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2004:औसत फिल्में, औसत कारोबार | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
हिंदी फिल्मों की सर्वाधिक चर्चित और स्वीकृत अभिनेत्री ऐश्वर्या राय को वर्ष 2004 में 'मुग़ले आजम' सबसे ज्यादा पसंद आई. साल की उल्लेखनीय फ़िल्म के तौर पर 'मुग़ले आजम' का ज़िक्र करने वालों में ऐश्वर्या राय समेत अनेक महत्वपूर्ण फ़िल्मी हस्ताक्षर शामिल हैं. बॉक्स ऑफिस पर भी 'मुग़ले आजम' ने चमत्कार किया. 44 साल पहले बनी फिल्म रंगीन होकर रिलीज हुई तो सभी ने फिर से इस फिल्म की कामयाबी का इंद्रधनुष देखा.यह शुद्ध भारतीय घटना है. जिस प्रकार से हिंदी फ़िल्में दुनिया की सभी फ़िल्मों से अलग और विशेष हैं, वैसे ही यह घटना भारतीय दर्शकों की मानसिकता का इज़हार करती है. उल्लेखनीय है कि पश्चिमी देशों में जब पुरानी ब्लैक एंड ह्वाइट फ़िल्मों को रंगीन कर रिलीज किया गया था तो दर्शकों ने उन्हें स्वीकार नहीं किया. संख्या गिरी
विश्व में सबसे अधिक फ़िल्में बनाने के लिए विख्यात भारत में फ़िल्मों की संख्या में भारी गिरावट आई है. हिंदी फ़िल्म इंडस्ट्री भयंकर नुक़सान के दौर से गुजर रही है. सफलता का प्रतिशत लगातार सिकुड़ता जा रहा है. वर्ष 2004 में रिलीज हुई 113 फिल्मों से तीन फ़िल्में ही ऐसी चुनी जा सकती हैं, जो लोकिप्रयता और मुनाफे का मानदंड पर खरी उतर सकती हैं. बाकी 110 फ़िल्मों का हश्र ज़ाहिर करता है कि हिंदी फ़िल्म इंडस्ट्री सृजनात्मकता और कल्पनाशीलता के घोर अकाल से गुजर रही है. फ़ॉर्मूलों का अकाल नवीनता और मौलिकता तो दुर्लभ हो ही चुकी है. आज़माए फ़ॉर्मूले और मसालों से भी निर्माता-निर्देशक दर्शकों का मनोरंजन करने में विफल साबित हो रहे हैं. 'मर्डर' सफल होती है तो उसका मुहावरा इस्तेमाल होने लगता है, किंतु उस मुहावरे का सटीक प्रयोग दूसरे निर्माता-निर्देशक महेश भट्ट की तरह नहीं कर पाते.
शाहरूख़ ख़ान के बारे में यह धारणा बन चुकी थी कि उनकी फ़िल्में बॉक्स ऑफिस पर नाकाम हो ही नहीं सकतीं, मगर 'स्वदेस' को दर्शकों ने नकार दिया. आशुतोष गोवारिकर के ईमानदार इरादों के बावजूद फ़िल्म नहीं चली. सच कहें तो हिंदी दर्शकों के बीच न तो सेक्स चलता है और न शाहरूख़ ख़ान. क्या चलता है, इसकी भविष्यवाणी नहीं की जा सकती. कार्पोरेट उस्ताद अरिंदम चौधरी की फ़िल्म 'रोक सको तो रोक लो' किसी कंज़्यूमर प्रोडक्ट की तरह लंबे रिसर्च के निष्कर्षों से तैयार की गई थी. अरिंदम चौधरी का दावा था कि उन्हें कामयाबी का निश्चित फ़ॉर्मूला मिल गया है, मगर उनकी फ़िल्म ने दर्शकों को सिनेमाघरों में ही आने से रोक दिया. मीडियोकर दौर
