमियत दी जाती है. लेकिन यहां ऐसा महसूस नहीं हुआ.''
भारतीय हॉकी की सच्चाई क्या है?

इमेज स्रोत, @SjoerdMarijne/X
हालांकि उल्लेखनीय है कि शोपमैन से ठीक पहले ये ज़िम्मेदारी संभालने वाले कोच शॉर्ड मारीन ने भी ठीक ऐसा ही कहा था.
पुरुष कोच शॉर्ड मारीन को फरवरी, 2017 में महिला टीम का कोच बनाया गया था. उसके बाद उन्हें अगस्त महीने में पुरुष टीम में भेजा गया. इसके बाद मई, 2018 में उन्हें फिर से महिला टीम का कोच बना दिया गया. यह सब फ़ैसले नॉर्मन के सीईओ रहते लिए गए थे.
भारतीय हॉकी की सच्चाई को सामने लाना मुश्किल चुनौती है. 2022 में मारीन अपनी पुस्तक 'विल पावर द इनसाइड स्टोरी ऑफ़ द इनक्रेडिबल टर्नअराउंड इन इंडियन वीमेंस हॉकी' रिलीज़ करना चाहते थे.
इस पुस्तक का एक हिस्सा अंग्रेज़ी अख़बार 'इंडियन एक्सप्रेस' ने प्रकाशित किया था. मारीन ने अपनी पुस्तक में बत्रा मोमेंट के नाम से एक वाक़ये का ज़िक्र किया है.
वो लिखते हैं, ''उन्होंने रानी रामपाल का स्वागत किया, लेकिन जब वे दूसरे खिलाड़ियों की तरफ़ मुड़े तो असहज स्थिति उत्पन्न हो गई क्योंकि बत्रा किसी दूसरे खिलाड़ी को चेहरे से नहीं जानते थे. उन्होंने पूछा कि ड्रेग फ्लिकर कौन है? उन्हें पता ही नहीं था उनसे कुछ ही क़दम की दूरी पर दुनिया की सबसे बेहतरीन ड्रेग फ्लिकर गुजरीत मौजूद थीं. बत्रा की उदासीनता, महिला हॉकी के प्रति व्यापक उदासीनता का प्रतीक भर थी. दुखद है कि खिलाड़ियों को अपने ही घर में विदेश जैसा महसूस हुआ था.''
सितंबर, 2022 में दिल्ली हाईकोर्ट ने मारीन की किताब में खिलाड़ियों के बारे में गोपनीय जानकारी होने का हवाला देते हुए उसके प्रकाशन पर रोक लगा दी. कहा गया कि किताब में दो खिलाड़ियों, एक पुरुष और एक महिला खिलाड़ी के बारे में जानकारी है. वे मारीन की किताब के प्रकाशन को रोकने वाली क़ानूनी लड़ाई का चेहरा बन गए.
लेकिन इस कवायद से हॉकी इंडिया के शीर्ष अधिकारियों, ख़ासकर बत्रा के कामकाज करने का तरीक़ा भी सार्वजनिक नहीं हो पाया. उस दौरान इस बात की पुष्टि भी हुई थी कि हॉकी इंडिया के अधिकारियों ने पुरुष और महिला हॉकी के दूसरे खिलाड़ियों को मारीन के ख़िलाफ़ क़ानूनी प्रक्रिया शुरू करने के लिए प्रोत्साहित किया. हालांकि ये नहीं मालूम चला कि क़ानूनी प्रक्रिया का ख़र्चा खिलाड़ियों ने उठाया या हॉकी इंडिया ने.
कोच जेनेक शोपमैन के कार्यकाल में टीम का प्रदर्शन

