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'महिलाओं को गंजे भी पसंद' | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
मशहूर पटकथा लेखक, कलाकार और फ़िल्म निर्देशक सौरभ शुक्ला का मानना है कि महिलाएँ गंजे आदमी को भी पसंद करती हैं. अपनी 20 वर्ष की उम्र में बाल गवाँ चुके सौरभ की एक नई फ़िल्म ऐसे ही एक किरदार पर आधारित है. उनकी यह फ़िल्म, 'हार्ट गोज़ शा...ला..ला..' पिछले दिनों एशियाई फ़िल्म समारोह में प्रदर्शित की गई तो लोगों ने इसे बहुत सराहा. सौरभ इस बारे में बताते हैं कि यह कहानी उनकी अपनी ज़िंदगी का हिस्सा है. इन्हें तहकीक़ात धारावाहिक का गोपी कहा जाता है या फिर सत्या का कल्लू मामा, सौरभ की झोली में बैंडिट क्वीन, सत्या और रघु-रोमियो जैसे भी तमाम नाम हैं. उनकी नई फ़िल्म और फ़िल्मी दुनिया के बारे में हुई बातचीत के अंश: सौरभ, अभी आपकी नई फ़िल्म, 'हार्ट गोज़ शा..ला..ला' एशियाई फ़िल्म समारोह में दिखाई गई है. क्या ख़ास है इस फ़िल्म में ? हर लेखक को कहानी का आइडिया अपने आसपास से ही मिलता है. चाहे वो उसने किसी से सुना हो या फिर उसका ख़ुद का अनुभव हो. इस फ़िल्म में मैंने कहानी अपने निजी जीवन से उठाई है. दोस्तों के साथ भी उसे होते हुए देखा. मैं जब बीस साल का था तभी मेरे बाल उड़ गए थे. जवानी के दिनों में जो एक सोच होती है कि अगर सिर पर बाल नहीं हैं तो गर्लफ़्रैड नहीं होगी, कोई लड़की पसंद नहीं करेगी, वो एक तरह का 'काम्पलैक्स' (हीन भावना) होता है जिसकी तमाम मधुर स्मृतियाँ होती हैं. बाद में मैंने पाया कि महिलाएँ गंजे आदमी को भी पसंद करती हैं. ऐसे ही एक चरित्र को मैंने अपनी इस फ़िल्म का नायक बनाया है. फ़िल्म इसी कथानक पर आधारित है कि कैसे एक गंजा मगर सीधा-सादा आदमी एक वास्तविक हीरो के रूप में उभरता है. आपने कहा कि चैट-मित्रों पर आधारित यह कहानी आपकी अपनी जिंदगी से जुड़ी कहानी है. आप अपनी जवानी के दिनों में प्रेमपत्र कागज़-कलम से लिखते रहे होंगे पर फ़िल्म में तो चरित्र इंटरनेट पर चैट कर रहे हैं और मित्र बनते हैं. कैसे देखते हैं इस फ़र्क को. देखिए, जब मैंने ख़ुद किया था तो पेन से ही कागज़ पर लिखता था. लेकिन अब मैं कंप्यूटर पर लिखता हूँ क्योंकि आज के दौर में मुझे यह माध्यम ज़्यादा सही लगा और दूसरे यह भी कहा जाता है कि आपने इसे कंप्यूटर पर ही क्यों इस्तेमाल किया तो ऐसे में यह ध्यान रखना होगा कि सिनेमा जो माध्यम है, वो दृश्यों पर आधारित है. फ़िल्म का चरित्र अपने इंटरनेट के कैमरे से अपनी मित्र को देख रहा है पर ख़ुद को नहीं दिखा रहा है, यह फ़िल्म में एक नया रंग भरता है. यह आपकी तीसरी फ़िल्म है जिसका निर्देशन आप कर रहे हैं. और भी कई पटकथा लेखकों और रंगकर्मियों ने पिछले दिनों कुछ फ़िल्मों की निर्देशन किया है. किस तरह से देख रहे हैं आज के निर्देशकों और उनके काम को ? देखिए, मेरे तमाम दोस्तों ने काफ़ी काम किया है. मैंने उनके काम की पड़ताल तो नहीं की है. हाँ, अपने काम में मैं जो फ़र्क महसूस करता हूँ, वो यह है कि जैसे जैसे दिन बीतते गए, मेरा रुझान जटिलता से सादगी की ओर हो गया है. मैं कभी इस बात को नहीं भूलता हूँ कि कठिन हमेशा कठिन नहीं होता और सरल तो कभी भी सरल नहीं होता है. इसी वजह से मैं अधिकाधिक सादगी वाला काम करना चाहता हूँ. ऐसा लगता है कि छोटे पर्दे पर तहकीक़ात धारावाहिक के गोपी और बड़े पर्दे पर सत्या के कल्लू मामा की आपकी छवि ही आज भी लोगों के ज़हन में सबसे ज़्यादा है. दर्शकों के बीच कब नई प्रभावी भूमिकाओं में सामने आएंगे ? देखिए, जहाँ तक समाज में छवि की बात है. वो आर्टिस्ट से ज़्यादा उसके काम की छवि पर निर्भर करता है. कल्लू मामा से पहले लोग मुझे गोपी कहा करते थे पर मुझे इससे कोई तकलीफ़ नहीं हुई. उसके बाद सत्या एक ज़बरदस्त हिट फ़िल्म थी इसलिए लोग मुझे कल्लू मामा के नाम से बुलाने लगे. ऐसा नहीं है कि इसके अलावा मैंने काम नहीं किया. बहुत सारी फ़िल्में हैं और मैंने उसमें इन चरित्रों से अपने को दूर रखा है. पर होता यह है कि जब एक प्रोजेक्ट काफ़ी बड़ा हो जाता है तो उसका असर भी उतना लंबा हो जाता है. इसपर न तो कलाकार का नियंत्रण होता है और न ही उसे करने की कोशिश करनी चाहिए. उसे तो बस अपना काम करते रहना चाहिए. क्या ऐसा नहीं लगता कि ऐसी चीज़ों के लिए विषयों का चयन और उनके दर्शकवर्ग का चयन भी ज़िम्मेदार है. आपकी बैंडिट क्वीन और रघु-रोमियो जैसी फ़िल्में स्तरीय होते हुए भी उतने दर्शक नहीं बटोर पातीं, जितनी सत्या जैसी फ़िल्में जुटा लेती हैं. मैं आपकी बात से सहमत हूँ और इसे महत्वपूर्ण मानता हूँ पर विषयों का जो चयन है, उसे संख्या से नहीं, संवेदनशीलता के स्तर से देखना चाहिए. मैं आज चाह कर भी यह चयन नहीं कर सकता कि अगर हरी पैंट और लाल कमीज़ लोगों की पसंद है तो वही मेरी भी हो. मैं अपने चयन को अपनी पसंद पर आधारित रखता हूँ फिर चाहे मैं पसंद के मामले में अल्पसंख्यक ही रहूँ. तो आगे फ़िल्में अपनी सोच और पसंद को ध्यान में रखकर बनाएँगे या फिर लोगों और व्यावसायिकता को ध्यान में रखकर बनाएंगे ? क्या आपको नहीं लगता कि यह लोगों की फ़िल्म हैं. लोग कहते हैं कि मैं बुद्धिजीवियों की तरह फ़िल्म देखता हूँ पर यह ग़लत है. मैं वैसे ही देखता हूँ जैसी की एक आम आदमी देखता है. देखिए मेरा चयन तो इसी बात पर रहेगा कि मैं क्या पसंद करता हूँ पर इतना मुझे मालूम है कि मेरी पसंद लोगों की भी पसंद है और अगर मैं अच्छा करूँगा तो लोग उसे पसंद करेंगे. आपकी अगले साल आने वाली फ़िल्म 'होम डिलिवरी' कैसी फ़िल्म है ? बहुत ही अच्छी फ़िल्म है. मैं बहुत ख़ुश हूँ और अभी ज़ल्दी ही शूटिंग पूरी हुई है. इसलिए नहीं कि मैं इस फ़िल्म में काम कर रहा हूँ बल्कि श्रुजय का काम बहुत अच्छा है. लोग कहते हैं कि टेलेंट की कमी है पर आप मुँबई आकर देखिए कि कितनी प्रतिभाएँ, युवा निर्देशक, पटकथा लेखक अब भी हैं जो काम कर रहे हैं. तमाम लोग अपने अपने स्तर पर संघर्ष कर रहे हैं एक ऊँचाई पाने की पर वो बहुत अच्छा काम कर रहे हैं. एक सौरभ शुक्ला दिल्ली में भी होते थे जो रंगकर्म में रुचि रखते थे. फिर वो मुँबई गए और फ़िल्म जगत के हो गए. क्या फ़र्क है दोनों स्थितियों में और रंगकर्म बनाम फ़िल्म जगत को कैसे देखते हैं ? दोनों जगहों के रंगमंच में ख़ासा फ़र्क है क्योंकि दोनों जगहों की अर्थव्यवस्था में भी काफ़ी फ़र्क है. दिल्ली में मेरे माता-पिता का घर है और सिर पर छत हो तो परेशानियाँ कम ही होती हैं पर मुंबई में जब मैं गया तो मेरे पास कुछ नहीं था. अपनी एक जगह बनानी थी इसलिए वहाँ एक संघर्ष का दौर शुरू हुआ. वहाँ जाकर मैंने रंगमंच काफ़ी कम किया इसलिए नहीं कि मैं करना नहीं चाहता था, वजह यह थी कि मेरा मानना है कि दिन के 24 घंटों में आप एक ही काम कर सकते थे. अगर मुझे थिएटर ही करना होता तो मैं दिल्ली छोड़कर क्यों जाता. मैं एक ही समय में दोनों के प्रति प्रतिबद्ध नहीं रह सकता था. मैं खिचड़ी नहीं बना सकता. हाँ, मैं रंगकर्म करूँगा. दिल्ली आकर करूँगा पर आर्थिक रूप से कुछ मज़बूत होने के बाद. |
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