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उत्कृष्टता की तलाश में संजय भंसाली | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
बीबीसी वर्ल्ड के टेलीविज़न चैनेल के लिए प्रोड्यूसर अनिता होरम ने बॉलीवुड के पाँच बड़े फ़िल्मकारों पर आधारित वृत्तचित्रों की एक श्रृंखला की शुरुआत की है. इसी की दूसरी कड़ी है ख़ामोशी, हम दिल दे चुके सनम और देवदास जैसी फ़िल्मों के निर्देशक संजय लीला भंसाली. पेश हैं उन पर आधारित डॉक्यूमेंटरी के वे अंश जहाँ वह ख़ुद अपने बारे में बता रहे हैं... "मेरी माँ एक नृत्यांगना थीं. हम एक चाल के जिस छोटे से कमरे में रहते थे वहाँ मैं देखता था कि माँ जब ख़ुश होती थीं तो रेडियो लगा कर नाचना शुरु कर देती थीं. उस समय मैं यही सोचता था कि काश हमारे पास और ज़्यादा जगह होती. और यह बात मेरे दिमाग़ में बैठ गई. अब मेरी फ़िल्मों में डांस सीन के लिए बड़े-बड़े सेट शायद इसीलिए होते हैं क्योंकि मैं अपनी माँ के लिए ज़्यादा जगह चाहता था जहाँ वह नृत्य कर सकें. मुझे पुणे फ़िल्म संस्थान से बेहद लगाव है. मुझे याद है कि कैसे इस जगह से मुझे बाहर निकाल दिया गया था...मैं अपना संपादन का कोर्स पूरा नहीं कर पाया था...और अदालत से इस बारे में मुक़दमा हारने के बाद मैंने यहाँ से कैसे अपना सामान उठाया था और चला गया था. उस दिन मैंने एक संकल्प किया था...संकल्प मैं अकसर किया करता हूँ...शायद वही मेरी महत्वाकांक्षा को ज़िंदा रखते हैं...तो, मैंने संकल्प किया कि यहाँ के जितने छात्र हैं, मैं उन सब से पहले कोई फ़िल्म बना कर दिखा दूँगा. सलमान ख़ान ने मुझे आठ घंटे इंतज़ार कराया क्योंकि वह किसी शूटिंग में व्यस्त थे. और जब वह मुझसे मिले तो उन्होंने कहा, मुझे लगता है मैं आप से पहले मिल चुका हूँ. और मैंने कहा, जी नहीं आप मुझसे कभी नहीं मिले. आप इतने लोगों से मिलते हैं कि आप भूल सकते हैं. लेकिन मैं जानता हूँ कि मैं सलमान ख़ान से पहले कभी नहीं मिला.
मुझे हमेशा उत्कृष्टता की तलाश रहती है. मेरा मानना है कि मेरे साथ जो लोग भी काम करते हैं उनकी यह तलाश होनी चाहिए. हम बेहतरीन नहीं है तो हमें उसकी तलाश ज़रूर होनी चाहिए. मैं मानता हूँ कि यह थका देने वाला प्रयास है लेकिन काम पूरा होने पर जो एहसास होता है वह अद्भुत है. जब मेरे पिता का निधन हुआ तो मेरी माँ ने उनकी आधी बची शराब की बोतल संभाल कर रख ली थी. मुझे लगता है देवदास की मेरी प्रेरणा यही थी. मेरे पिता को शराब से लगाव था और कई मायनों में वह देवदास की तरह ही थे. देवदास, देखा जाए तो मेरे पिता को मेरी श्रद्धांजलि है, यह उनके आत्म-विनाश को श्रद्धांजलि है, उनकी प्रेम की परिकल्पना को श्रद्धांजलि है. यह एक बहुत ही निजी फ़िल्म है हालाँकि मैंने इसे लिखा नहीं है. हम सभी संघर्ष करते हैं और बख़ूबी करते हैं. लेकिन मेरे लिए यही बहुत बड़ी बात है कि कहीं न कहीं आशा की एक किरण मौजूद है. आप ने कोई छोटी-मोटी उपलब्धि भी कर ली तो वह ऐसी ही है कि आपने अपना ख़ुद का ताजमहल बना लिया. हम सभी यह प्रयास करते हैं और यह एक पूरी प्रक्रिया है-यानी अंधेरे को पीछ छोड़ कर रोशनी की ओर आगे क़दम बढ़ाना..." (31 जुलाई से 28 अगस्त तक जारी रहने वाली यह श्रृंखला हर शनिवार भारतीय समयानुसार रात दस बजे और ग्रीनिचमान समयानुसार शाम साढ़े चार बजे देखी जा सकती है. इस श्रृंखला में रामगोपाल वर्मा, संजय लीला भंसाली, करण जौहर, राकेश रोशन और यश चोपड़ा के बारे में ख़ुद उनसे और उनसे जुड़ी हस्तियों से बातचीत की गई है) |
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