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गुरुवार, 10 अगस्त, 2006 को 11:45 GMT तक के समाचार
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हिंदी सिनेमा: सामाजिक प्रतिबद्धता से बाज़ार प्रेम तक

मदर इंडिया
'मदर इंडिया' की विषय-वस्तु की व्यापक सराहना हुई थी
आज़ादी से अब तक के हिंदी सिनेमा को देखें तो यह कहना एक तरह से ठीक लगता है कि सिनेमा समाज का आईना है.

गाँधी की दुनिया से लेकर 'ग्लोबल' दुनिया तक जो कुछ बदला है लगभग उसी तरह के परिवर्तन सिनेमा में भी दिखाई पड़ते हैं.

समाजिक उद्देश्यों वाली 'दो आँखें बारह हाथ' और 'सुजाता' जैसी फ़िल्मों से लेकर 'ज़ंजीर' के आक्रोश तक और फिर 'रुपया सिनेमा' पर भारी 'डॉलर सिनेमा' तक सब कुछ भारतीय समाज के बदलते प्रतिमानों को दिखाता रहा है.

हालाँकि यथार्थ की जगह सिकुड़ी है, दर्शकों की सहिष्णुता कम हुई है लेकिन 'रंग दे बसंती' जैसे अपवाद भी कम नहीं हैं.

राष्ट्रवाद और सामाजिक उद्देश्य

आज़ादी के पहले भारतीय सिनेमा में राष्ट्रवाद और सामाजिक उद्देश्यों के स्वर बहुत मुखर थे और विदेशी हुक्मरानों के सेंसर की आंखों में धूल डाली जाती थी.

इतिहास आधारित विषयों में और धार्मिक आख्यानों की फ़िल्मों में भी संदेश होते थे.

आज़ादी के तत्काल बाद भी सामाजिक संदेश देने वाली फ़िल्में बनती रहीं और उनका असर भी व्यापक था.

शांताराम की 'दहेज' के प्रदर्शन के बाद कुछ प्रांतों में दहेज विरोधी क़ानून बनाए गए. बिमल राय की 'दो बीघा ज़मीन' को देश-विदेश में सराहा गया.

 ''मैं जन्म से अपराधी नहीं हूं. मेरी बस्ती से गुज़रता है एक गंदा नाला जहां अपराध के कीड़ों ने मुझे काटा है. मेरी फ़िक्र छोड़िए बच्चों को बचा लीजिए
'आवारा' का एक संवाद

नेहरू की प्रेरणा और पहल से आयोजित अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म महोत्सव के कारण 1951 में हमारे फ़िल्मकारों को यूरोप के नव-यथार्थवादी सिनेमा ने बहुत प्रभावित किया. परिणामस्वरूप ज़िया सरहदी की 'हम लोग', 'फुटपाथ' और राजकूपर की 'बूटपॉलिश' तथा केयू अब्बास की गीतविहीन 'मुन्ना' बनीं.

एक समाज का पूर्वानुमान

आज़ादी के उमंग भरे दिनों में कुछ फ़िल्मकारों ने भविष्य के व्यापक भ्रष्टाचार और सामाजिक अन्याय का पूर्व अनुमान कर लिया था.

वर्ष 1951 में प्रदर्शित 'आवारा' में नायक कहता है,''मैं जन्म से अपराधी नहीं हूँ. मेरी बस्ती से गुज़रता है एक गंदा नाला जहां अपराध के कीड़ों ने मुझे काटा है. मेरी फ़िक्र छोड़िए बच्चों को बचा लीजिए.''

1965 में प्रदर्शित 'मदर इंडिया' भारतीय ग्रामीण व्यथा का महाकाव्य है और ऐसा लगता है मानो मुंशी प्रेमचंद ने इसे लिखा है और महात्मा गाँधी ने निर्देशित किया है. गुरुदत की 'प्यासा' सांस्कृतिक पतन की कहानी है.

'जागते रहो' की बहुमंजिला इमारत भारत ही है. बिमल राय की 'सुजाता' हरिजन नायिका और कुलीन नायक की प्रेमकथा है.

