मेरे देश में लोग मर रहे हैं और मैं पेरिस ओलंपिक में जा रही हूं: एक खिलाड़ी की आपबीती

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- Author, जेस एंडरसन
- पदनाम, बीबीसी स्पोर्ट्स जर्नलिस्ट
यूक्रेन की क्लाइम्बर जेन्या कज़्बेकोवा राजधानी कीएव में अपने घर के बाहर गिर रहे बम के धमाकों की आवाज़ से जब घबराकर सुबह पांच बजे उठीं, तो उन्हें ज़रा भी अंदाज़ा नहीं था कि ज़िंदगी अचानक बदलने वाली है.
वो कहती हैं, "ये मेरे जीवन के सबसे भयावह अनुभवों में से एक था."
वो बताती हैं, "मैं जागी और अपनी मां की तरफ़ देखा, जो मेरे ही साथ सोती थीं. समझ नहीं आया कि क्या हुआ, कहां से आई आवाज़....और फिर वही धमाके वही आवाज."
जेन्या कहती हैं, "इसके बाद हमने अपने फ़ोन निकाले और सोशल मीडिया में देखा तो वहां ये ख़बर थी कि पूरे यूक्रेन में धमाके हो रहे हैं. मैंने अपना सामान पैक करने की कोशश की, लेकिन मेरे हाथ कांपते ही जा रहे थे."
उस घटना के दो साल बाद, 27 वर्षीय क्लाइम्बर जेन्या कज़्बेकोवा, चुनौतियों के पहाड़ों को पार करके पेरिस ओलंपिक के लिए तैयार हैं.

चुनौतियों का पहाड़

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लेकिन कुछ बातें ऐसी हैं जिसकी वो कभी कल्पना नहीं कर सकती थीं. फ़रवरी 2022 में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने जब यूक्रेन पर बड़े पैमाने पर आक्रमण का आदेश दिया, तो उन्हें अपने परिवार समेत, अन्य लाखों लोगों की तरह यूक्रेन से भागना पड़ा.
उन्होंने बीबीसी को बताया, "हर कोई यूक्रेन छोड़कर जा रहा था. सब बचने की कोशिश कर रहे थे. वो बड़ा ख़ौफनाक समय था, जब किसी के पास खाने-पीने के लिए कुछ नहीं था और कहीं रुकने की गुंजाइश नहीं थी."
अपनी बहन और माता-पिता के साथ जेन्या चार दिन तक गाड़ी चलाकर जर्मनी पहुंची और उससे पहले उन्हें दो दिन पोलैंड की सीमा पर इंतज़ार करना पड़ा.
उन्होंने बताया, "हम बस चलते रहे...कभी कभी तो ऐसा हुआ कि सीमा पर पांच किलोमीटर लंबी लाइन लगी थी और कुछ मिनट में हम बस पांच मीटर चल पाते थे. ना सो पाते थे ना अपना ठीक से ध्यान रख पाते थे."
वो कहती हैं, "जब हम जर्मनी पहुंचे तो थककर चूर थे. ये बहुत कड़वा अनुभव था, लेकिन फिर भी हम खुशनसीब थे कि यूक्रेन से निकल पाए, क्योंकि कई लोग पीछे छूट गए थे."
पेरिस ओलंपिक जाने की वजह

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जेन्या की ज़िंदगी में काफी कुछ बदला, लेकिन एक चीज़ जो नहीं बदली थी, वो थी क्लाइम्बिंग के लिए उनका जुनून, जिससे उन्हें ज़बर्दस्त उतार-चढ़ाव और सदमे के बावजूद ख़ुद को संभालने में मदद मिली.
जेन्या इसके बाद अमेरिका में सॉल्ट लेक सिटी चली गईं जबकि उनका परिवार मैनचेस्टर में बस गया.
लेकिन उसके दादा-दादी यूक्रेन में थे. उन्होंने यूक्रेन में ही रहने का बेहद मुश्किल फ़ैसला किया था. जेन्या कहती हैं कि उनके देश में जो हो रहा था, उसे देखते हुए वो खुद को अजीब स्थिति में महसूस कर रही थीं.
उनके कोच मलिक भी अपने देश लेबनान से जंग की वजह से भागे थे. तब उनकी उम्र 18 साल थी. मलिक ने जेन्या को समझाया कि उसके लिए अभी भी अपने सपनों को पूरा करना क्यों ज़रूरी है.
वो कहती हैं, "मलिक बहुत अच्छे से जानते थे कि मुझ पर क्या बीत रही है, मुझे उन्हें कुछ बताने की, कुछ कहने की ज़रूरत नहीं थी. मलिक ही वो व्यक्ति थे जो मुझे मेरे अंधकार से बाहर निकालकर लाए, वो भी उस समय जब मैं ख़ुद को एकदम ख़त्म सी महसूस कर रही थी."
"मुझे क्लाइम्बिंग में कोई मकसद नज़र नहीं आ रहा था. मैं प्रतियोगिता में क्यों जा रही हूं, जबकि मेरे अपने देश में लोग मर रहे हैं. लेकिन मलिक ने मुझे अहसास कराया कि इसका महत्व क्या है."
'क्लाइम्बिंग है ज़िंदगी का हिस्सा'
जेन्या कज़्बेकोवा के लिए क्लाइम्बिंग एक खेल भर नहीं है, वो उनके लिए 'पीढ़ी-दर-पीढ़ी' वाली बात है.
उसके दादा-दादी और माता-पिता भी क्लाइम्बिंग में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जा चुके हैं. उन्हें याद है कि वो उसे अपने साथ वर्ल्ड कप और अन्य चैंपियनशिप में साथ लेकर जाते थे.
वो कहती हैं, "क्लाइम्बिंग एक तरह से वाकई हमारे परिवार की ज़िंदगी का हिस्सा है. यही वो चीज़ थी जिसने मुझे जंग के पहले महीने के दौरान संभाले रखा. ये वही समय था जब मैं अपना फ़ोन नीचे रखकर अपने ऊपर ध्यान लगाती थी और तब मैंने न्यूज़ देखना और चिंता करना बंद कर दिया था और मैं वही कर रही थी, जो मुझे पंसद था."
जेन्या कज़्बेकोवा की नज़र अब पेरिस ओलंपिक में अपने बेहतरीन प्रदर्शन पर है. क्लाइम्बिंग को ओलंपिक के इवेंट्स में दूसरी बार ही शामिल किया गया है.
जेन्या पिछली बार कोविड और फिर चोटिल होने की वजह से टोक्यो ओलंपिक में नहीं जा पाईं थीं. लेकिन इस बार पेरिस से उनका ओलंपिक में पदार्पण हो रहा है.
वो कहती हैं, "पेरिस जाकर मैं अपनी यूक्रेनियन यूनिफॉर्म पहनकर दुनिया को दिखा सकूंगी कि यूक्रेन के लोगों में कितना दम है और वो अपने सपने पूरे कर सकते हैं. मेरे लिए अभी यही सबसे बड़ी प्रेरणा है."
जेन्या ने शंघाई और बुडापेस्ट में पिछले महीने ही ओलंपिक के लिए क्वालीफ़ाई किया है.
जेन्या कहती हैं, "यूक्रेन के लिए इस प्रतिनिधित्व का बहुत महत्व है. इससे दुनिया के लोगों को याद दिलाना है कि हमें अभी भी मदद की ज़रूरत है, हमें अभी भी सपोर्ट चाहिए. हम अभी भी जूझ रहे हैं और ये लड़ाई मायने रखती है."



















