यूपी के बाद अब यहां भी कांवड़ यात्रा के रूट पर ढाबे, होटल और रेहड़ी वालों को लिखना होगा अपना नाम

हरिद्वार

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इमेज कैप्शन, हरिद्वार में होटल, ढाबों में चेकिंग करती पुलिस
    • Author, राजेश डोबरियाल
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए

उत्तर प्रदेश की तर्ज़ पर उत्तराखंड में भी कांवड़ मार्ग पर खाने-पीने का सामान बेचने वाले होटलों, ढाबों ओर रेहड़ी वालों को अपना नाम प्रदर्शित करना होगा.

शुक्रवार को यह मामला तब चर्चा में आया जब हरिद्वार के एसएसपी प्रमेंद्र डोभाल ने इस संबंध में एक बयान दिया.

हालांकि, मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा कि यह फ़ैसला तो एक हफ़्ते पहले ही लिया जा चुका था.

शनिवार की दोपहर होते-होते हरिद्वार पुलिस ने इस फ़ैसले पर अमल करवाना शुरू भी कर दिया.

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हरिद्वार के एसएसपी ने क्या कहा?

हरिद्वार

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बता दें कि उत्तराखंड के हरिद्वार में हर की पैड़ी और ऋषिकेश में नीलकंठ से जल लेने के लिए हर साल करोड़ों की संख्या में कांवड़िये आते हैं.

पिछले साल यह संख्या चार करोड़ को पार कर गई थी और इस साल इसके बढ़ने की संभावना जताई जा रही है.

इतनी बड़ी संख्या में आने वाले कांवड़ियों को मैनेज करना पुलिस और प्रशासन की संभवतः सबसे बड़ी परीक्षा होती है और तमाम कोशिशों के बावजूद हर साल छोटे-बड़े कई हंगामे होते हैं.

और यही वजह उत्तराखंड सरकार ने ढाबों, रेहड़ियों पर नाम डिस्प्ले करने के पीछे बताई है.

वीडियो कैप्शन, प्रशासन के इस आदेश पर क्या कह रहे हैं स्थानीय दुकानदार, कांवड़िये और प्रशासन.
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उत्तर प्रदेश में कांवड़ मार्ग पर ढाबों, रेहड़ियों पर नाम प्रदर्शित किया जाना सुर्खियां बनने के बाद शुक्रवार शाम को हरिद्वार के एसएसपी प्रमेंद्र डोभाल ने कहा, “सभी एसएचओ, सर्किल ऑफ़िसर को आदेश दिया गया है कि सभी दुकानों, लगने वाली शॉप्स का प्रॉपर तरीके से वेरिफ़िकेशन होना चाहिए. "

"उनमें कितने लोग काम कर रहे हैं, कौन लोग काम कर रहे हैं. दूसरा उसमें जो प्रोपराइटर हैं उनका नाम लिखा जाना चाहिए क्योंकि जो क्यूआर कोड हैं उसमें कई बार धांधली की शिकायत आती है और विवाद बन जाता है... ताकि जो यात्रीगण वहां आ रहे हैं, वह किस दुकान से ले रहे हैं, उन्हें यह पता होना चाहिए."

मुख्यमंत्री धामी ने क्या कहा?

पुष्कर सिंह धामी

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इमेज कैप्शन, मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी शुक्रवार को देहरादून में प्रेस कॉन्फ़्रेंस को संबोधित करते हुए

इधर शुक्रवार को ही मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने देहरादून में एक प्रेस कांफ्रेंस को संबोधित करते हुए दावा किया कि यह फ़ैसला हफ़्ते भर पहले ही ले लिया गया था.

उन्होंने कहा, "12 तारीख़ को कांवड़ मेले से संबंधित बैठक में यह निर्णय किया था. इसके पीछे की वजह यह है कि अनेक लोगों ने कहा कि बाद में वैसी स्थिति पैदा होती कि लोग नाम बदलकर, अपनी पहचान छिपाकर दुकान खोल रहे हैं, अन्य कारोबार कर रहे हैं... यह ठीक नहीं है, सबका आइडेंटिफ़िकेशन होना चाहिए."

उन्होंने आगे कहा, "यह किसी को टारगेट करके या किसी को नुक़सान पहुंचाने के लिए नहीं है."

हालांकि मुख्यमंत्री की इस बात से सभी सहमत नहीं हैं.

'जातीय असहिष्णुता बढ़ाने वाला निर्णय'

हरीश रावत

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पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने फ़ेसबुक पर लिखा, “कांवड़ मार्गों में पड़ने वाले होटल, ढाबे, रेस्टोरेंट, रेहड़ी, ठेली वालों को अब अपना पूरा नाम होटल या ठेली पर लगाना पड़ेगा और अपने काम करने वाले लोगों के नाम भी अपनी छाती पर लगाने पड़ेंगे. जब 21वीं सदी में जातिवाद के बंधन टूट रहे हैं, तब जातीय असहिष्णुता को बढ़ावा देने वाला यह निर्णय क्यों?”

