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गुरुवार, 17 फ़रवरी, 2005 को 14:21 GMT तक के समाचार
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'हिंदी को काजभाषा भी बनाएँ'
आशुतोष राणा
आशुतोष राणा ने कभी इमेज की परवाह नहीं की
आशुतोष राणा उन अभिनेताओं में से एक हैं जिन्होंने कभी इमेज की परवाह नहीं की. उनकी आने वाली फ़िल्म 'शबनम मौसी' इसी की एक मिसाल है जिसमें वह मध्यप्रदेश की पहली हिजड़ा विधायक शबनम मौसी की भूमिका निभा रहे हैं.

बीबीसी हिंदी डॉट कॉम की संपादक सलमा ज़ैदी ने अपनी हाल की मुंबई यात्रा के दौरान कई फ़िल्मी हस्तियों से बातचीत की. प्रस्तुत है इसी कड़ी में आशुतोष राणा से की गई बातचीत के कुछ अंश...

आशुतोष जी, अपने कैरियर के इस मुक़ाम पर इस तरह के रोल का साहस कैसे जुटाया आपने?

देखिए, जो सफलता चाहता है उसे विफलता के लिए भी मानसिक रूप से तैयार रहना चाहिए. इसके अलावा सफलता चाहिए तो चुनौती भी स्वीकार कीजिए. मैं इमेज के बंधन में कभी नहीं बंधा. कलाकार को एक दायरे के भीतर बंधना भी नहीं चाहिए. अभी हाल ही में मैंने 'अब तुम्हारे हवाले वतन साथियो' में भी एक अलग तरह की भूमिका निभाई थी और मेरी आने वाली कुछ अन्य फ़िल्में भी लीक से हट कर हैं.

शबनम मौसी
शबनम मौसी पहली निर्वाचित विधायक हैं

आपके साथ एक और ख़ास बात है जो ध्यान में आती है और वह यह कि आज के दौर के सितारे जबकि हिंदी बोलने से हिचकिचाते हैं, इंटरव्यू में अपने जवाब अंग्रेज़ी में ही देते हैं, आप हमेशा बिलकुल शुद्ध भाषा का इस्तेमाल करते हैं. आपको ऐसी कोई हिचक नहीं है.

हिंदी मेरे सपनों की भाषा है, मेरे अपनों की भाषा है, मेरे व्यवसाय की भाषा है. यह वही भाषा है जिसके साथ मैं पला-बढ़ा. मुझे गर्व है अपनी भाषा पर. यह मेरे संस्कारों से जुड़ी भाषा है. यह मेरी मजबूरी भी है और मेरी ज़रूरत भी.

प्राय: समाचार माध्यमों पर यह आरोप लगते हैं कि वे उर्दू शब्दों का प्रयोग करते हैं, यानी शुद्ध हिंदी नहीं बोलते. क्या आपको लगता है कि किसी भाषा में अन्य भाषा के शब्दों का प्रयोग ग़लत है या ये उसे और समृद्ध बनाते हैं?

मेरे विचार में हिंदी विवाद की नहीं संवाद की भाषा है. मुझे नहीं लगता उसे सरल बनाना या उसमें किसी अन्य भाषा के सहज, सरल शब्दों को शामिल करना अनुचित है. हिंदी की तो ख़ासियत ही यह कि उसमें ग्राह्यता की ज़बरदस्त ताक़त है. उसे जनमानस तक पहुँचाने के लिए और उसे समृद्ध बनाने के लिए इस तरह के प्रयोगों को मैं ग़लत नहीं मानता.

जो लोग स्वंय को हिंदी का पैरोकार बताते हैं, उसके समर्थन में बड़े-बड़े भाषण देते हैं, वे हिंदी दिवस पर ही क्यों जोश में आते हैं? निजी रूप से उनका क्या योगदान है?

मैं तो इस तरह के आयोजनों के ही ख़िलाफ़ हूँ. किसी भाषा की जन्मतिथि या पुण्यतिथि मनाए जाने का क्या मतलब है. बड़ी-बड़ी बातों से कुछ नहीं होने वाला. हिंदी का विकास तभी संभव है जब उसे राजभाषा के अलावा काजभाषा भी बनाया जाए.

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