|
फ़िल्म देखने पर पिटाई होती थी- राम गोपाल वर्मा | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
बीबीसी वर्ल्ड के टेलीविज़न चैनेल के लिए प्रोड्यूसर अनिता होरम ने बॉलीवुड के पाँच बड़े फ़िल्मकारों पर आधारित वृत्तचित्रों की एक श्रृंखला की शुरुआत की है. इसी की पहली कड़ी है सत्या, रंगीला, भूत और कंपनी जैसी फ़िल्मों के निर्माता-निर्देशक रामगोपाल वर्मा. पेश हैं उन पर आधारित डॉक्यूमेंटरी के वे अंश जहाँ वह ख़ुद अपने बारे में बता रहे हैं... "जब दक्षिण में नागार्जुन एक जानेमाने अभिनेता थे, उस समय मैं स्टूडियो के चक्कर लगाया करता था. एक दिन मैंने उन्हें एक ऐसे सीन के बारे में बताया जिसकी मैं कल्पना कर रहा था. यानी कैसे एक व्यक्ति नाइट शो देख कर घर लौट रहा है और गुंडे उसका पीछा करते हैं और फिर उसे पीटते हैं. इस सबको मैंने जिस विस्तार से बयान किया उससे नागार्जुन हैरान रह गए. उन्होंने कहा कि कभी किसी ने पहले उन्हें इतनी बारीकी से कोई दृश्य नहीं समझाया है और वह भी एक ऐसे व्यक्ति ने जिसका कोई प्रशिक्षण ही नहीं है और जो फ़िल्मों से जुड़ा हुआ ही नहीं है. बस ऐसे मेरे फ़िल्मी जीवन की शुरुआत हुई. आगे चल कर मैंने अंडरवर्ल्ड पर दो फ़िल्में बनाईं-सत्या और कंपनी. मैं लोगों को अंडरवर्ल्ड के बारे में शिक्षित नहीं कर रहा हूँ. ऐसी फ़िल्में पहले भी बनी हैं. सत्या में जो बात उठाने की कोशिश की गई है वह यह कि वे लोग हमारी ही तरह लगते हैं जो एक ख़तरनाक बात है.
मैंने जिस दिन से निर्देशक बनने का तय किया उस दिन से मैं ख़ुद को कामयाब मानता हूँ. अगर आप सुबह सो कर उठें और उस दिन जो भी करना चाहते हों, कर पाएँ तो आप कामयाब हैं. लेकिन अगर आप कामयाबी का मानदंड यह तय करें कि मेरी कितनी फ़िल्में चलीं या मेरे बैंक खाते में कितनी राशि है, तो शायद मैं सफल न माना जाऊँ. मेरे साथ एक ख़ास बात यह है कि मुझे हर वह चीज़ प्रभावित करती है जो अनोखी है. मुझे शादियाँ पसंद नहीं हैं, जन्मदिन की पार्टियाँ पसंद नहीं हैं, मैं समारोहों में नहीं जाता हूँ और पार्टियाँ मुझे बोर करती हैं. यह एक इंसान के तौर पर मेरी पहचान है. अब वह चाहे भूत हो या सत्या या रंगीला, सब सीधे-सादे आमलोगों की कहानियाँ हैं लेकिन रूटीन से थोड़ा हट कर. एक निर्देशक के तौर पर मुझे लगता है कि मेरी सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म भूत है. ज़्यादातर लोग सत्या या कंपनी या रंगीला को उस श्रेणी में रखते हैं. लेकिन भूत की ख़ास बात यह थी कि उसमें बहुत कुछ दिखाने को था ही नहीं. उर्मिला टीवी देख रही है, अजय दफ़्तर जाता है, वापस आता है. यानी कुछ हो ही नहीं रहा है. और ऐसे समय में आपकी प्रतिभा सामने आती है...
निजी तौर पर मुझे लगता है कि मैंने अपनी एक पहचान क़ायम कर ली है. इसलिए नहीं कि मैं ने कोई महान फ़िल्म बना दी. बल्कि इसलिए क्योंकि मेरी पूरी सोच बदल गई है. अब मैं फ़िल्मोद्योग को एक नए नज़रिए से देख रहा हूँ जो पहले नहीं था. एक ज़माना था जब मेरे पिता ने मेरी तरफ़ से उम्मीद ही छोड़ दी थी. मेरी माँ ने मुझे कई बार बेल्ट से पीटा. क्योंकि मैं कॉलेज से भाग कर फ़िल्में देखने चला जाया करता था. मैं आज भी उन्हें वह बात याद दिला कर छेड़ता हूँ..." (31 जुलाई से 28 अगस्त तक जारी रहने वाली यह श्रृंखला हर शनिवार भारतीय समयानुसार रात दस बजे और ग्रीनिचमान समयानुसार शाम साढ़े चार बजे देखी जा सकती है. इस श्रृंखला में रामगोपाल वर्मा, संजय लीला भंसाली, करण जौहर, राकेश रोशन और यश चोपड़ा के बारे में ख़ुद उनसे और उनसे जुड़ी हस्तियों से बातचीत की गई है) |
| ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||