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'पुरानी फ़िल्मों को रंगीन नहीं करूँगा' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
हाल ही में पद्मभूषण से सम्मानित फ़िल्म निर्माता-निर्देशक यश चोपड़ा अपनी नई फ़िल्म वीरज़ारा को लेकर ख़ासी चर्चा में हैं. बीबीसी हिंदी डॉट कॉम की संपादक सलमा ज़ैदी ने अपनी हाल की मुंबई यात्रा के दौरान कई फ़िल्मी हस्तियों से बातचीत की. प्रस्तुत है इसी कड़ी में यश चोपड़ा से की गई बातचीत के कुछ अंश... यश जी, आपकी फ़िल्म के बारे में समीक्षकों और दर्शकों की अलग-अलग राय है. लेकिन क्या आप यह फ़िल्म बना कर संतुष्ट हैं. जी हाँ, मुझे ख़ुशी है कि मैंने एक ऐसी फ़िल्म बनाई जो भारत-पाकिस्तान के रिश्तों पर जुड़ी है लेकिन उसमें राजनीति नहीं है, सेना नहीं है, लड़ाई की बात नहीं है. वह एक सीधीसादी प्रेम कहानी है. उसके किरदार वहीं है जो हमें अपने आसपास नज़र आते हैं. हाँ यह मैं ज़रूर कहूँगा कि जिस वर्ग ने मेरी ही फ़िल्म धूम को सराहा है उन्हें वीरज़ारा शायद पसंद नहीं आई हो. हालाँकि यह फ़िल्म पाकिस्तान में रिलीज़ नहीं हुई लेकिन वीडियो के ज़रिए यह वहाँ भी देखी गई. क्या पाकिस्तान के दर्शकों से आपको किसी तरह की प्रतिक्रिया मिली है? पाकिस्तान के आम लोगों की इस फ़िल्म को बेहद सराहा है. मेरे पास कई पत्र आए हैं और जो लोग मुझे मिले उनका भी यही कहना है कि इस फ़िल्म का एक-एक सीन उन्हें अपने आसपास की ज़िंदगी की याद दिलाता है.
देखिए, मैंने पंजाब को बहुत नज़दीक से देखा है. वह चाहे भारत में हो या पाकिस्तान में वहाँ की मिट्टी की ख़ुशबू एक ही है. वहाँ का पहनावा, वहाँ की बोली, कोई भी तो फ़र्क़ नहीं है. आपकी सभी फ़िल्में उस श्रेणी में आती हैं जिन्हें पूरा परिवार एक साथ बैठ कर देख सकता है. आप हमेशा अंगप्रदर्शन से बचे हैं जबकि आज के कई फ़िल्मकार इसे समय की मांग या मार्केट की ज़रूरत बताते हैं. आप 'समय की इस मांग' के आगे क्यों नहीं झुके? एक फ़िल्मकार के कई फ़र्ज़ हैं. उनमें से एक यह भी है कि अगर कोई उसकी फ़िल्म अपनी माँ, बहन या बेटी के साथ बैठ कर देखे तो शर्मिंदा महसूस न करे. मैं तो यह भी मानता हूँ कि संगीत में भी शालीनता बरतने की ज़रूरत है. मैंने वीरज़ारा में मदनमोहन का संगीत लिया, जावेद अख़्तर ने बेहतरीन गीत लिखे और लता जी ने उन्हें आवाज़ दी. वे गाने लोकप्रिय भी हुए. मुग़ले आज़म को रंगीन बना कर, उसकी साउंड डॉल्बी में डब करके उसे रिलीज़ किया जाना एक नया ट्रेंड माना जा सकता है. क्या आप अपनी पुरानी फ़िल्मों को इस रूप में दोबारा लाए जाने के बारे में सोचेंगे. देखिए, मुग़ले आज़म की बात और है. वह तो एक एवरग्रीन फ़िल्म है. लेकिन यह बात हर फ़िल्म पर पूरी नहीं उतरती. मेरी दो पुरानी फ़िल्में ऐसी हैं जो ब्लकै ऐंड व्हाइट हैं. लेकिन मुझे नहीं लगता कि मैं उन्हें रंगीन बनाना चाहूँगा. इससे फ़िल्म की आत्मा कहीं न कहीं दब जाएगी. |
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