बॉक्स ऑफिस के परिणामों से परे जाकर देखें तो 2004 में बुरी फ़िल्मों की संख्या ज़्यादा रही. विषय, प्रस्तुति और निर्वाह के लिहाज से भारी गिरावट दिख रही है. यहाँ तक कि सफल रह चुके निर्देशक भी आत्मविश्वास खो रहे हैं और दर्शकों को निराश कर रहे हैं. जो निर्माता-निर्देशक सफल भी हुए, उनकी कामयाबी कम अंकों के बावजूद टॉप करने जैसी है, या कहें कि अंधों में काना राजा जैसी. चूँकि किसी ने प्रतिष्ठा हासिल नहीं की, इसलिए औसत फ़िल्मों को ही बेहतर माना जा रहा है और औसत निर्देशक ही सिद्धहस्त फ़िल्मकार घोषित किए जा रहे हैं. हिंदी फ़िल्मों में घोर मिडियोक्रिटी (सामान्य योग्यता) का दौर चल रहा है. यश चोपड़ा भी इससे अछूते नहीं हैं. साधारण फ़िल्मों की इस भीड़ में उनकी 'वीरज़ारा' क्लासिक साबित हो रही है, जबकि वह अपनी पिछली सृजनात्मक ऊँचाइयों से नीचे आए हैं. निराशा 2004 की उल्लेखनीय फ़िल्मों की सूची हिंदी फ़िल्मों के प्रशंसकों और अध्येताओं को निराश करती है. बॉक्स ऑफिस और सराहना दोनो को मिला दें तो भी चमेली, देव, मकबूल, मॉर्निंग रागा, नाच, मर्डर, स्वदेस, मैं हूँ ना और वीरा-जारा से आगे हम नहीं बढ़ पाते. न कोई फ़िल्म ऐसी दिखती है, जिसे हम 2010 में भी देखना चाहें न ही किसी अभिनेत्रा-अभिनेत्री का काम ऐसा दिखता है, जो हमें खुश या परेशान करे. अमिताभ बच्चन से लेकर मनोज वाजपेयी तक अपनी फ़िल्मों और परफॉर्मेंस से दुखी करते हैं. अमिताभ बच्चन इस तर्क से अपना बचाव नहीं कर सकते कि अब वह कैरेक्टर आर्टिस्ट हैं और फ़िल्मों का बोझ उनके कंधों पर नहीं रहता. इसी प्रकार मनोज वाजपेयी की 'इंतक़ाम' और 'जागो' उनकी फ़िल्मी समझदारी के प्रति आशंकित करती है. रामू की फ़ैक्ट्री
रामगोपाल वर्मा की फैक्ट्री के फोरमैन (नए और युवा निर्देशक) अपनी नवीनता के बावजूद प्रभावित नहीं करते. सिर्फ 'एक हसीना थी' में निर्देशक की अपनी छाप दिखती है. बाकी फ़िल्में न तो कोई पहचान बना सकीं और न प्रभाव डाल सकीं. रामगोपाल वर्मा निर्देशित ‘नाच’ अच्छी फ़िल्म हो सकती थी, मगर बेलीक चलने की कोशिश में रामू ने ऐसा रास्ता अख्तियार किया, जिस रास्ते से गुज़रने के लिए दर्शक तैयार नहीं हुए. औसत संगीत हिंदी फ़िल्मों का संगीत भी औसत ही रहा. लोकप्रियता की दृष्टि से 'मर्डर', 'मैं हूँ ना', 'वीर-ज़ारा’ और ‘स्वदेस’ के एलबमों की बिक्री हुई. हिंदी फ़िल्मों के संगीत की मधुरता धीरे-धीरे खत्म हो रही है. आजकल की फ़िल्मों के गाने सिनेमाघरों से निकलने के बाद याद ही नहीं रहते. कुल मिलाकर सन् 2002 हिंदी फ़िल्मों के इतिहास में औसत फ़िल्मों के साल के रूप में याद रह जाएगा. हॉ, मुग़ले आजम के रंगीन होकर रिलीज होने और दर्शकों को फिर से लुभाने के लिए इतिहासकार अवश्य ही 2004 को याद रखेंगे. (लेखक समाचारपत्र दैनिक जागरण के फ़िल्म प्रभारी हैं) |
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