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रविवार, 14 सितंबर, 2008 को 15:41 GMT तक के समाचार
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बूढ़े शेरों की सवारी कब तक?

सौरभ गांगुली

हर खिलाड़ी के जीवन में ऐसा भी समय आता है जब उसकी पिछली उपलब्धियाँ उसका वर्तमान और भविष्य तय करने में बहुत कम भूमिका अदा करती हैं.

इस समय सौरभ गांगुली और उनके कई वरिष्ठ साथी इसी स्थिति का सामना कर रहे हैं. ये सोच कि मैं एक और मैच खेलने के लायक हूँ, किसी भी खिलाड़ी को ललचाती है और उसे सताती भी है.

यही सोच किसी भी खिलाड़ी के लिए कोई फ़ैसला लेने की राह में रोड़े भी अटकाती है. पहले भी कई सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ियों को इस कड़वी सच्चाई का सामना करना पड़ा है.

और मुझे यह कहने में अफ़सोस है कि ज़्यादातर खिलाड़ियों ने ज़रूरत से ज़्यादा समय तक टीम में बने रहने की कोशिश की और उन्हें टीम से बाहर जाने का फ़रमान सुनना पड़ा.

आज के ज़माने में जब टीम में सिर्फ़ स्थान बनाए रखना ही दाँव पर नहीं लगा होता, बल्कि दाँव पर यह भी लगा होता है कि आप विज्ञापन से मिलने वाली बड़ी कमाई खो सकते हैं और उस दुनिया से आपको अलग होना पड़ता है जो चकाचौंध से भरपूर है.

इस चमक-दमक की दुनिया से हटने का फ़ैसला आसान नहीं कहा जा सकता. लेकिन इन सबसे बीच यह बात भी सच है कि सौरभ गांगुली को ईरानी ट्रॉफ़ी के लिए टीम में नहीं चुनकर चयनकर्ताओं ने यह स्पष्ट कर दिया है कि टीम के चार वरिष्ठ खिलाड़ियों में सौरभ गांगुली उनके पहले निशाने पर हैं.

जायज़

वैसे इन चारों को आज नहीं तो कल टीम से जाना तो है ही. गांगुली इस बात पर ज़रूर चकित हो सकते हैं कि उन्हें क्यों निशाना बनाया जा रहा है. ख़ासकर एक बार टीम से निकाले जाने के बाद उनकी वापसी अच्छी रही और उनके रिकॉर्ड को देखते हुए उनका यह सोचना लाजमी है.

सचिन पर भी बोर्ड को फ़ैसला लेना है

श्रीलंका दौरे पर एक अकेले गांगुली नाकाम नहीं रहे थे. तो सिर्फ़ उन्हें ही क्यों निशाना बनाया जा रहा है.

हो सकता है कि इस सवाल में दम हो. लेकिन जहाँ तक मैं सोचता हूँ, अब समय आ गया है कि भारतीय टीम अपने इन पुराने 'गोल्डन' खिलाड़ियों के बिना अपने अस्तित्त्व के बारे में सोचे.

और इनमें सचिन तेंदुलकर भी शामिल हैं. चालीस और पचास रन बनाना इन खिलाड़ियों का आकलन नहीं हो सकता क्योंकि जब भी ये खिलाड़ी बल्लेबाज़ी के लिए आते हैं, हम उनके शतक की उम्मीद करते हैं.

दुनिया के लिए इन चार वरिष्ठ खिलाड़ियों में सौरभ गांगुली ऐसे हैं, जो सबसे कम फ़िट हैं. लेकिन बाक़ी के खिलाड़ी भी उनसे ज़्यादा पीछे नहीं. द्रविड़ और लक्ष्मण स्लिप में अपनी उपयोगिता के पीछे छिप सकते हैं.

लेकिन इसके अलावा उनका खेल भी गांगुली से अच्छा नहीं. टेस्ट टीम के कप्तान अनिल कुंबले को भी ये बात याद दिलाने की आवश्यकता है कि समय के साथ-साथ क़दमों की गति कम हो जाती है और शरीर भी पास से गुज़रते गेंद को पकड़ने की कोशिश में तेज़ी नहीं दिखा पाता.

संदेह

इस बात में कोई संदेह नहीं कि भारतीय क्रिकेट इस समय एक चौराहे पर खड़ा है. अब सवाल ये नहीं है कि कब बल्कि सवाल ये है कि कैसे भारतीय क्रिकेट बिना टीम को नुक़सान पहुँचाए इस संक्रमण के दौर से निकल जाएगा.

श्रीलंका में द्रविड़ भी नाकाम रहे

एक निराशा वाली बात ये भी है कि भारत की एक दिवसीय टीम की बल्लेबाज़ी भी उतनी साहसी और आशावादी नहीं, जैसे कि वह ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़ वनडे सिरीज़ में लगी थी.

जब भारत ने ऑस्ट्रेलिया को ऑस्ट्रेलिया में मात दे दी थी. श्रीलंका में वनडे सिरीज़ जीतने के बावजूद भारतीय टीम में जिस चीज़ की कमी नज़र आई, वो थी उनकी ताज़गी और उत्साह.

अगर भारतीय कप्तान महेंद्र सिंह धोनी पिच पर नहीं टिकते, तो टीम वनडे सिरीज़ भी हार जाती. इस स्थिति में अब ये चयनकर्ताओं पर है कि क्या वे ऑस्ट्रेलिया जैसी तगड़ी टीम के ख़िलाफ़ ही वरिष्ठ खिलाड़ियों को किनारे करने की कोशिश में लगेंगे या फिर उसके बाद.

जब भी वो समय आए, हर व्यक्ति बोर्ड और चयनकर्ताओं से यही उम्मीद करता है कि जिन खिलाड़ियों ने टीम की इतनी अच्छी सेवा की है, उन्हें उनके क़द से हिसाब से बेहतरीन विदाई दी जाए.

'छोड़ने' और 'हटाए जाने' के बीच पतली सी लकीर है. लेकिन यह विभाजन 'सम्मान' और 'अपमान' का है.

(लेखक हिंदुस्तान टाइम्स के खेल सलाहकार हैं)

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