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आज़ादी के बाद खेल जगत के उतार-चढ़ाव | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
हॉकी के जादूगर कहे जाने वाले मेजर ध्यानचंद, क्रिकेट की दुनिया के बेताज़ बादशाह लाला अमरनाथ और आख़िर में डंके की चोट पर कुश्ती जीतने वाले पहलवान गामा, ये कुछ ऐसे नाम हैं जिन्हें सुनकर आज भी किसी भी भारतीय का सीना गर्व से फूल जाता है. लेकिन यह सब नाम उस समय के हैं जब भारत एक ग़ुलाम देश था और इन सभी ख़िलाडियों ने ब्रितानी झंडे 'यूनियन जैक' तले ‘ब्रिटिश इंडिया’ के नाम से विभिन्न अंतरराष्ट्रीय स्पर्धाओं में हिस्सा लिया. अन्य देशवासियों की तरह इन खिलाड़ियों के दिल में भी आज़ाद भारत का नाम रोशन करने की कसक थी. यह सपना सच तब हुआ जब भारत ने पहली बार 1948 के लंदन ओलंपिक खेलों में एक आज़ाद देश के रूप में हिस्सा लिया. लंदन के वेम्बली स्टेडियम में तिरंगा लहराया गया और सोने पर सुहागा तो तब हुआ जब भारतीय हॉकी टीम ने स्वर्ण पदक जीता और 'जन-गण-मन' की धुन पूरे स्टेडियम में गूँज उठी. और तब भारतीय खेलों में एक नया अध्याय जुड़ा जो आज 60 साल बाद भी देश के खेल इतिहास की अनमोल धरोहर है. हॉकी और क्रिकेट हॉकी और क्रिकेट भारत को अंग्रेज़ी राज से विरासत में मिला. फिर भी इस विरासत को ‘मेन इन ब्लू’ यानी भारतीय क्रिकेट टीम ने बख़ूबी संभाल कर रखा. अजित वाडेकर के नेतृत्व में 1971 में इंग्लैंड और वेस्टइंडीज़ में मिली दोहरी जीत और फिर 1983 में कपिल देव के ‘डेविल्स’ की ऐतिहासिक वर्ल्ड कप जीत आज भी सुनहरों अक्षरों में अंकित है. इसके बाद दौर शुरू हुआ सचिन तेंदुलकर और सौरभ गाँगुली जैसे सितारों का जो आज भी आकाश में बारात की चमक बिखेर रहे हैं. कभी खुशी, कभी ग़म के इन 60 सालों में भारतीय खिलाड़ियों ने कभी हँसाया, कभी रूलाया और कभी तो शर्म से सर नीचा करने को मजबूर किया. भले ही केडी जाधव का नाम शायद आज की पीढ़ी भूल चुकी, लेकिन महाराष्ट्र के इस पहलवान ने ही 1952 के हेलसिंकी ओलंपिक खेलों में भारत को पहला व्यक्तिगत पदक दिलाया था. पदक जाधव के बाद व्यक्तिगत स्तर पर ओलंपिक पदक जीतने का गौरव केवल तीन अन्य भारतीयों को मिला है.
भले स्वर्ण पदक अभी नहीं मिला हो लेकिन लिएंडर पेस, कर्णम मल्लेश्वरी और राज्यवर्धन सिंह राठौर का नाम ओलंपिक पदक तालिका में तो आया ही है. ‘फ़लाइंग सिख’ के नाम से ख़्याति प्राप्त मिल्खा सिंह रोम में पदक से बेशक चूक गए लेकिन उनका नाम स्वर्ण अक्षरों में तो लिखा ही जाएगा. आज अपनी कड़ी मेहनत, लगन और पिछले दिनों की याद ताज़ा करते हुए मिल्खा सिंह कहते हैं, “बिना डंडे और अनुशासन के भारत में खेलों का स्तर नहीं सुधरेगा” और शायद ये सच भी है." मेहनत और अनुशासन का एक उदाहरण लिएंडर पेस हैं. ‘इंडियन एक्सप्रेस’ के नाम से मशहूर पेस और महेश भूपति की जोड़ी ने न जाने कितने ख़िताब जीत कर भारत का नाम ऊँचा किया है. व्यक्तिगत पदकों के अलावा पिछले साठ सालों में भारतीय हॉकी टीम ने भी पाँच स्वर्ण पदक जीते और 1975 में विश्व कप भी. लेकिन इन सबके बीच एक शून्य वह भी था जब दिल्ली के 1982 के एशियाई खेलों में मीर रंजन नेगी ने पाकिस्तान के हाथों सात गोल खाए और वह भी तब जब भारतीय खेल, एशियाई खेलों से एक नए युग में जा रहे थे और स्वयं प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी नेशनल स्टेडियम में मौज़ूद थीं. नारी शक्ति लेकिन इन खेलों ने एक चिंगारी ज़रूर प्रज्जवलित की जो 1984 के लॉस एंजेल्स ओलंपिक खेलों में पीटी ऊषा के नाम से हर भारतीय के दिल में जलन छोड़ गई. और फिर शुरू हुआ दौर महिला शक्ति का. ऊषा के बाद शाइनी विल्सन, वंदना राव, अंजलि वेदपाठक, कोनेरू हम्पी, अपर्णा पोपट, एमसी मेरीकॉम, कुंजरानी देवी और न जाने कितनी ऐसी लड़कियाँ हैं जो देश-विदेश में इस भारतीय महिला शक्ति का झंडा गाड़ चुकी हैं. इसी शक्ति को बख़ूबी आगे लाने वालों में आज नाम है सानिया मिर्ज़ा और अंजू बॉबी जॉर्ज का. अगर आज से 10-15 साल बाद कोई छोटा बच्चा या बच्ची टेनिस कोर्ट पर खेलता दिखे या फिर लाँग जम्प पिट पर छलाँग लगा रहा हो तो उसका नाम ज़रूर पूछना पड़ेगा. शायद वो छोटी सानिया या छोटी अंजू अपनी माता के पद-चिह्नों पर चल रही हो. यही आज की इन खिलाड़ी महिलाओं को सच्चा सलाम होगा- माँ तुझे सलाम. |
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