इमेज स्रोत, @TheHockeyIndia/X
शोपमैन ने भारतीय खेल जगत में महिलाओं के साथ होने वाले व्यवहार को लेकर भी सच ही कहा है. उनके पास खिलाड़ियों के सुनाने के लिए कहीं ज़्यादा भयावह कहानियां होंगी. लेकिन शोपमैन को जब कोच बनाया गया था तो महिला टीम अपने सबसे बेहतरीन दौर में थीं.
मारीन के कार्यकाल के दौरान टोक्यो ओलंपिक में टीम सेमीफ़ाइनल तक पहुंची थीं. शोपमैन को इसके बाद कोच बनाया गया था, ऐसे में उन पर टीम को यहां से आगे ले जाने की चुनौती थी.
उन्हें उनकी मनपसंद टीम भी मिली. टीम से वरिष्ठ खिलाड़ियों यानी रानी रामपाल, गुरजीत कौर, उपकप्तान दीप ग्रेस एक्का जैसे पुराने धुरांधरों को बाहर रखा गया, लेकिन इसके बावजूद टीम का प्रदर्शन बहुत बेहतर नहीं हुआ.
आंकड़ों के हिसाब से देखें तो शोपमैन की कोचिंग के दौरान टीम ने 78 मैचों में 34 मैच जीते, 17 ड्रॉ रखे और 19 मैच गंवाए. यह अच्छा प्रदर्शन माना जाएगा, लेकिन स्तरीय टूर्नामेंटों में टीम का प्रदर्शन फ़ीका रहा. 2022 के बर्मिंघम कॉमनवेल्थ खेलों में कांस्य पदक और रांची में एशियन चैंपियंस ट्रॉफ़ी में स्वर्ण पदक को मारीन के कार्यकाल से बेहतर प्रदर्शन माना जाएगा.
मारीन के समय में 2018 के कॉमनवेल्थ खेलों में टीम चौथे स्थान पर रही थी, जबकि एशियन चैंपियंस ट्रॉफ़ी में टीम में रजत पदक हासिल हुआ था. वहीं वीमेंस वर्ल्ड कप 2018 में टीम क्वार्टर फ़ाइनल तक पहुंचीं थी जबकि 2022 में नौवें स्थान से संतोष करना पड़ा.
2018 के एशियन गेम्स में टीम को रजत पदक मिला था जबकि 2022 के हांग्जो एशियन गेम्स में टीम को कांस्य पदक हासिल हुआ था. अगर भारतीय टीम ने पेरिस ओलंपिक के लिए क्वालिफ़ाई कर लिया होता तो कम से कम छह महीने तक टीम की कमी की बात नहीं होती और शोपमैन कोच भी बनीं रहतीं.
शोपमैन ने अपने इस्तीफ़े के बाद रानी रामपाल के बारे में जो कहा उससे दोनों के बीच की खटास जगज़ाहिर हुई. उन्होंने कहा, ''वह हमें कामयाब होते नहीं देखना चाहतीं थीं.'' ये रानी के ख़िलाफ़ वाहियात आक्षेप तो है ही लेकिन पहला सवाल यही है कि शोपमैन ने रानी का दिमाग़ में घुसकर इसका पता कैसे लगा लिया? हालांकि अभी तक रानी रामपाल ने इस पर कोई प्रतक्रिया नहीं दी है.
कोच और खिलाड़ियों का संबंध

इमेज स्रोत, @savitahockey/X
इससे पहले किसी भारतीय कोच और कप्तान के बीच कटु संबंधों का उदाहरण ग्रेग चैपल और सौरव गांगुली रहे हैं. हम सब जानते हैं कि उस विवाद का अंत कैसे हुआ था. चैपल और गांगुली के विवाद से टीम का माहौल ख़राब हुआ था और खिलाड़ियों में असुरक्षा की भावना उत्पन्न हुई थी. रानी रामपाल सौरव गांगुली से उतनी ही दूरी पर दिखाई देती हैं जितनी कि शोपमैन मारीन से लग रही हैं.
वैसे कहीं ज़्यादा गंभीर बात ये है कि शोपमैन के कार्यकाल के अधिकांश हिस्से में रानी टीम, प्लेइंग इलेवन और यहां तक कि कैंप से भी बाहर रही हैं. टीम और कैंप का माहौल कैसा था, इसे परिणामों से भी समझा जा सकता है.
हॉकी और फुटबॉल में क्रिकेट की तुलना में टीम के प्रदर्शन के लिए कोच की ज़िम्मेदारी कहीं ज़्यादा होती है. मारीन ने अपनी टीम को सशक्त बनाया था. शोपमैन की विदाई का दुखद पहलू ये है कि महिला टीम कमज़ोर दिख रही है. उस पर फिर से महत्वहीन होने का ख़तरा मंडराने लगा है.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)















