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लोकतांत्रिक व्यवस्था में बदलता राजनीतिक परिदृश्य | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारतीय संविधान सभा के सदस्यों की सूची और उनमें दर्ज पेशों पर नज़र डालने से बहुत दिलचस्प सूचना मिलती है. सामंत और जमींदार परिवारों के इन पढ़े-लिखे, विलायत पलट वकीलों, लंबे स्वतंत्रता आंदोलन से निकले विनम्र सदस्यों में से ज़्यादातर ने अपना पेशा ‘खेती-बाड़ी’ लिखवाया था. पहली लोकसभा का हाल भी लगभग यही था. इन लोगों ने जो संविधान बनाया उसमें संसदीय लोकतंत्र, दो स्तरीय शासन व्यवस्था, सर्वाधिक मतों से जीत का प्रावधान, धर्मनिरपेक्षता, नीति निर्देशक तत्व और बुनियादी अधिकारों जैसी व्यावहारिक व्यवस्था थी. भागीदारी का स्वरूप बदला इस सभी ने ख़ुद-ब-ख़ुद साठ वर्षों में सारी राजनीति, संसद के चरित्र, नेताओं की सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि और लोकतंत्र के कामकाज संबंधी सारी बातें बदल दी.
आज राजनीति, संसद और सरकार में आम लोगों की भागीदारी का स्वरूप वह नहीं रह गया है जैसा आज़ादी के वक्त था. आज उसी संसद की शायद ही कोई बहस अंग़्रेज़ी में होती है जिसमें अंग्रेज़ी के अलावा कोई ज़ुबान बोली ही नहीं जाती थी. विधानसभाओं का तो हाल ही अलग है. और यह बदलाव किसी की दया या किसी जादू मंतर से नहीं हुआ है. यह लोकतंत्र ने स्वयं किया है. यह आज़ादी की लडा़ई से निकले मूल्यों पर आधारित संवैधानिक प्रावधानों ने कर दिखाया है. यह नेताओं ने अपनी महत्वाकांक्षाओं पर स्वयं अंकुश रखकर और लोगों ने अपनी आकांक्षाएँ पूरी करने के लिए नेताओं पर पकड़ बनाए रखकर किया है. 'वोट के प्रति उत्साह' दुनिया के पुराने लोकतांत्रिक शासनों में जहां लोगों के वोट देने का क्रम कम हो रहा है, हमारे यहां मतदान का प्रतिशत और वोट के प्रति लोगों का उत्साह बढ़ता गया है.
भारत में गाँवों में अनपढ़, कमज़ोर लोगों में, औरतों में, दलितों-आदिवासियों में मतदान के प्रति आकर्षण बढ़ा है. संसद में, विधानसभाओं में उनके प्रतिनिधियों का प्रतिशत बढ़ता गया है. इस बीच आपातकाल, धर्मनिरपेक्षता, समान नागरिक संहिता, धारा 370 जैसे मसले भी उछलते रहे हैं. इन मुद्दों पर कोई चुनाव भी जीतता रहा तो उसकी भारतीय समाज और संविधान के बुनियादी सवालों से खेलने की हिम्मत नहीं हुई. भाजपा भी 'धर्मनिरपेक्षता' की वकील बनी, सत्ता के लिए. उसने अपने चुनाव घोषणापत्र की तीनों पहली चीज़ें छोड़ दीं. बदलावों की इस श्रृंखला को मंडल के मंत्र, बाबा साहेब की शिक्षा, धर्मनिरपेक्षता की बुनियाद, समानता की लोकतांत्रिक व्यवस्था और संवैधानिक गारंटी ने गति दी. वरना भैंस चराने वाले परिवार से आए लालू यादव, कुश्ती के आखाड़े में पहलवानी करने वाले मुलायम सिंह, स्कूल मास्टरी में आरक्षण के सहारे पहुंचने वाली मायावती, ईंट-पत्थर तोड़ने की मज़दूरी करने वाली भगवतिया देवी, नाई की जाति से आने वाले कर्पूरी ठाकुर, एकदम कम गिनती वाली पिछड़ी जाति से आने वाले वीरप्पा मोइली, देवराज अर्स, रामनरेश यादव, शिबू सोरेन जैसे मंत्री, मुख्यमंत्री, सांसद और विधायक का पद कहां मिलने वाला था. बदलाव की इस धारणा को राममनोहर लोहिया, जयप्रकाश नारायण, बाबा साहब अंबेडकर, कांशीराम, विनोबा भावे, मेधा पाटकर, किशन पटनायक जैसे लोगों ने अपने बलिदान और संघर्षों से मज़बूती दी. बदली राजनीति ने समाज को भी बदला है. आज पिछड़ों का विकास, पर्यावरण की रक्षा, विकास की राजनीति का सवाल, आदिवासियों का मुद्दा, उनके जल-जंगल-ज़मीन का सवाल, पिछड़े मुसलमानों का मुद्दा, महिला स्वास्थ्य और महिला अस्तित्व के सवाल, भाषा का प्रश्न, सत्ता विमर्श की पूरी की पूरी भाषा बदल गई है. मीडिया की ताक़त और न्यायपालिका की मज़बूती के चलते लोकतांत्रिक मूल्यों की कौन उपेक्षा कर सकता है. आज हर आदिवासी इलाक़ा आँदोलित है. मुसलमानों में भी औरतों के मसले सबसे आगे हैं. 'सब कुछ अच्छा ही नहीं' लेकिन सब कुछ अच्छा ही अच्छा हुआ है और कुछ और होने की ज़रूरत न बची हो ऐसा भी नहीं है. लोकतंत्र की ताकत से ही निकले नए नेताओं में लोकतंत्र के प्रति, लोकतांत्रिक आचरण के प्रति, उन सामंतों-ज़मींदार कांग्रेसियों से कम श्रद्धा है. कोई भी दो कमज़ोर समाज साथ मिलकर चलने को तैयार नहीं हैं. कोई भी दो आँदोलन अपनी ताकत और मुद्दों को साझा करने को तैयार नहीं है. महिला आरक्षण के सबसे बड़े विरोधी वही हैं जो पिछड़ों के आरक्षण के प्रावधान से आगे आए हैं. दलित आँदोलन और महिलावादी आँदोलन में कहीं कोई मेल बैठता नहीं दिखता. पर तय मानिए कि अगर लोकतंत्र रहा और समाज की कमज़ोर जमातों में उसके प्रति ऐसी ही आस्था और सक्रियता रही तो जल्दी ही ये गड़बड़ियाँ दूर होंगी. आख़िर मुल्कों के इतिहास में 60 वर्ष की अवधि होती ही कितनी है? |
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