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शुक्रवार, 10 अगस्त, 2007 को 11:56 GMT तक के समाचार
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भारतीय लोकतंत्र के साठ साल का लेखा-जोखा

भारतीय संसद
'लोकतांत्रिक मूल्यों के साथ-साथ तमाम मुश्किलें ही भारत को असाधारण लोकतंत्र बनाती हैं'
भारत में स्वतंत्रता के बाद 60 साल में राष्ट्रीय स्तर पर लोकतंत्र ख़ासा मज़बूत हुआ है, लेकिन गाँव-तहसील स्तर पर अलोकतांत्रिक व्यवहार और हिंसा भी नज़र आती है.

भारत एक बहुत ही असाधारण लोकतंत्र है जिसकी कुछ बहुत ही मज़बूत लोकतांत्रिक विशेषताएँ हैं और कुछ बहुत ही अलोकतांत्रिक विशेषताएँ भी हैं.

कुलमिलाकर देखा जाए तो लोकतांत्रिक मूल्यों के साथ-साथ तमाम तरह की मुश्किलें ही आज़ाद भारत को एक असाधारण लोकतंत्र बनाती हैं.

भारतीयों ने लोकतांत्रित व्यवस्था में रहना पसंद किया है.

उपलब्धियाँ

उपलब्धियों की बात करें तो यही लोकतांत्रित ढाँचा है जिसने ‘सेफ़्टी वॉल्व’ का काम किया है और कभी-कभी असल मुद्दे भी सलुझाए हैं. नहीं तो भारत जैसा बड़ा और इतनी असमानताओं वाला देश भला अविभाजित कैसे रह सकता था?

भारत में लोकतांत्रिक परंपरा दूर-दूर तक फैल रही है और उसकी जड़ें और गहरी हो रही हैं. देखा गया है कि चुनावों में संपन्न वर्ग के मुकाबले, आर्थिक और सामाजिक दृष्टि से पिछड़े वर्ग ज़्यादा बढ़-चढ़कर भाग लेते हैं.

मुख्य पड़ाव
 पिछले 15 साल में– 1990 के दशक से लेकर अब तक लोकतांत्रिक व्यवस्था में अनिश्चितता बढ़ गई है. यदि लोकतांत्रिक राजनीति के मुख्य पड़ावों की बात करे तो इमरजेंसी और फिर उसका दोहराया न जाना, मंडल आयोग की सिफ़ारिशें लागू करना, बाबरी मस्जिद विध्वंस, 1998 के पोखरण परमाणु बम धमाके और गुजरात में मुसलमानों के ख़िलाफ़ दंगे प्रमुख हैं
प्रफ़ेसर अचिन वनायक

दूसरी ओर विकसित देशों में उपेक्षित वर्ग मतदान में ज़्यादा संख्या में भाग नहीं लेता क्योंकि उसे चुनाव में भाग लेने का कोई ख़ास मक़सद नज़र नहीं आता.

अब सवाल उठता है कि क्या अपनी स्थिति सुधारने के लिए सामाजिक या आर्थिक रूप से पिछड़ गए वर्ग की लोकतांत्रिक व्यवस्था में पूरी आस्था है?

ये आस्था का सवाल कम है और असल बात ये है कि वे इस व्यवस्था को ज़रूरी मानते हैं लेकिन काफ़ी नहीं. उन्हें लगता है कि इससे उनकी मदद होती है और इसका इस्तेमाल करना चाहिए, फिर चाहे ये पर्याप्त न हो.

आज़ादी के बाद के 20-25 साल में मज़दूरों और किसानों के संघर्ष, यानी आर्थिक मुद्दो पर आंदोलन ज़रुर हुए थे. लेकिन इसके बाद सांस्कृतिक मुद्दों पर असंतोष, आर्थिक असंतोष से ज़्यादा देखा गया है.

