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शुक्रवार, 25 फ़रवरी, 2005 को 13:51 GMT तक के समाचार
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'सबसे अच्छी धुन तो अभी बनेगी'
नौशाद
नौशाद का संगीत आज भी लोकप्रिय है
नौशाद उन संगीतकारों की कड़ी के शायद आख़िरी स्तंभ है जिनकी धुनें हमेशा मौलिक रहीं. उन पर कभी किसी की नक़ल करने का ठप्पा नहीं लगा.

बीबीसी हिंदी डॉट कॉम की संपादक सलमा ज़ैदी ने अपनी हाल की मुंबई यात्रा के दौरान कई फ़िल्मी हस्तियों से बातचीत की. नौशाद ने अपनी अस्वस्थता के बावजूद बीबीसी से यह बातचीत की है. प्रस्तुत हैं इसके कुछ अंश...

नौशाद साहब, मुग़ले आज़म का संगीत एक बार फिर डॉल्बी में डब हो कर लोगों तक पहुँचा है और आप एक बार फिर चर्चा में हैं.

मैं ख़ुश हूँ कि मेरी मेहनत रंग लाई. पूरा एक साल लगा है यह काम अंजाम देने में. अन्य कई लोगों के साथ इसमें मेरी मेहनत भी शामिल है.

संगीत को दोबारा आधुनिक तकनीक के सहारे डब करना और दूसरी ओर उसी संगीत को रीमिक्स के ज़रिए दोबारा परोसना, इसके बारे में आप क्या कहेंगे?

 पहले तो निर्माता-निर्देशक को यह अनुमति भी नहीं होती थी कि वे धुनें सुन कर अपनी राय दें. हम तो यह कह देते थे कि अगर तुम्हें संगीत की इतनी जानकारी है तो तुम ख़ुद ही संगीत दे दो.
नौशाद

अगर किसी पुरानी फ़िल्म को दोबारा से रिलीज़ किया जाता है तो ठीक है लेकिन सिर्फ़ संगीत को डब करना मैं उचित नहीं समझता हूँ. रीमिक्स के खिलाफ़ मैं काफ़ी अरसे से आवाज़ उठाता आ रहा हूँ. इसे किसी तरह बर्दाश्त नहीं किया जा सकता है. हम लोग एक सोसायटी के माध्यम से इसका विरोध करते आ रहे हैं. हम इस बारे में कई मंत्रियों से भी मिल चुके हैं.

जो लोग रीमिक्स की हिमायत करते हैं उनका तर्क है कि अगर आज की पीढ़ी 'मेरे पिया गए रंगून..' या 'सैंया दिल में आना रे...' जैसे गीत गुनगुना रहे हैं तो यह रीमिक्स की वजह से ही संभव हो पाया है वरना युवा वर्ग तो इन गानों से वाक़िफ़ ही न होता.

ठीक है, यह बात मैं मानता हूँ. लेकिन वीडियो में जिस तरह नंगी लड़कियों का नाच कराया जाता है वह क्या है? अगर गाने दोबारा रिलीज़ किए जाएँ और असली गीतकार और संगीतकार का नाम दिया जाए तो शायद हमें एतराज़ न हो. अगर क़ायदे से रॉयल्टी दी जाए तो शायद हमारी सोसायटी को वह मंज़ूर हो. लेकिन इस तरह के वीडियो तो क़तई बर्दाश्त नहीं किए जा सकते. इन्हें आप परिवार के साथ बैठ कर देख सकते हैं क्या?

पहले और अब के संगीत में क्या फ़र्क़ देखते हैं आप?

नौशाद
अस्वस्थता के बावजूद बीबीसी से बात की नौशाद ने

पहले का ज़माना और था. हमें सिर्फ़ सिचुएशन बता दी जाती थी और हम धुन बनाते थे. आज की तरह नहीं कि धुन अच्छी बनी है उसे कहीं भी फ़िट करदो. पहले तो निर्माता-निर्देशक को यह अनुमति भी नहीं होती थी कि वे धुनें सुन कर अपनी राय दें. हम तो यह कह देते थे कि अगर तुम्हें संगीत की इतनी जानकारी है तो तुम ख़ुद ही संगीत दे दो.

आप ने हज़ारों गीतों को संगीत में ढाला है. आपकी पसंदीदा धुनें कौन सी हैं?

मेरी बेहतरीन धुन तो अभी तक वुजूद में ही नहीं आई. वो धुनें तो अभी बननी हैं. मेरी सेहत ठीक होने दीजिए उसके बाद देखिए मैं क्या कर दिखाता हूँ.

नौशाद साहब, आप ने शेर भी लिखे हैं और जहाँ तक मेरी जानकारी है आपने कुछ मुशायरों में भी हिस्सा लिया है. बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के पाठकों को कुछ सुनाना चाहेंगे?

जी, एक क़तअ पेश है:
'तूफ़ाने जुनूँ हमने उतरते देखा,
एक ज़ख़्म पुराना सा उभरते देखा,
ऐ वहशते दिल वो भी अजब मंज़र था,
जब अक्स को आईने से डरते देखा'

और एक शेर और अर्ज़ है
'सब कुछ सरे बाज़ारे जहाँ छोड़ गया है
ये कौन खुली अपनी दुकाँ छोड़ गया है'.

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