हरिद्वार में कांवड़ रूट पर मस्जिद और मज़ार ढकी गईं और अब हटे पर्दे, पढ़िए पूरा मामला क्या है

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- Author, राजेश डोबरियाल
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए देहरादून से
कांवड़ मार्ग में पड़ने वाले होटलों के बाहर वहां काम करनेवालों के नेम प्लेट लगाने के विवाद के बाद अब उत्तराखंड सरकार का हरिद्वार में उठाया गया कदम चर्चा में है.
राज्य सरकार ने कांवड़ मार्ग पर पड़ने वाली मस्जिदों और मज़ारों को ढक दिया. हालांकि, मामले के तूल पकड़ने के बाद शुक्रवार को प्रशासन ने पर्दों को हटा दिया.
फ़िलहाल ये मालूम नहीं है कि मस्जिद और मज़ार के सामने लगे पर्दे क्यों हटाए जा रहे हैं. स्थानीय प्रशासनिक अधिकारियों को संपर्क करने का प्रयास किया लेकिन बात नहीं हो पाई है.
उत्तराखंड के धर्मस्व और पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज से भी संपर्क नहीं हो पाया है.
इससे पहले सतपाल महाराज ने कहा था कि पर्दे इसलिए लगाए गए थे ताकि कोई विवाद न हो.
स्थानीय निवासियों का कहना है कि ऐसा पहली बार हुआ और इससे न सिर्फ़ उनके रोज़गार पर फ़र्क पड़ा है बल्कि कांवड़ियों को भी परेशानी झेलनी पड़ी है.
रोज़गार पर असर

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कांवड़ यात्रा के दौरान आर्यनगर के पास इस्लामनगर की मस्जिद और ऊंचे पुल पर बनी मज़ार और मस्जिद को पर्दे से ढक दिया गया था. यहां से गुज़रने वाले कांवड़ियों को ये धर्मस्थल नज़र नहीं आ रहा था.
हरिद्वार में मस्जिद और मज़ार को ढंकने का ये पहला मामला था. पर्दा लगाए जाने के बाद बीबीसी के सहयोगी पत्रकार राजेश डोबरियाल ने कई स्थानीय लोगों से बात की थी.
इस्लामिया मस्जिद के सदर अनवर अली प्रशासन के इस कदम पर ऐतराज़ जताते हैं.
वह कहते हैं कि मस्जिद के बाहर रेहड़ी-ठेली लगाने वालों का रोज़गार तो इससे प्रभावित हुआ ही है कांवड़ियों को भी चलने, ठहरने में दिक्कत हो रही है.
उनका बचपन यहीं बीता है. वह कहते हैं, “जब बचपन में हम स्कूल पढ़ा करते थे तब से जय शंकर की, भोलेनाथ जी बोला करते थे और अब भी ऐसा ही करते हैं. आज तक यहां कोई बवाल नहीं हुआ. लेकिन प्रशासन का कहना है कि मस्जिद दिखनी नहीं चाहिए.”
स्थानीय टीवी पत्रकार महावीर नेगी ने कांवड़ ले जा रहे कुछ शिवभक्तों से भी बात की.
ज्यादातर ने उन्हें कहा कि मस्जिदों को पर्दे से ढका जाए या नहीं, इससे उन्हें कोई फ़र्क नहीं पड़ता.
ग़ाज़ियाबाद के गंगाजल लेने के लिए हर की पैड़ी जा रहे एक कांवड़िये ने महावीर नेगी को बताया कि वह 12 साल से कांवड़ लेकर आ रहे हैं और उन्होंने कभी ऐसा कोई पर्दा नहीं देखा. उन्होंने कहा, “फ़र्क पड़ता भी है और नहीं भी पड़ता. दोनों की चीज़ें हैं...फ़िलहाल तो सही है, जो है.”
उन्हीं के साथ मौजूद एक और कांवड़िये ने कहा, “हम यह नहीं कहते हैं कि पर्दा लगाओ, पर्दा नहीं लगाओ लेकिन अपने लोगों को समझाओ कि कोई गलत काम नहीं करना चाहिए.”


