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कहाँ हो....चक दे इंडिया ब्वॉय | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद (आईसीसी) की हाल की घोषणाएँ आपको भ्रमित ज़्यादा करती हैं कि वाक़ई क्रिकेट किस दिशा में जा रहा है, लेकिन फ़िलहाल अपना ध्यान पर राष्ट्रीय खेल माफ़ कीजिएगा 'राष्ट्रीय शर्म' पर ही केंद्रित करते हैं. अभी इस मुद्दे पर अटकलबाज़ी करने का कोई फ़ायदा नहीं कि आईसीसी में मुख्य सलाहकार का पद मिलने के बाद आईएस बिंद्रा की भूमिका क्या होगी. हालाँकि कई लोग तो ये मानते हैं मुख्य कार्यकारी अधिकारी के पद पर उनके नाम की सहमति ना होने के कारण आईसीसी ने भारतीय क्रिकेट बोर्ड को संतुष्ट करने के लिए यह टुकड़ा उनके आगे डाल दिया है. वैसे अभी से इस पर अटकलबाज़ी करने का कोई मतलब नहीं. पहले इंतज़ार कीजिए...फिर कुछ कहिए. हॉकी की बात करें तो ये बात किसी को भूली नहीं है कि केपीएस गिल साहब ने अपने त्यागपत्र की मांग ठुकरा दी थी और अंतरराष्ट्रीय हॉकी फ़ेडरेशन पर आरोप लगाया था कि नियम बदलने के कारण भारत ओलंपिक के लिए क्वालीफ़ाई नहीं कर पाया था. अब वही गिल साहब पुराने खिलाड़ियों, अधिकारियों, खेल मंत्रालय के आकाओं और फ़ेडरेशन के तकनीकी सलाहकार रिक चार्ल्सवर्थ से भी मिल रहे हैं ताकि भारत को फिर से विश्व चैम्पियन बनाया जा सके. लोकतंत्रवादी वाह गिल साहब, बड़े नेक विचार हैं आपके. हम हमेशा से जानते थे कि वे बड़े दिल वाले व्यक्ति हैं. ऐसा एक महान लोकतंत्रवादी ही कर सकता है कि जो उस पर देश की हॉकी को नष्ट करने का आरोप लगाने वालों को बुलाता है और उनकी बातें भी सुनता है.
छाती पीटने वाले पेशेवर लोगों और अज्ञानी मीडिया को अब एक नए ब्लूप्रिंट के बारे में बताया जाएगा जिसके आधार पर भारतीय हॉकी को पटरी पर लाया जा सकेगा. ये गिल साहब की महानता भी दर्शाती है जो अपने फ़ेडरेशन और अपनी टीम को छोड़ना नहीं चाहते जिसके भविष्य के बारे में कोई उम्मीद नहीं दिखती. कोई भी स्वार्थी व्यक्ति 14 साल तक कोशिश करने के बाद शायद अपना पद छोड़ ही देता लेकिन गिल साहब कभी नहीं ऐसा करेंगे. पूरे देश को उन्हें शुभकामना देनी चाहिए और उम्मीद करनी चाहिए कि अगले 14 साल में शायद हम फिर से ओलंपिक के लिए क्वालीफ़ाई कर ही जाए. जो लोग गिल महोदय को अच्छी तरह जानते हैं, वो ये भी बताते हैं कि वे अपने समर्थक सेक्रेटरी ज्योतिकुमारन को भी नहीं छोड़ सकते. दुनिया भले ही ज्योतिकुमारन को विलेन मानती हो, लेकिन टीम-मैन के रूप में चर्चित गिल साहब तो अपने समर्थकों के साथ ही तैरेंगे या डूबेंगे. हम तो डूबेंगे सनम.... विडंबना ये है कि फ़ेडरेशन में गिल के बड़े समर्थक के रूप में चर्चित ज्योतिकुमारन का करियर ग्राफ़ हॉकी की दशा-दिशा के ठीक विपरीत बढ़ा है. इसलिए हो सकता है कि अगले 14 साल बाद ये दोनों महाशय बेहतर स्थितियों में फ़ेडरेशन को अलविदा कहें.
इस महान घड़ी में भारतीय हॉकी फ़ेडरेशन की एक आलोचना हो रही है, तो इसकी वजह है फ़ेडरेशन का उस प्रतिभाशाली हॉकी कोच का भूल जाना जिसने भारतीय महिलाओं को वर्ल्ड चैम्पियनशिप जीतने में मदद की थी. हॉकी के विकास के लिए यह महत्वपूर्ण है कि महान फ़िल्म अभिनेता शाहरुख़ ख़ान को क्रिकेट से विमुख किया जाए. भारतीय खेल के चक दे ब्वॉय भी शायद अब हॉकी से निराश हैं. इसलिए तो वे वो सब ट्वेन्टी 20 क्रिकेट के लिए कर रहे हैं जो उन्होंने एक समय हॉकी के लिए किया था. हॉकी से विमुख क्यों इससे पहले की वो भारत को...माफ़ कीजिएगा कोलकाता नाइट राइडर्स को एक अजेय टीम बनाए, किंग ख़ान से यह अनुरोध करना चाहिए कि देश की ख़ातिर वे गिल साहब के साथ खड़े हों ताकि हमारा राष्ट्रीय शर्म एक बार फिर राष्ट्रीय खेल बन सके.
क्या आप जानते हैं ऑस्ट्रेलियाई कोच चार्ल्सवर्थ को आईएचएफ़ ने भारतीय टीम को प्रशिक्षित करने के लिए अनुमति क्यों नहीं दी----क्योंकि वे ऐसा कर ही नहीं सकते, क्योंकि वे सपने की दुनिया में रहते हैं और उनमें वह दुस्साहस था कि वे हमें कह सकें कि तीन घंटे में मेडल जीतना सिर्फ़ बॉलीवुड की फ़िल्म में ही संभव है. बेचारे चार्ल्सवर्थ....उनकी हिम्मत कैसे हुई कि उन्होंने भारतीय फ़िल्म उद्योग और किंग ख़ान के बहुआयामी व्यक्तित्व पर सवाल उठाए.... कम ऑन मैन....समझदार बनो और वास्तविक दुनिया में जीओ..... |
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