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बुधवार, 02 नवंबर, 2005 को 12:37 GMT तक के समाचार
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'हिंदी फ़िल्म उद्योग में सूखा पड़ गया है'

एमएस सथ्यू
सथ्यू की फ़िल्म 'गर्म हवा' को विभाजन पर बनी बेहतरीन फ़िल्म माना जाता है
आजकल के बुद्धिजीवी चाहे वे हिंदी नाटक, रेडियो या साहित्य से जुड़े हों, ऐतिहासिक घटनाओं और वर्तमान समस्याओं पर चर्चा नहीं करते.

यह हिंदी सिनेमा की कमज़ोरी है. वे मनगढ़ंत कहानियों पर आधारित होती है पर ऐसा क्षेत्रीय सिनेमा ख़ासकर मलयालम भाषा में नहीं नज़र आता.

गोवा फ़िल्म समारोह में जो 20 भारतीय फ़िल्में दिखाई जाएँगी उनमें से सात मलयालम भाषा में हैं.

मलयालम फ़िल्मकार सोचता है और हर समस्या और विषय पर वो फ़िल्म बनाता है. उसके लिए कहानी का बहुत महत्व है. गुजरात में आए भूकंप पर भी मलयालम में फ़िल्में बनी है.

इससे उलट हिंदी सिनेमा में हीरो और हीरोइन कुछ काम नहीं करते. सारा दिन या तो पेड़ों के पीछे धूम रहे होते हैं नहीं तो गाना गाते रहते हैं. हमने ‘पेनोरामा सेक्शन’ में मुश्किल से दो हिंदी फ़िल्में चुनीं.

अमोल पालेकर की फ़िल्म ‘पहेली’ को चयन समीति का अधिक समर्थन नहीं मिला लेकिन किसी और फ़िल्म के न होने पर हमें ‘पहेली’ को चुनना पड़ा. मानो हिंदी फ़िल्म उद्योग में सूखा पड़ा हो.

 इस साल हम प्रेमचंद की 125 वीं वर्षगांठ मना रहे हैं, फ़िल्म उद्योग को उनकी कहानियों पर कुछ फ़िल्में तो बनानी चाहिए थी

यह सोचने की बात है कि हिंदी भाषा में बहुत अच्छी कहानियाँ और कहानीकार है. इस साल हम प्रेमचंद की 125 वीं वर्षगांठ मना रहे हैं. फ़िल्म उद्योग को उनकी कहानियों पर कुछ फ़िल्में तो बनानी चाहिए थी.

मंटो, इस्मत चुगतई, कुर्रतुल एन हैदर और राजेंद्र सिंह बेदी तो इतनी मज़ेदार कहानियाँ लिखते थे लेकिन इन कहानियों को कोई फ़िल्मकार नहीं चुनता.

आजकल ट्रेंड कुछ ओर है. बस शादी दिखा दो और खूब नाच-गाना, डिजाइनर कपड़े पहनाकर.

फ़िल्मकार खर्चा तो ख़ूब करते हैं मगर ऐसी फ़िल्मों में दम नहीं होता.

विश्व सिनेमा में ईरान बहुत अच्छी फ़िल्में बना रहा है. गुमनाम लोग गुमनाम अभिनेताओं के साथ साधारण कहानी पर फ़िल्म बना रहे हैं लेकिन उन फ़िल्मों को देखकर आप भूल नहीं सकते.

इसी तरह दक्षिण अमरीका और अफ्रीका में भी कई अच्छी फ़िल्में बन रही है.

हमारे यहाँ फ़िल्मों को उद्योग का दर्ज़ा ज़रूर मिला है लेकिन बैंक और निजी क्षेत्र केवल उन्हीं फ़िल्मों में पैसा लगा रहे हैं जिनसे उन्हें पता है कि खूब मुनाफ़ा होगा.

एमएस सथ्यू
सथ्यू ईरानी फ़िल्मों के विषय चयन से काफ़ी प्रभावित हैं

जो फ़िल्मों में निवेश करता है वो तो मुनाफा भी चाहता है. ऐसी फ़िल्मों में शाहरूख खान और रानी मुखर्जी के साथ एआर रहमान के संगीत की मांग होती है.

वो असमिया या किसी और भाषा की फ़िल्म में पैसा नहीं डालते.

अच्छे फ़िल्मकार के लिए फ़िल्म बनाना एक मिशन होता है. वो कहीं से भी पैसे लेकर, उधार लेकर अपनी कहानी लोगों तक पहुँचाता है.

उद्योग का दर्जा केवल यहाँ तक सीमित है जबकि उद्योग बनाए जाने पर फ़िल्म यूनिट के हर कर्मचारी को सुविधाएं मिलनी चाहिए. उस कर्मचारी का वेतन, स्वास्थ्य सुविधाओं का भी तो ध्यान रखा जाना चाहिए.

दुख की बात है कि अधिकतर फ़िल्म निर्माता केवल फ़िल्म बनाने के लिए कम ब्याज पर पैसा दिए जाने तक ही अपने को सीमित रखना चाहते हैं.

(सुनील रामन से बातचीत पर आधारित)

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