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उपलब्धि के उत्सव का अर्थशास्त्र | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
जब कपिल देव और उनके साथी खिलाड़ियों ने अपने आप को और क्रिकेट की दुनिया को चकित करते हुए वनडे क्रिकेट में दबदबे का प्रतीक विश्व कप जीता तो उन्हें इसका अंदाज़ा नहीं था कि आने वाले हर साल के साथ उनकी उपलब्धि और बड़ी होती जाएगी. साथ की इस जीत के कारण उनकी कमाई में इतनी बढ़ोत्तरी होगी, उन्होंने इसकी कल्पना तक नहीं की होगी. वर्ष 1983 में भारत अपने पाँव जमाने की कोशिश कर रहा था. देश इस समय जिस आर्थिक प्रगति के दौर से गुज़र रहा है, उस समय ये सोचना भी एक सपने की तरह था. उस समय ब्लैक एंड व्हाइट टेलीविज़न का दौर था. लेकिन 25 जून की उस गरम रात को कप्तान कपिल देव को प्रूडेंशियल कप उठाते देखना और वो भी कलर टीवी पर, एक सौभाग्य की बात थी. हालाँकि कुछ लोगों को ये सौभाग्य भी मिला था. क्रिकेट उस समय लोकप्रिय था लेकिन क्रिकेट में आजकल जिस तरह पैसा है, वैसा उस समय नहीं था. आजकल तो भी जो भी क्रिकेट खेलता है, भले ही वो राज्य की टीम क्यों ना हो, पैसा कम नहीं मिलता. इन 25 वर्षों में ना सिर्फ़ हमने क्रिकेट की दुनिया में क्रांतिकारी परिवर्तन देखे हैं, बल्कि आर्थिक प्रगति भी जम कर हुई है. आकलन उदारीकरण के बाद के इस दौर में एक खिलाड़ी कितना कमाता है, इसी आधार पर उसकी उपलब्धि का आकलन होता है.
आज जब कपिल देव और उनके साथी खिलाड़ी टीवी पर आकर ये बताते हैं कि विश्व कप जीतने का मतलब क्या है और जब वे बताते हैं कि कैसे उन्होंने विश्व कप जीतकर असंभव को संभव कर दिखाया, तो वे ऐसा मुफ़्त में नहीं कर रहे हैं. या तो यह प्रायोजकों के लिए होता है या फिर टीवी चैनल उन्हें इसके लिए भारी-भरकम राशि देते हैं. लेकिन ऐसा नहीं है कि उन्होंने ही ये सब ताम-झाम शुरू किया है. अब को ये ऐसी बात है जिसका चलन आम है. क्रिकेट के बड़े-बड़े सितारे अपने एजेंटों के माध्यम से इस प्रक्रिया में हिस्सा लेते रहते हैं. 1983 की विश्व विजेता टीम के खिलाड़ी देश की आर्थिक प्रगति का लाभ उठा रहे हैं. इनमें से कई तो इस तथ्य को भी ग़लत साबित कर रहे हैं कि वे ग़लत समय पर पैदा हुए थे. इनमें से कई ये भी सोच रहे होंगे कि क्या उन्होंने बीसीसीआई से अलग ज़ी समूह के इंडियन क्रिकेट लीग (आईसीएल) से जुड़कर सही फ़ैसला किया था या नहीं. अछूत कपिल आईसीएल से जुड़ने के बाद कपिल देव बीसीसीआई के लिए अछूत बन गए हैं. बोर्ड ने कपिल देव और उनकी विश्व विजेता टीम के साथी खिलाड़ी- मदन लाल, संदीप पाटिल, रोजर बिन्नी और बलविंदर सिंह संधू को हर तरह की सुविधा से वंचित कर रखा है.
बोर्ड चाहता है कि हम इन खिलाड़ियों की उपलब्धियों को भूल जाएँ. लेकिन दुर्भाग्य की बात ये है कि बोर्ड उन यादों को हमारे जेहन से नहीं हटा सकता कि कैसे कपिल देव और उनके साथी खिलाड़ियों ने भारत को विश्व कप जितवाया. वही कपिल देव, जो बिना किसी लाग-लपेट के भारत के महानतम क्रिकेटर कहे जा सकते हैं और जो विश्व विजेता टीम के कप्तान थे. इसलिए जब सुनील गावसकर ने विजय माल्या से 1983 की विश्व विजेता टीम के खिलाड़ियों को पुरस्कार दिलवाया, तो लजा कर बीसीसीआई ने भी टीम के सम्मान में कार्यक्रम करने का फ़ैसला किया. भारतीय क्रिकेट की महान उपलब्धि के 25वें वर्ष में एक ओर तो भारतीय बोर्ड को चुनौती देने के कारण कपिल देव का पोस्टर मोहाली स्टेडियम से हटा दिया जाता है, तो दूसरी ओर वही लोग इन खिलाड़ियों का सम्मान कर रहे हैं.
दरअसल बाज़ार की नई शक्तियों की ओर से पैसा कमाने के मौक़े का फ़ायदा उठाने के लिए ये क्रिकेटरों और क्रिकेट प्रशासन पर पकड़ रखने वालों के बीच मजबूरी में हुई शादी की तरह है. एक जो भारतीय क्रिकेट का असली ब्रैंड एम्बैसडर है तो दूसरे की उपलब्धि यही है क्रिकेट का प्रबंधन उनके हाथों में है. निश्चिंत रहिए, ये युद्धविराम लंबे समय तक नहीं रहने वाला. हम तो सिर्फ़ यही उम्मीद करते हैं कि लगातार बढ़ रहे जिस क्रिकेट के बाज़ार पर अधिपत्य के लिए लड़ाई हो रही है, उसमें क्रिकेट ना हार जाए. (लेखक हिंदुस्तान टाइम्स स्पोर्ट्स के सलाहकार हैं) |
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