यह बात ग़ौरतलब है कि चौथे दशक में 'अछूत कन्या' बनाई गई और छठे दशक में 'सुजाता' परंतु आप आज उस तरह से हरिजन-ब्राह्मण या मुस्लिम-हिंदू प्रेम कथा नहीं बना सकते क्योंकि समाज अब अत्यंत असहिष्णु हो चुका है.

1947 के विभाजन से ज़्यादा ख़तरनाक और भयावह विभाजन समाज में हो चुके हैं और इन पर बनी फ़िल्म को लोग देखना नहीं चाहते और विध्वंसक हुड़दंगी शक्तियाँ दिखाने भी नहीं देंगी.

गाँधी के कालखंड की समाप्ति

चीन के आक्रमण और नेहरू के निधन के बाद भारतीय समाज और सिनेमा में परिवर्तन आए.

महात्मा गाँधी
फ़िल्मी दुनिया पर भी बहुत समय तक महात्मा गाँधी का प्रभाव दिखता रहा

सपनों की दुनिया से निकलकर यथार्थ में आने के प्रतीक स्वरूप आप चेतन आनंद की 'हक़ीकत' और बिमल राय की 'बंदिनी' को मान सकते हैं.

लेकिन ये यथार्थवादी फ़िल्में प्रतीक मात्र हैं. इनमें कोई परंपरा नहीं पनपी और शम्मी कपूर अभिनीत 'जंगली' से रंगीन युग प्रारंभ हुआ जिसमें राजकपूर जैसे जागरूक फ़िल्मकार भी राधा और रंग में डूबकर 'संगम' बनाने लगे.

भारतीय सिनेमा के हर दौर में सभी प्रकार की फ़िल्में बनती रही हैं और रंग,राधा के दौर में भी 'तीसरी क़सम', 'भुवनशोम', 'चेतना' इत्यादि बनीं परंतु आज़ादी के बाद वाले दशक की धार बाद में किसी दशक में देखने को नहीं मिली.

दरअसल स्वतंत्रता संग्राम के समय महात्मा गाँधी के प्रभाव में बनने वाली फ़िल्मों का अंतिम दौर ही वह था जिसे हम आज़ादी के बाद का पहला दौर समझ रहे हैं.

भ्रष्ट और अनैतिक भारतीय समाज के सिनेमा में गाँधी का कालखंड स्वप्न दृश्य की तरह है.

आक्रोश के दिन

वर्ष 1951 फ़िल्मों की दृष्टि से एक महत्वपूर्ण वर्ष था.

इसी साल अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म समारोह हुआ, पाटिल समिति की जाँच और 'आवारा' फ़िल्म से विदेशों में हिंदी फ़िल्मों का बाज़ार खुला.

ज़जीर में अमिताभ बच्चन
अमिताभ ने एंटी हीरो छवि को स्थापित कर दिया

ठीक इसी तरह 1973 में अमिताभ अभिनीत 'ज़ंजीर' और राजकपूर की किशोरवय प्रेमकथा 'बॉबी' का प्रदर्शन.

जब अमिताभ चंद महीनों के रहे होंगे तब शशिधर मुखर्जी की एंटी हीरो 'क़िस्मत' का सफल प्रदर्शन हुआ था और उसी छवि की अन्यतम अभिव्यक्ति अमिताभ अभिनीत फ़िल्मों में हुई.

राधा और रंग के युग ने भारतीय सिनेमा को विशुद्ध पलायनवादी बना दिया था और व्यापक अनाचार के ख़िलाफ़ अमिताभ आक्रोश के सितारे बन गए.

इसी काल खंड में गॉसिप की रंगीन पत्रिकाओं का सफल प्रकाशन प्रारंभ हुआ और सितारों के बारे में सच्ची-झूठी घटनाओं के प्रकाशन ने एक विनाशकारी धुंध को जन्म दिया.

फ़िल्म पर गंभीर विचार और समालोचना का अंत भी हो गया. आक्रोश के इस सिनेमा ने दर्शक दीर्घा में समाजवाद स्थापित कर दिया.

नीचे के दर्शक बालकनी में पहुंच गए और बालकनी के दर्शक घर बैठ गए जिसके कारण समानांतर और मध्यमवर्गीय सिनेमा समाप्त हो गया.

