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खेल के मामले में ग़रीब क्यों है भारत? | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
हमारा देश खेल के मामले इतना ख़राब क्यों है? यह एक ऐसा सवाल है जो हर चौथे साल पैदा हो जाता है जब पूरी दुनिया के एथलीट ओलंपिक खेल के नाम से प्रसिद्ध मंच पर अपना ज़ौहर दिखा रहे होते हैं. और हम पाते हैं कि हॉकी को छोड़कर हमने किसी भी खेल में आजतक कोई स्वर्ण पदक नहीं जीता है. हॉकी में हमें आठ स्वर्ण पदक मिले लेकिन हर बार पदकों का कुल योग चार पर ठहर जाता है. ये समय है कि हम ख़ुद को शर्मसार महसूस करें और ख़ुद ही अपनी आलोचना और समीक्षा करें. जब मैं दशकों पहले की ज़िदगी और रहन-सहन के नए मतलब तलाशने दुनिया घूम रहा था तो उस समय ओलंपिक में हिस्सा लेने वाले हर किसी को ख़ास माना जाता था. भारत उस समय भी ग़रीब था जो उसके इस शोर से बहुत दूर है कि वह अब महाशक्ति बन गया है. चारों ओर फ़ैली ग़रीबी और ज़िंदा रहने की जंग में मध्य वर्गीय परिवारों के पास इस बात की फ़ुर्सत ही नहीं है कि वो पढ़ाई के अलावा किसी और पेशे के बारे में सोच भी सके. खेल इनके लिए मनोरंजन का ज़रिया ज़्यादा और एक पेशे के रूप में नया मैदान कम है. प्राथमिकता ऐसे समाज में जहाँ शारीरिक ताक़त का प्रदर्शन हतोत्साहित किया जाता हो, शरीर को आध्यात्मिक निर्वाण में बाधा माना जाता हो, खेल को इसी तरह ज़िंदगी की प्राथमिकता में कहीं नीचे पड़ा रहना था.
ऐसे में जिनके पास पैसा है और जो खेलने का ख़र्च उठा सकते हैं वो भी अपने वर्ग के लोगों की नाराज़गी से बचने के लिए खेलने से दूर भागते हैं. अब समय बदल गया है. पूरे भारत नहीं तो कम से कम उसके एक हिस्से के पास बहुत सारा पैसा है और जीने का मतलब शारीरिक क्षमताओं के प्रदर्शन से मुँह चुराना नहीं रह गया है. ऐसे माहौल में खेल को आगे बढ़ना चाहिए था लेकिन दुखद रूप से ऐसा नहीं हुआ है. हम सिर्फ़ एक खेल वाले देश हैं, क्रिकेट. और इस खेल में भी हम विश्व विजेता नहीं हैं. इन दिनों आप जहाँ भी जाएँ, यही पूछा जाता है कि बीजिंग ओलंपिक में भारत कितने पदक जीतेगा? आम सहमति इस बात पर है कि हम पिछले बार की तुलना में अच्छा प्रदर्शन कर सकते हैं. इसका मतलब यह है कि ऐसा हो सकता है. हम एक से ज़्यादा पदक जीतेंगे और किसे पता वो स्वर्ण पदक भी हो सकता है. लेकिन उन देशों से इसकी तुलना कीजिए जिनसे हम ख़ुद को बहुत आगे मानते हैं और उनके खिलाड़ी कितने पदक ओलंपिक से लेकर लौटा करते हैं. चीन अब दुनिया के उन बेहतरीन देशों में है जिसके खिलाड़ी पदकों की ढेर लगा देते हैं. यहाँ तक कि हमसे बहुत ग़रीब देश इथियोपिया और कीनिया भी हमसे ज़्यादा पदक जीतते हैं. क्यों? ये वह सवाल है जो बार-बार पूछा जाता है. इसका जवाब बहुत व्यापक है. पैसे की कमी, कमज़ोर आधारभूत सुविधा, निचले स्तर पर प्रशिक्षण की सुविधा का अभाव, भाई-भतीजावाद, प्रशासनिक भ्रष्टाचार, ग़लत प्राथमिकताएँ और यहाँ तक कि खेलने वालों में इच्छाशक्ति की कमी, ये सारे कारण गिनाए जा सकते हैं. इस समस्या के मूल कारणों को लेकर होने वाली बहसों में पिछले सप्ताह हुई एक बहस में मैं भी गया. व्यवस्था एक बात जो सबसे साफ़ तौर पर सामने आई कि लोग राष्ट्रमंडल खेल जैसे आयोजनों पर हज़ारों करोड़ रुपए ख़र्च करने के भारत सरकार के फ़ैसले के बिल्कुल ख़िलाफ़ हैं.
उनका मानना है कि सरकार को इन आयोजनों पर पैसा बहाने से पहले खिलाड़ियों के लिए पूरे देश में निचले स्तर पर इसी पैसे से आधारभूत संरचना और सुविधा की व्यवस्था करनी चाहिए. भारत के लिए यह शर्मनाक है कि वह ओलंपिक इतिहास के हाशिए पर भी नहीं है लेकिन इस खेल आयोजन की भविष्य में मेज़बानी का दावा पेश करने की सोच रहा है. तर्क दिया जा रहा है कि चूँकि हम महाशक्ति हैं तो हमें भी वह सब करना चाहिए जो दूसरी महाशक्तियाँ करती हैं. इससे साथी देशों के बीच हमारी प्रतिष्ठा तो बढ़ती है लेकिन कोई पदक नहीं बढ़ता है. विरोधाभास देखिए कि एक तरफ़ हमारे पास खेल के विकास पर ख़र्च करने के लिए पैसा नहीं है लेकिन दूसरी तरफ़ हम ऐसे महाआयोजनों पर पैसा बहाने की चिंता नहीं करते. और इस पूरी क़वायद का फ़ायदा आख़िरकार किसे मिलता हैं? आम राय यही है कि जो प्रशासक ऐसी प्रतियोगिता का आयोजन करते हैं. वो मेज़बानी से एक हत्या जैसा काम कर रहे हैं. उम्मीद करें कि हमारे तीरंदाज़, निशानेबाज़ और मुक्केबाज़ अगले महीने शुरू हो रहे बीजिंग ओलंपिक से मुठ्ठी भरकर पदक लाएँ. और आइए सरकार पर इस बात का दबाव बनाने का अभियान छेड़ें कि वह ओलंपिक की मेज़बानी का इरादा छोड़कर देश के कोने-कोने में अपने खिलाड़ियों के प्रशिक्षण के खेल के ढाँचागत विकास पर उस पैसे को ख़र्च करे. (लेखक हिंदुस्तान टाइम्स स्पोर्ट्स के सलाहकार हैं) |
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