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सोमवार, 07 फ़रवरी, 2005 को 10:02 GMT तक के समाचार
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पेज-थ्री: पर्दे के पीछे क्या है?

पेज थ्री
पेज थ्री सभ्य समाज की एक और असलियत उजागर करती है
पेज 3, यानी अख़बारों में चमकती-महकती हस्तियों की सजी-मजी बातों और पार्टियों में बीती रातों की बानगी का पन्ना.

पर सच महज इतना भर नहीं है. पेज 3 के पीछे भी एक सच है जिसे अपनी हाल ही में रिलीज़ हुई फ़िल्म, पेज-थ्री के जरिए पर्दे पर दिखाने की कोशिश की है निर्देशक मधुर भंडारकर ने.

नाम के मुताबिक फ़िल्म रोज़ सुबह अखबारों के पेज 3 पर दिखाए जाने वाले लोगों और उनकी बातों को बखूबी दिखाती है पर इसके साथ-साथ फ़िल्म एक पड़ताल भी करती है, इन बड़े लोगों की पार्टियों के मक़सद के बारे में और इनमें आने वाले लोगों के दोहरे चरित्र के बारे में.

ख़बरों पर मिलने वाले भारी विज्ञापन, संपादक की मजबूरियाँ और अख़बार के मालिक के हितों के सवाल भी इस फ़िल्म के ज़रिए उठाने की कोशिश की गई है.

फ़िल्म निर्देशक मधुर भंडारकर अपनी पहली फ़िल्म चांदनी बार के विषय वस्तु के लिए ही चर्चा में आए थे. उसके बाद उन्होंने पेज-थ्री बनाने की घोषणा की थी.

वैसे इस फ़िल्म की शुरुआत से ही मधुर व्यक्तिगत विवादों में भी घिरे रहे.

कथानक

फ़िल्म पेज-3 एक ऐसे पात्र के इर्द-गिर्द बनाई गई है जो पेशे से पत्रकार हैं और उसे शहर में शाम को होने वाली पार्टियों से कहानी और तस्वीरें जुटाने की ज़िम्मेदारी दी गई है.

पेज थ्री
पेज थ्री की कथा एक पत्रकार के अनुभव के आसपास बुनी गई है

यह भूमिका एक नई कलाकार, कोंकणा सेन शर्मा (माधवी) निभा रही हैं.

इन पार्टियों में जाने के बाद माधवी को पता चलता है कि आने वाले लोगों की अपनी निजी जिंदगी कैसी है और संबंधों में किस तरह के छलावे की चादर ओढ़े, ये लोग एक-दूसरे को धोखा दे रहे हैं.

दूसरी ओर एक ऐसे पत्रकार का चरित्र है जो क्राइम रिपोर्टर है और अपने काम के जरिए एक सार्थक पत्रकार की भूमिका निभा रहा है.

इस दौरान तमाम नामचीन हस्तियों, जिनमें उद्योगपतियों, समलैंगिकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, मॉडलों, फ़िल्मी हस्तियों, डिज़ाइनरों, नेताओं, अप्रवासी भारतीयों और यहाँ तक की पुलिस महकमे के बड़े अधिकारियों की संवेदनशीलता, उनकी निजी ज़िदगी और दोहरे चरित्र को भी सामने लाने की कोशिश की गई.

इनमें से कुछ बातें तो ऐसी हैं जो समाज के तमाम सफ़ेदपोश लोगों के कारनामों की कलई खोलती हैं.

फ़िल्म के आख़िर में अखबार के संपादक और उसके मालिक के बीच निर्णय के असमंजस को दिखाया गया है जहाँ आर्थिक हित, नैतिक ज़िम्मेदारी पर हावी हैं.

कोलाज

फ़िल्म की पटकथा के माध्यम से जो सच सामने लाने की कोशिश की गई है, वो वाकई रोचक है और दर्शकों को प्रभावित करता है पर फ़िल्म दर्शकों को ज़्यादा प्रभावित नहीं करती.

शुरुआत में तो फ़िल्म कट-पेस्ट जैसी ही है. दर्शकों को बाँधने के लिए एक आइटम गीत भी रखा गया है.

 मधुर भंडारकर तमाम चीज़ों को कोलाज़ की तरह समेटकर दिखाने में कामयाब रहे हैं

हालांकि मधुर भंडारकर तमाम चीज़ों को कोलाज़ की तरह समेटकर दिखाने में कामयाब रहे हैं.

पार्टियों के सच को दिखाने की कोशिश में कहीं-कहीं फ़िल्म व्यवहारिकता के बजाए नाटकीय लगने लगती है पर मुख्य कलाकारों का अभिनय संतोषजनक है.

फ़िल्म में नई पीढ़ी के लिए संबंधों का मतलब, समझ और उनकी जीवनशैली को भी दिखाने की कोशिश की गई है जो औसत ही रही है.

इंटरवल के बाद फ़िल्म थोड़ी संभलती है और अंत में एक नए कलेवर के साथ ख़त्म हो रही है, जो एक अच्छे अंत के रूप में देखा जा सकता है.

इस पटकथा पर और बेहतर फ़िल्म की अपेक्षा रखी जा सकती थी.

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