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शनिवार, 12 जुलाई, 2008 को 11:24 GMT तक के समाचार
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आराम नहीं तो राम राम....

भारतीय बोर्ड
भारतीय बोर्ड ने ज़िम्बाब्वे का समर्थन किया
क्या उस समय किसी तरह की कोशिश करने का कोई मतलब रह जाता है, जब उपलब्धि हासिल करने के लिए भागते-भागते आपके जीवन से ख़ुशी चली जाती है और उत्साह कम हो जाता है.

लापरवाह और थके भारतीय खिलाड़ियों को पाकिस्तान में हुए एशिया कप के दौरान तेज़ धूप और गर्मी में मैदान में भागते देखना दर्शकों के लिए कोई अच्छा अनुभव नहीं था.

ये तो स्पष्ट ही था कि ज़रूरत से ज़्यादा क्रिकेट के कारण खिलाड़ियों के शरीर और मन-मस्तिष्क पर उल्टा असर हो रहा है और जब महेंद्र सिंह धोनी ने वो बात कह दी तो कोई आश्चर्य नहीं हुआ.

धोनी ने वो बात कही जो हर क्रिकेटर कहना चाहता था- प्लीज़ हमें अपनी सीमा में ही रहने दें. हम कोई सुपरमैन नहीं. हमें भी आराम की ज़रूरत है.

धोनी के बयान पर बोर्ड की प्रतिक्रिया जल्दी आई और उम्मीद के मुताबिक़ ही आई. बोर्ड का कहना था कि अगर कोई खिलाड़ी आराम चाहता है तो वो ऐसा करने के लिए स्वतंत्र है.

लेकिन इस प्रतिक्रिया से बोर्ड की अकड़ तो सामने ही आ गई और ये भी अंदाज़ा हो गया कि खिलाड़ियों को लेकर बोर्ड कितना चिंतित है. वैसे धोनी ने इतना ही नहीं किया. वे एक क़दम और आगे गए और श्रीलंका के ख़िलाफ़ टेस्ट सिरीज़ से अपना नाम वापस ले लिया.

विचार

धोनी इसके लिए बधाई के भी पात्र हैं. लेकिन एक अलग विचार ये है कि लगातार 44 दिनों तक इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) में खेलने वाले वही खिलाड़ियों ने उस समय ज़्यादा क्रिकेट खेलने पर चिंता नहीं व्यक्त की थी.

उन्होंने ऐसा इसलिए नहीं किया क्योंकि उन्हें पैसे इतने ज़्यादा मिल रहे थे. और अंतत: क्या बड़ी बोली लगाने वालों के लिए खेलने से खिलाड़ी चिंतित नहीं होते और ना ही उन्हें अपनी शारीरिक स्थिति का ही ख़्याल आता है क्योंकि इसमें पैसा ज़्यादा लगा है.

ये एक ऐसा तर्क है जिसे काटना मुश्किल है. लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि पैसा और खिलाड़ियों को पटाने की कोशिश कहीं बाहर से नहीं हो रही बल्कि इसके पीछे वही लोग है जिन पर मुख्यधारा की क्रिकेट की ज़िम्मेदारी है.

 क्या ये भारतीय क्रिकेट बोर्ड की ज़िम्मेदारी नहीं है कि वो लगातार चल रहे क्रिकेट मैचों के बीच खिलाड़ियों को आराम देने की उचित व्यवस्था करे? क्या ये बोर्ड की ज़िम्मेदारी नहीं है कि वे यह सुनिश्चित करें कि मैच देखने आए लोगों को अच्छी क्रिकेट देखने को मिले

पहले तो ऐसी स्थिति ही क्यों खड़ी की जाए जहाँ अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट और क्लब क्रिकेट आमने-सामने आ जाए. और तो और खिलाड़ियों को मिलने वाले पैसे का अंतर भी इतना बड़ा हो.

बड़े-बड़े संतों को इतना पैसा डिगा सकता है. तो युवा खिलाड़ियों के साथ ये खेल क्यों खेले जो संत बनने का दावा भी नहीं करते.

दरअसल जो बात मैं उठाना चाहता हूँ, वो ये है कि जो लोग भारत में क्रिकेट का कर्ता-धर्ता की ये ज़िम्मदारी है कि वे यह देखें कि कौन की सर्वश्रेष्ठ प्रतिभा देश के लिए खेलने को उपलब्ध है.

वो भी ऐसी परिस्थितियों में जहाँ खिलाड़ी अपना सर्वोत्तम प्रदर्शन कर सके. ये भी कोई छिपी हुई बात नहीं है कि सचिन तेंदुलकर, ज़हीर ख़ान और श्रीसंत अगर आईपीएल में नहीं खेलते तो एशिया कप के लिए वे उपलब्ध होते.

उनकी ग़ैर मौजूदगी और थके हुए खिलाड़ियों के साथ खेलने से ये हुआ कि भारत लगातार दो फ़ाइनल हार गया. कुछ पहले पहले तक ऑस्ट्रेलिया को हराने के बाद भारत को नंबर वन टीम का बड़ा दावेदार माना जा रहा था.

ज़िम्मेदारी

क्या ये भारतीय क्रिकेट बोर्ड की ज़िम्मेदारी नहीं है कि वो लगातार चल रहे क्रिकेट मैचों के बीच खिलाड़ियों को आराम देने की उचित व्यवस्था करे? क्या ये बोर्ड की ज़िम्मेदारी नहीं है कि वे यह सुनिश्चित करें कि मैच देखने आए लोगों को अच्छी क्रिकेट देखने को मिले.

बोर्ड ने खिलाड़ियों को आराम देने की पहल नहीं की है

और ऐसा तभी होगा जब खिलाड़ी शारीरिक और मानसिक रूप से थके नहीं होंगे. आप धोनी को चालाक कह सकते हैं क्योंकि उन्होंने टेस्ट सिरीज़ से अपने को अलग रखकर अपने 'बड़े हितों' की रक्षा कर ली है.

लेकिन आप ये मत भूलिए कि टेस्ट टीम में धोनी की जगह ऐसी है जिनके बिना रहा नहीं जा सकता और अगर उनकी अनुपस्थिति में दूसरे खिलाड़ी ने अच्छा प्रदर्शन किया तो टेस्ट टीम से उनकी जगह जा भी सकती है.

आप ये भी तर्क दे सकते हैं कि क्या श्रीलंका में टेस्ट सिरीज़ से पहले वनडे मैच खेले जाते तो क्या धोनी फिर भी सिरीज़ से अपने को अलग रख पाते?

आप और भी कई तर्क दे सकते हैं और ये सिलसिला चलता रह सकता है. लेकिन आप उस मुद्दे को ग़लत नहीं ठहरा सकते, जो धोनी के टीम से हटने से उठा है. नहीं न, बिल्कुल नहीं.

(लेखक हिंदुस्तान टाइम्स स्पोर्ट्स के सलाहकार हैं)

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