ढकने का मकसद क्या था?

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मस्जिद और मज़ार पर पर्दा लगाए जाने के फ़ैसले का बचाव करते हुए अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष रविंद्र पुरी ने कहा, “ढकने से क्या होगा, मस्जिद तो वहां है ही. यह सरकार-प्रशासन का कोई एजेंडा होगा. कोई भी हिंदू, मुस्लिम धर्म का विरोधी नहीं है. हम बस यह चाहते हैं कि जैसे हम हैं, वैसे आप रहें. जैसे हम शांत हैं, आप भी शांत रहें.”
उत्तराखंड के पर्यटन और धर्मस्व मंत्री सतपाल महाराज ने हरिद्वार में पत्रकारों को बताया था कि मस्जिद ढकने से किसी को कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए.
उन्होंने कहा, "आपको पता है कि जब कोई चीज़ होती है तो उसमें कुछ ओट लगा देते हैं. इस प्रकार से किया गया है तो उद्देश्य यही है कि कोई उत्तेजना न हो, कोई भड़के नहीं और हमारी कांवड़ यात्रा सुचारू रूप से चले.”
ऐसा पहली बार किए जाने के सवाल पर सतपाल महाराज ने कहा, “आपको पता है कि जब कहीं कंस्ट्रक्शन होता है तो उसे भी ढक दिया जाता है. पहली बार किया गया है तो अब हम देखेंगे कि क्या इसका फ़ीडबैक मिलता है हम लोगों को, उसका अध्ययन करेंगे.”
हालांकि, अब ये फ़ैसला वापस ले लिया गया है.
हर वर्ष सावन के महीने में होने वाली कांवड़ यात्रा को सकुशल पूरा करवाना उत्तराखंड के पुलिस, प्रशासन की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक होता है.
दो दिन पहले भी हरिद्वार में कथित रूप से कांवड़ छू जाने के आरोप में कांवड़ियों ने एक ई-रिक्शा चालक को बुरी तरह पीटा था और ई-रिक्शा को डंडे मार-मारकर तोड़ डाला था. इसके वीडियो वायरल हो गए थे.
इसके अलावा उसी दिन एक ट्रक चालक को भी पीटा गया था.
इन दोनों मामलों में पुलिस ने अज्ञात कांवड़ियों के ख़िलाफ़ मामला दर्ज किया है.
क्या है नेम प्लेट विवाद
बीते सप्ताह उत्तर प्रदेश और फिर उत्तराखंड में प्रशासन की ओर से कांवड़ यात्रा के रूट पर पड़ने वाले होटलों, ढाबों पर मालिकों को कर्मचारियों के नाम लिखने का आदेश जारी किया गया था.
ये मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा और दुकानदारों के नाम के बारे में आदेश पर शीर्ष न्यायालय ने 22 जुलाई को अंतरिम रोक लगा दी थी.
इस मामले से जुड़ी याचिकाओं पर जस्टिस ऋषिकेश रॉय और जस्टिस एसवीएन भट्टी की दो जजों वाली पीठ सुनवाई कर रही है.
उत्तर प्रदेश सरकार ने कोर्ट से कहा था कि दुकानों में मिलने वाले खाने में प्याज़ और लहसुन के इस्तेमाल की खबरों को लेकर हुए कुछ मतभेद के बाद कांवड़ यात्रा शांतिपूर्ण तरीके से और पूरी पारदर्शिता से करने के लिए इस तरह के कदम उठाए गए थे.
इस मामले में शुक्रवार यानी 26 जुलाई को भी सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई और कोर्ट ने इस अंतरिम रोक को जारी रखा.
शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई करते हुए अपने आदेश में कहा कि खाने की जगहों पर नाम लिखने के लिए किसी को बाध्य नहीं किया जा सकता.
हालांकि कोर्ट ने कहा कि अगर कोई स्वेच्छा से ऐसा करना चाहता है तो वो ऐसा कर सकता है, इस पर किसी तरह की रोक नहीं है.
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