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घबराहट अब भी होती हैः राकेश रोशन | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
बीबीसी वर्ल्ड के टेलीविज़न चैनेल के लिए प्रोड्यूसर अनिता होरम ने बॉलीवुड के पाँच बड़े फ़िल्मकारों पर आधारित वृत्तचित्रों की एक श्रृंखला की शुरुआत की है. इसी की चौथी कड़ी हैं ख़ून भरी मांग, ख़ुदग़र्ज़, कहो न प्यार है और कोई मिल गया जैसी फ़िल्मों के निर्माता राकेश रोशन. पेश हैं उन पर आधारित डॉक्यूमेंटरी के वे अंश जहाँ वह ख़ुद अपने बारे में बता रहे हैं... "मुझे लगता है फ़िल्म बनाते समय बहुत व्यावहारिक होना ज़रूरी है. फ़िल्म सही भी हो सकती है और ग़लत भी. जिस दिन आप फ़िल्म बनाना शुरू करते हैं, यह असुरक्षा घर कर लेती है. मेरी कोई फ़िल्म जब रिलीज़ होती है तो मैं मंगलवार या बुधवार तक इंतज़ार करता हूँ. अगर वह अच्छा व्यापार नहीं कर रही होती है तो मैं उसे भूल जाता हूँ और अगली फ़िल्म के बारे में सोचने लगता हूँ. जिस दिन मैंने अपनी पहली फ़िल्म साइन की मैं निर्माता नागारेड्डी से मिलने ताज होटल गया. उन्होंने मुझे चेक दिया. तभी मेरे पास मनु मोदी नाम के एक व्यक्ति का फ़ोन आया. उन्होंने कहा कि मैं रिट्ज़ होटल आ जाऊँ क्योंकि श्रीधर मुझसे मिलना चाहते थे. मैं वहाँ पहुँचा तो दिल एक मंदिर और अन्य कई फ़िल्मों के निर्माता श्रीधर ने मुझे साइन कर लिया. जब मैं नीचे उतर रहा था तो मुझे एक और निर्माता ढोंढी मिले. और जब उन्हें पता चला कि नागारेड्डी ने मुझे साइन किया है तो उन्होंने भी मुझे अपनी फ़िल्म के लिए साइन कर लिया. यानी एक दिन में मैंने तीन फ़िल्मों में काम करने की हामी भरी. मैं ट्रेन से गया था लेकिन टैक्सी से वापस आया. यह और बात है कि मेरे पास टैक्सी वाले को देने को पैसे नहीं थे. वे मैंने अपनी माँ से लेकर दिए. फ़िल्म पूरी तरह निर्देशक का माध्यम है. अभिनेता एक अच्छे निर्देशक के बिना कुछ नहीं कर सकता. जब मैं अभिनय कर रहा था तो मैंने अपनी प्रोडक्शन कंपनी खोली और मेरी पहली फ़िल्म आप के दीवाने थी.
मुझे याद है हम ख़ुदग़र्ज़ के प्रीमियर के लिए मेट्रो जा रहे थे और ऋतिक, मेरी बेटी सुनयना और मेरी पत्नी पिंकी, सब मेरे साथ थे. जब हम मेट्रो पहुँचे तो मैंने वहाँ बड़े-बड़े बैनर लगे देखे. मैंने अपनी पत्नी से कहा कि यह मेरे लिए आख़िरी मौक़ा है. अगर यह फ़िल्म नहीं चली तो मेरे अभिनय कैरियर का अंत समझो और एक निर्माता और निर्देशक के तौर पर भी यह मेरा अंत होगा. जब फ़िल्म पटकथा के दौर में होती है तो वह सबसे दुश्वार समय होता है. जब एक फ़िल्म पूरी हो जाती है तो यह सोच कर मेरी रातों की नींद उड़ जाती है कि अब मुझे बैठ कर एक और स्क्रिप्ट लिखनी होगी. अगर कोई मुझे बनी-बनाई पटकथा दे दे तो वह मेरे लिए बहुत ख़ुशी का मौक़ा होगा. वही घबराहट, वही असुरक्षा की भावना अब भी मौजूद है. मैं अब भी परेशान होता हूँ कि यह शॉट कैसे लेना चाहिए? कभी-कभी मैं दूसरों की फ़िल्म देखता हूँ और उनसे फ़ोन कर के पूछता हूँ कि यह दृश्य आपने कैसे फ़िल्माया होगा? यह लगातार सीखने की एक प्रक्रिया है. हाथ-पैर ठंडे पड़ जाते हैं कि क्या विषय होना चाहिए? यही सब कुछ 1980 में था और यही 2004 में भी है". (31 जुलाई से 28 अगस्त तक जारी रहने वाली यह श्रृंखला हर शनिवार भारतीय समयानुसार रात दस बजे और ग्रीनिचमान समयानुसार शाम साढ़े चार बजे देखी जा सकती है. इस श्रृंखला में रामगोपाल वर्मा, संजय लीला भंसाली, करण जौहर, राकेश रोशन और यश चोपड़ा के बारे में ख़ुद उनसे और उनसे जुड़ी हस्तियों से बातचीत की गई है) |
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