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लता जी को वरदान मिला हैः यश चोपड़ा | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
सुरों की मलिका लता मंगेशकर की 75वीं सालगिरह पर प्रख्यात निर्माता-निर्देशक यश चोपड़ा ने लता के सफ़र पर नज़र डाली है. उन्हें वरदान मिला है, ईश्वर का वरदान और जिन्हें ईश्वर वरदान देते हैं वे कभी नाकाम नहीं होते. लता मंगेशकर के संगीत के जीवन में कभी भी कोई उतार नहीं आया. उनके और दूसरे गायक-गायिकाओं के बीच कोई तुलना हो ही नहीं सकती. दूसरे जो गानेवाले हैं वे संगीत के हिसाब से गाते हैं मगर लता जी के मामले में संगीत उनके गाने के हिसाब से चलता था. अभी भी शानदार 75 साल की इस उम्र में भी उन्होंने मेरी नई फ़िल्म वीर ज़ारा के लिए गाने गाए जो ऐसे प्रेमियों की कहानी है जिन्हें सरहदों ने बाँट रखा है. इस फ़िल्म में हमने स्वर्गीय मदन मोहन की धुनें इस्तेमाल की हैं. जैसा कि होता था उन्होंने एक बार फिर अपना हुनर दिखाया है. और फिर मैंने देखा कि उनकी आवाज़ में ईश्वर के वरदान की झलक है. उन्होंने मेरी इस फ़िल्म में नौ गाने गाए हैं मगर एक गाना इतनी ख़ूबसूरती से गाया है कि वह मेरे जहन में बस गया है. वो गाना है - तेरे लिए हम जिए.... लता ने इस गाने को कुछ ऐसे भाव से गाया है कि आपको विश्वास नहीं होगा और तब आप समझेंगे के कि वे क्यों शीर्ष पर हैं. वे जो भी गाती हैं मुझे अच्छा लगता है मगर मेरी फ़िल्म के गानों में से सर्वश्रेष्ठ गाने को चुनना मुश्किल काम है. मैं तो यही कहूँगा कि वीर ज़ारा ऐसी फ़िल्म है जिसका संगीत सुना जाना चाहिए. लता से परिचय लता मंगेशकर मेरे फ़िल्मों में पाँव जमाने से पहले से गाती रही हैं और उनका नाम भी मेरे फ़िल्मों में उतरने से पहले ख्याति पा चुका था. मुझे याद है कि मैं तब उनको स्टूडियो में गाते हुए देखा करता था, जब मैं 1950 के दशक में सह निर्देशक के बतौर काम कर रहा था. वो तब मेरे लिए बहुत ऊँची हस्ती थीं और इसलिए मैं दूरी बनाकर रहता था. लता जी ने पहली बार मेरे लिए 1959 में मेरी फ़िल्म धूल का फूल में गाया. इस फ़िल्म में उन्होंने महेंद्र कपूर के साथ मिलकर युगल गीत गाया था- तेरे प्यार का आसरा चाहता हूँ....ये एक अविश्वसनीय गीत था. मैं तब ये विश्वास नहीं कर पाया कि महान गायिका मेरे लिए वाकई गा रही हैं. लता जी के साथ मेरा संपर्क शुरू हुआ मगर संबंध बनने में कुछ समय लगा. हम उनका इतना सम्मान करते थे कि उनसे बातचीत करने में हमारे हाथ-पाँव फूल रहे थे. मगर आहिस्ता-आहिस्ता हम सहज होते गए. आज वे मुझे यश भाई बुलाती हैं और मैं उनको दीदी कहता हूँ. मुझे लगता है कि जिन्हें भी उनके साथ काम करने, कुछ समय बिताने का मौक़ा मिला वे अपने आप को भाग्यशाली मानते होंगे. मैं उनके अनुशासन से भी हमेशा प्रभावित रहा जिसके कारण उन्होंने अपने गायन का स्तर बनाए रखा. मैं उन्हें लंबी ज़िंदगी की शुभकामना देता हूँ और ये दुआ करता हूँ कि वे और कई वर्षों तक हमें अपने शानदार गीतों की सौगात देती रहें. |
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