बाज़ार का ज़माना

आर्थिक उदारवाद और भौगोलीकरण ने बाज़ार और विज्ञापन की शक्तियों का स्वर्णकाल रचा और 'शोले' के समय जन्मी पीढ़ी अब प्रमुख दर्शक वर्ग हो गई.

सलाम नमस्ते का एक दृश्य
फ़िल्म निर्माण के समय प्रवासी भारतीय दर्शकों पर भी नज़र रहने लगी है

इस पीढ़ी को कोई आक्रोश नहीं था. उन्होंने भ्रष्टाचार को जीवन शैली के एक प्रतिपादित सत्य के रूप में ग्रहण किया.

उन्हें विशुद्ध मनोरंजन चाहिए क्योंकि उन्हें इतिहासबोध या सौंदर्यबोध या साहित्य बोध से कोई लेना देना नहीं है.

सूरज बड़जात्या की 'हम आपके हैं कौन' ने सामाजिक प्रतिबद्धता वाले सिनेमा को अनावश्यक सिद्ध कर दिया.

उस दौर में बाज़ार ने कुछ रइसों को जन्म दिया था और उन्हें इसी तरह का मनोरंजन पसंद था.

बाज़ार की ताकतें हर कालखंड में महत्वपूर्ण रही हैं परंतु इस दौर में उसने दुकान के साथ ग्राहक को भी जन्म दिया है. इसी दौर में अप्रवासी भारतीय दर्शकों की वजह से डॉलर सिनेमा, रुपया सिनेमा पर भारी पड़ने लगा.

शिफॉन, स्विटज़रलैंड और फ़ीलगुड के इस दौर में भी 'रंग दे बसंती' की सफलता फिर सिद्ध करती है कि भारतीय मनोरंजन परिदृश्य में फूहड़ के साथ ही सार्थक सिनेमा हमेशा ज़िंदा रहेगा.

आधा फ़साना

लाल बहादुर शास्त्री की प्रेरणा से फ़िल्मकार बने मनोज कुमार ने 'शहीद' की सफलता के बाद छद्म देशप्रेम की फ़िल्मों का सिक्का चला दिया था और 'रंग दे बसंती' असली देश प्रेम का सिनेमा है जिसकी जड़ें आपको 'शहीद' (1965) और चेतन आनंद की 'हक़ीकत' में मिलती हैं.

इस बीच जिस तरह राजनीति में क्षेत्रवाद हावी हुआ है उसी तरह से सिनेमा में भी हिंदी सिनेमा की जगह थोड़ी सिकुड़ी है.

रंग दे बसंती का एक दृश्य
रंग दे बसंती ने सार्थक सिनेमा के बचे होने की उम्मीद जगाई

1947 में भारत में कोई 280 फ़िल्में बनी थीं जिसमें से सिर्फ़ 20 प्रतिशत क्षेत्रीय भाषा की फ़िल्में थीं लेकिन इस साल बनने वाली आठ सौ फ़िल्मों में से सिर्फ़ 150 हिंदी फ़िल्में हैं और बोलबाला दक्षिण भारत के चार राज्यों से आने वाली फ़िल्मों का है. जहाँ से 600 से ज़्यादा फ़िल्में बनीं हैं.

भारत एक मात्र देश है जिसमें एक ही कालखंड में अनेक सदियाँ धड़कती मिलती हैं.

इसी तरह हमारे मनोरंजन क्षेत्र में भी सभी प्रकार का सिनेमा हमेशा देखा जाता है.

हमारे सिनेमा में आधी हक़ीकत-आधा फ़साना है और पूरी हक़ीकत या पूरा फसाना सफल नहीं हो पाता.

हमारी अत्यंत फूहड़ और पलायनवादी फ़िल्म में भी एक दृश्य या छोटा सा अंश सामाजिक यथार्थ का होता है और पूरी तरह यथार्थवादी सिनेमा में भी कल्पना के देश होते हैं.

बाबरी मस्जिद ढहाए जाने के समय एक फूहड़ फ़िल्म 'तिरंगा' में संवाद था कि दिल्ली तो हमेशा खामोश रहती है. इस छोटे से दृश्य पर खूब ताली पड़ी थी.

हमारी मनोरंजन की चदरिया में विविध रेशे होते हैं और दर्शक ही इसका असली जुलाहा हैं.

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