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रविवार, 20 नवंबर, 2005 को 09:30 GMT तक के समाचार
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काबुल में लोकप्रिय हिंदी सिनेमा

काबुल में हिंदी फ़िल्म पोस्टर
काबुल में कई सिनेमा घरों में हिंदी फ़िल्में ही चलती रहती हैं
वो काबुल की एक शाम थी जब मैं थक कर चूर हुए जा रहा था और अकेला अपने होटल के लॉन में बैठा सुस्ता रहा था जहाँ अफ़ग़ानी गीत-संगीत चल रहा था.

एकाएक मंच के पास से एक व्यक्ति उठकर आया और कहा कि अगला गाना आपके लिए है....थोड़ा वक़्त लगा लेकिन अचानक थकान ग़ायब हो गई जब रबाब ने दुलार के साथ कहा....घर आया मेरा परदेसी...

हालांकि ये कोई अचंभा नहीं था क्योंकि अफ़ग़ानिस्तान के कोने-कोने में लोग भारतीय फ़िल्मों और फ़िल्मी संगीत के ऐसे दीवाने हैं कि एकबारगी आश्चर्य होता है.

लोग आमतौर पर या तो पश्तो बोलते हैं या फिर दरी. उर्दू या हिंदी उनकी भाषा नहीं लेकिन हर कहीं लोग मिलते हैं जो टूटी फूटी हिंदी बोल लेते हैं और यदि बोल नहीं पाते तो कम से कम समझ तो ज़रुर जाते हैं.....और जो समझ नहीं पाते तो उन्हें हिंदी के गाने फिर भी याद हैं.....

एक बच्चा बरक्ज़ाई मुझे मिला क़ाबुल से दूर एक दूसरे प्रांत में. उससे मैंने पूछा कि क्या वो मेरी भाषा समझ पा रहा है तो एकाएक वो नई सी फ़िल्म का एक गाना गाने लगा.

और ऐसा आज से नहीं हुआ. वो बरसों बरस से हिंदी फ़िल्मों के दीवाने हैं. तभी तो किसी को धर्मेंद्र पसंद है तो किसी को देवानंद....किसी को रेखा पसंद है तो किसी को श्रीदेवी.

 नई फ़िल्में अच्छी नहीं होती क्योंकि उनमें सेक्स ज़्यादा होता है, पुरानी फ़िल्में अच्छी होती थीं
शिरीन ख़ान

लेकिन सबसे ज़्यादा दीवाने हैं 'मालालानी' के....मामालानी यानी हेमामालनी. वैसे 'मुमता' (बीते ज़माने की नायिका मुमताज) को भी लोग याद करते हैं.

नए ज़माने के हीरो में शाहरुख़ ख़ान, सलमान ख़ान और ऋतिक रोशन लोगों को जितने पसंद हैं उतने ही लोग संजय दत्त और अक्षय खन्ना के दीवाने हैं.

पुरानी फ़िल्में

किसी भी बस्ती में अगर कोई वीडियो कैसेट की दूकान दिख जाए तो वहाँ सबसे अधिक कैसेट-सीडी और डीवीडी दिखाई पड़ते हैं हिंदी फ़िल्मों के.

उबैदुल्ला
उबैदुल्ला कहते हैं कि जैसे कपड़े हिंदी फ़िल्मों की हिरोइनें पहनती हैं उससे घर पर फ़िल्में देखना संभव नहीं होता

ज़ाहिर है बड़े बुज़ुर्ग तो हिंदी फ़िल्मों के दीवाने हैं ही युवा वर्ग भी फ़िल्मों का ख़ासा दीवाना है.

लेकिन आश्चर्य होता है जब पच्चीस-छब्बीस साल के ख़ान शिरीन ख़ान कहते हैं कि उन्हें नई फ़िल्में अच्छी नहीं लगतीं कारण पूछा तो उन्होंने कहा, "नई फ़िल्में अच्छी नहीं होती क्योंकि उनमें सेक्स ज़्यादा होता है, पुरानी फ़िल्में अच्छी होती थीं."

और वे अकेले नहीं थे, बीस साल के उबैदुल्ला की भी शिकायत इसी तरह की थी. उन्होंने कहा, "नई फ़िल्मों को परिवार के साथ बैठकर देखना संभव नहीं होता."

लेकिन फिर भी वे हिंदी फ़िल्में देखते हैं और हिंदी फ़िल्मों के गीत गुनगुनाते रहते हैं.

सीरियल भी लोकप्रिय

और बात यहीं ख़त्म नहीं हो जाती.

 हिंदोस्ताँ के सीरियलों में परिवार में सास-बहू के रिश्तों के बारे में जो दिखाया जाता है, उसे देखना अच्छा लगता है
आयशा, नौकरीपेशा युवती

जितनी लोकप्रिय फ़िल्में हैं उतनी ही टेली सीरियल भी हैं.

महिलाओं के बीच क्योंकि सास भी कभी बहू थी सीरियल इतना लोकप्रिय है कि उतना लोकप्रिय शायद भारत में भी नहीं होगा.

उत्सुकता हुई कि कौन कौन से सीरियल देते जाते हैं तो नाम सुनकर चकित सा रह गया. लोगों ने हरे काँच की चूड़ियाँ और कुसुम से लेकर कहानी घर-घर तक ऐसे ढेर सारे सीरियलों के नाम गिनाए जिनमें से कई से मैं ख़ुद भी परिचित नहीं था.

बरक्ज़ाई अपने छोटे भाई के साथ
बच्चों को हिंदी समझ में नहीं आती लेकिन वे हिंदी गाने ख़ूब गाते हैं

रेडीमेड कपड़ों की एक दुकान में काम करने वाली आयशा ने कहा, "हिंदोस्ताँ के सीरियलों में परिवार में सास-बहू के रिश्तों के बारे में जो दिखाया जाता है, उसे देखना अच्छा लगता है."

यह पूछने पर कि क्या अफ़ग़ानिस्तान में भी सास-बहू के रिश्ते ऐसे ही होते हैं, आयशा ने तपाक से कहा, "कहाँ नहीं होते?"

मैं देर तक सोचता रहा कि भारत से दूर एक और भारत किस तरह लोगों के दिलों में बसा हुआ है और दो दूर देशों की संस्कृति को एक तार में पिरोए हुए है.

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