उन्होंने आगे लिखा, “हमारे देश और हिन्दू समाज ने छुआछूत के घावों को अपने सीने में सैकड़ों साल सहा‌ और उन घावों को भरने के लिए कई महापुरुषों ने जिनमें गांधी जी भी सम्मिलित हैं, अपना पूरा जीवन लगा दिया. धन्य हैं उत्तर प्रदेश सरकार, धन्य है उनकी अनुयायी उत्तराखंड सरकार! आप उन घावों को फिर कुरेदना चाहते हैं? एक प्रकार की छुआछूत, दूसरे प्रकार की छुआछूत को बढ़ावा दे. मैं दोनों सरकारों को सावधान करना चाहता हूं कि यह आप बहुत खतरनाक शुरुआत कर रहे हैं.”

भीम आर्मी के प्रवक्ता रहे क़ाज़ी मोहम्मद मोनिस आज़ाद समाज पार्टी से 2022 में विधानसभा चुनाव लड़ चुके हैं. वह कहते हैं कि यह मुसलमानों और दलितों को टारगेट करने के लिए किया गया फ़ैसला है. अगर प्रशासन यह चाहता है कि कोई असामाजिक तत्व काम न कर रहा हो तो पुलिस उसकी आईडी चेक करे, डिस्पले करवाने से तो सिर्फ़ यह पता चलता है कि अमुक आदमी अमुक धर्म या अमुक जाति का है.

वह कहते हैं कि इससे तो झगड़ा होने का अंदेशा भी बढ़ जाता है, अगर सरकार की मंशा ठीक है तो उन्हें पर्याप्त सुरक्षा उपलब्ध करवाई जाए, वह डिस्पले कर देंगे.

मोनिस कहते हैं कि सिर्फ़ मुसलमान ही नहीं इससे दलितों पर भी सीधा असर पड़ेगा. वो कहते हैं, “हमारा सामाजिक ढांचा ऐसा है कि दलितों के हाथ का नहीं खाते हैं. आमतौर पर तो आदमी खा लेता है लेकिन जाति पता चल जाएगी तो नहीं खाएगा.”

मोनिस कहते हैं कि कांवड़ यात्री रुड़की और मंगलौर विधानसभा में क़रीब 20 किलोमीटर की दूरी तय करते हैं. अगर इसमें 1000 छोटे-बड़े ढाबे-रेहड़ी होंगे तो इनमें 30 फ़ीसदी दलितों के होंगे और 40 फ़ीसदी मुसलमानों के.

इस फ़ैसले से इन लोगों के सीधे तौर पर प्रभावित होने की आशंका है.

पूरे प्रदेश में सबको ज़ाहिर करनी होगी पहचान

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बुधवार को उत्तराखंड सरकार ने राज्य में सभी फेरी-ठेली वालों को पहचान पत्र देने की घोषणा की थी.

शहरी विकास निदेशालय ने राज्य के सभी नगर आयुक्त, अधिशासी अधिकारियों को पत्र जारी कर फेरी और ठेली वालों का विवरण जुटाने और पहचान पत्र जारी कर इन्हें अनिवार्य रूप से ठेली/फड़ पर प्रदर्शित करने के निर्देश दिए थे.

इस पत्र के ज़रिए संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिए गए हैं कि पहचान पत्र में फेरी व्यवसायी का कोड, नाम, पता, फ़ोटो अंकित होनी चाहिए.

बहरहाल शनिवार दोपहर होते-होते हरिद्वार पुलिस ने इस फ़ैसले पर अमल करना शुरू कर दिया. पुलिस कांवड़ मार्ग पर लगने वाली खाने, फलों-सब्ज़ियों की रेहड़ियों और रेस्तरां-ढाबे वालों को नाम आदि डिस्प्ले करने या दुकान बंद करने को कहने लगी.

मंगलौर बस स्टैंड के पास फलों की रेहड़ी लगाने वाले दिलनवाज़ ख़ान ने बताया कि पुलिसकर्मियों ने उन्हें नाम प्रदर्शित करने और वहां से रेहड़ी हटाने को कहा है.

दिलनवाज़ नाम प्रदर्शित करने को लेकर आशंकित नज़र आए. उन्होंने कहा कि इससे तो नुक़सान ही होगा, “कोई भाई होगा तो ले जाएगा वरना तो कोई लेने से रहा.”

यह आशंका और डर कांवड़ मार्ग पर कई लोगों में नज़र आया और ज़्यादातर तो बात करने को भी तैयार नहीं हुए... क्योंकि वह नहीं चाहते थे कि वह पहचाने जाएं.

हालांकि अब उन्हें अपनी पहचान ज़ाहिर करनी ही होगी.

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