विभिन्न क्षेत्रों में आर्थिक विकास के लिहाज़ से फ़र्क तो रहा है लेकिन जनांदोलन सामाजिक-सांस्कृतिक मुद्दों पर रहे हैं. इसका ये मतलब नहीं है कि आर्थिक असंतोष रहा ही नहीं, लेकिन अब आर्थिक मुद्दों पर लोगों को एकजुट करना ख़ासा मुश्किल हो गया है.

अहम पड़ाव

आरक्षण विरोधी छात्र
पिछड़ों को आरक्षण देकर उनके अधिकार दिलाने का प्रयास लोकतंत्र का एक अहम पड़ाव रहा

भारतीय लोकतंत्र की असफलताओं की बात करें तो पिछले 15 साल में– 1990 के दशक से लेकर अब तक लोकतांत्रिक व्यवस्था में अनिश्चितता बढ़ गई है.

यदि लोकतांत्रिक राजनीति के पाँच मुख्य पड़ावों की बात करें तो पहला, आपातकाल का लागू किया जाना और उतना ही महत्वपूर्ण, फिर उसका दोहराया न जाना था.

दूसरा था मंडल आयोग की सिफ़ारिशों को लागू करना यानी पिछड़ों को और अधिकार दिलाने का प्रयास.

आज़ाद भारत के लोकतांत्रिक सफ़र का तीसरा मुख्य पड़ाव था बाबरी मस्जिद विध्वंस और चौथा था वर्ष 1998 के पोखरण धमाके जिनसे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को बहुत सदमा पहुँचता.

पाँचवाँ मुख्य पड़ाव है वर्ष 2002 में गुजरात में गोधरा की घटना और अल्पसंख्यक मुस्लिम समुदाय के सदस्यों की हत्याएँ, जिसके लिए ज़िम्मेदार अधिकतर लोगों को केवल क़ानूनी तौर पर ही नहीं बल्कि राजनीतिक तौर पर भी सज़ा नहीं मिली.

ये सब मुख्य पड़ाव है और इनमें हिंसा का पहलू भी रहा है. शायद मंडल आयोग सिफ़ारिशों को छोड़कर बाक़ी घटनाएँ लोकतंत्र के लिए नकारात्मक हैं.

अपनी बारी की प्रतीक्षा में मतदाता
'आर्थिक, सामाजिक दृष्टि से पिछड़े वर्ग स्थिति सुधारने में चुनावी व्यवस्था को ज़रूरी मानते हैं'

ये सब घटनाएँ इस बात का भी संकेत हैं कि भारत के उच्च वर्ग का किरदार किस तरह बदल रहा है. भारतीय लोकतंत्र असल में ‘आप पर कौन शासन करेगा,’ इसकी प्रतिस्पर्धा है.

ये उस लिहाज़ से लोगों के सशक्तिकरण की प्रक्रिया कम है. लेकिन राज्यों के स्तर पर लोगों के पास काफ़ी विकल्प हैं जो एक सकारात्मक बात है.

संसद में 28 अलग-अलग राजनीतिक दल हैं और पार्टियों की नीतियों में फ़र्क देंखे तो वह भी ख़ासा है. अमरीका या ब्रिटेन में तो लोगों के पास विकल्प सीमित हैं.

सक्रिय ताकतें

आज के भारतीय लोकतंत्र और भविष्य के भारत की रचना में कौन सी ताक़तों की मुख्य भूमिका है?

भारत की रचना कर रही ताकतें:
धीमी गति से लेकिन बढ़ रहा हिंदुत्व
दलितों का सत्ता में भागीदारी पाना
मुसलमानों का अपने नेतृत्व से असंतोष
भारतीय राजनीति का क्षेत्रीयकरण
प्रोफ़ेसर अचिन वनायक

इस संदर्भ में सबसे पहली ताक़त है अनिश्चित और धीमी गति से लेकिन लगातार बढ़ रहा हिंदुत्व जिसका प्रभाव केवल चुनावों में ही नहीं, बल्कि समाजिक रिश्तों पर भी दिख रहा है.

