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औरत ख़ूबसूरत होती ही हैः यश चोपड़ा | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
बीबीसी वर्ल्ड के टेलीविज़न चैनेल के लिए प्रोड्यूसर अनिता होरम ने बॉलीवुड के पाँच बड़े फ़िल्मकारों पर आधारित वृत्तचित्रों की एक श्रृंखला की शुरुआत की है. इसी की पाँचवीं और अंतिम कड़ी हैं दीवार, मजबूर और सिलसिला जैसी फ़िल्मों के निर्माता यश चोपड़ा. पेश हैं उन पर आधारित डॉक्यूमेंटरी के वे अंश जहाँ वह ख़ुद अपने बारे में बता रहे हैं... पिछले वर्षों में फ़िल्मों में जो बदलाव आया है वह तकनीकी क्षेत्र में आया है. बेहतर साउंड, बेहतर मशीनें, बेहतर फ़ोटोग्राफ़ी. लेकिन इस सब के बावजूद बुनियादी बात वही है. और वह यह कि आप फ़िल्म में कहना क्या चाह रहे हैं. भारतीय फ़िल्म, चाहे वह कितने ही बड़े पैमाने पर बने, अगर उसमें भारतीय संवेदनाओं और भारतीय परंपराओं का ध्यान न रखा जाए तो वह चलेगी नहीं. देश के विभाजन के बाद एक बहुत गंभीर मोड़ आया. लोग बदले, उनकी संवेदनाएँ बदलीं. मैं उस समय पढ़ाई पर पूरा ध्यान लगा रहा था क्योंकि मेरे बड़े भाई बीआर चोपड़ा बंबई में थे और मेरी पढ़ाई के लिए पैसा भेज रहे थे. उस समय फ़िल्मों के अलावा मनोरंजन का और कोई साधन तो था नहीं. मुझे फ़िल्में देखने का शौक़ भी बहुत था. मैं आमतौर पर रोमांटिक फ़िल्में बनाता हूँ. मैं ऐसी फ़िल्में बनाता हूँ जिनमें महिलाएँ केंद्रीय पात्र होती हैं. मेरा मानना है कि क़ुदरत के अलावा औरत दुनिया की सबसे ख़ूबसूरत चीज़ है.
इस समय मैं निर्माता और निर्देशक का डबल रोल निभा रहा हूँ. निर्माता तो मैं शायद संयोगवश ही बन गया. मुझे आनंद निर्देशन करने में ही आता है. मैं यही कह सकता हूँ कि ईश्वर मेरे साथ बहुत दयालु रहा है. मुझे नहीं लगता कि मैंने कोई बहुत बड़ा काम किया है. यह सब ईश्वर की कृपा है. मैं यही कहना चाहता हूँ कि मैं आख़िरी साँस तक फ़िल्में बनाना चाहता हूँ. ऐसी फ़िल्में जिन पर विश्वास किया जा सके. मैं अपने विचारों से समझौता नहीं करना चाहता... |
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