दूसरी बड़ी ताक़त है पिछड़े वर्ग का अपने अधिकारों के लिए दबाव बनाना. तीसरी ताक़त है दलितों का अपने अधिकारों और सत्ता में भागीदारी के लिए सक्रिय होना.

चौथा प्रभाव है मुसलमानों का पारंपरिक नेतृत्व के साथ असंतुष्ट होना, महिलाओं के अधिकार और समुदाय के सदस्यों को शिक्षित करने और रोज़गार दिलाने का प्रश्न. इसके साथ ही यह समुदाय इस अहम सवाल का सामना कर रहा है कि ‘हम (मुसलमान) कहाँ जा रहे हैं?’

अन्य मुख्य पहलू हैं भारतीय राजनीतिक का क्षेत्रीयकरण और भारत के तथाकथित मध्य वर्ग का आगे बढ़ना– तथाकथित इसलिए क्योंकि ये मध्य वर्ग देश का लगभग 15-20 प्रतिशत उच्च और प्रभावशाली वर्ग है.

इन प्रभावों का मिश्रण और एक-दूसरे पर हावी होना वह पेचीदा तस्वीर पैदा करता है जिससे वर्तमान और भविष्य के भारत की रचना होगी.

सोनिया गांधी और मायावती
क्षेत्रीय राजनीतिक दल आगे बढ़े हैं और राष्ट्रीय दलों को हाथ मिलाने के लिए मजबूर किया है

मज़बूत जड़ें क्यों

भारत में लोकतंत्र की जड़ें पड़ोसी देशों के मुक़ाबले में मज़बूत क्यों हैं?

इसका कोई एक मुख्य कारण नहीं है, इसके कई कारण हैं. आज़ादी के बाद के 20-25 साल में राष्ट्रीय राजनीति पर कांग्रेस का प्रभुत्व रहा. कई मायने में कांग्रेस आज़ादी से पहले ही इस ‘रोल’ के लिए तैयार थी और प्रशासकीय भूमिका निभा रही थी.

ये चाहे सतही तौर पर उस समय की भारतीय राजनीति का अलोकतांत्रिक पहलू प्रतीत हो, लेकिन उस समय कांग्रेस में कई धड़े थे जो अलग-अलग विचारधाराओं का प्रतिनिधित्व करते थे.

जब कांग्रेस का प्रभुत्व ख़त्म हुआ तो पहले ये राज्यों में हुआ. वहाँ आपस में मुक़ाबला करती काफ़ी हद तक स्थिर, दो-पार्टी या तीन-पार्टियों की व्यवस्था कायम हुई. इसके बाद ही राष्ट्रीय स्तर पर कई पार्टियाँ सामने आईं.

राष्ट्रीय स्तर पर दो ऐसी घटनाएँ हुईं जिन्होंने भारत की एकता को बल दिया- भाषा के आधार पर राज्यों का पुनर्गठन और राष्ट्रीय चुनावों को प्रांतीय चुनावों से अलग करना.

भाषा के आधार पर राज्यों के बनने से शायद उर्दू को छोड़कर बाक़ी सभी भाषाओं का विकास हुआ और राज्यों में लोगों की पहचान मज़बूत हुई.

अगर भाषा के आधार पर राज्य न बनते तो काफ़ी मुश्किलें हो सकती थीं.

इसके अलावा, राष्ट्रीय चुनावों को राज्यों के चुनावों से अलग कर दिए जाने से क्षेत्रीय पार्टियों को बल मिला और राज्यों के लोगों को अपने मुद्दे उठाना और उनकी ओर ध्यान आकर्षित करना आसान हो गया. इससे आज़ाद भारत में लोकतंत्र मज़बूत हुआ.

(बीबीसी संवाददाता अतुल संगर के साथ बातचीत के आधार पर)

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