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रंग भरे जा रहे हैं पुरानी फ़िल्मों में | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
"क्या फ़िल्में थी वो... मुगले आज़म, मदर इंडिया, आवारा... चलती का नाम गाड़ी... आज ऐसी फ़िल्में कहाँ." पुरानी फ़िल्मों के दीवानों को अकसर ये कहते सुना जा सकता है. इन दीवानों को कभी-कभी कोई कमी सालती है तो बस इतनी कि काश ये फ़िल्में रंगीन होती. ज़रा सोचिए कि ये फ़िल्में सचमुच रंगीन होतीं तो... मुग़ले आज़म में केवल शीशमहल ही नहीं, मधुबाला और मुग़ल दरबार भी असली रंगत में दिखते तो...??? नया दौर में दिलीप कुमार की अदाकारी के रंग के साथ प्रकृति भी पूरे रंगों के साथ दिखती तो...? पुरानी बोतल में नई शराब चलिए, ज़्यादा सोचने की ज़रूरत नहीं, न ही ज़्यादा इंतजार की ज़रूरत है.
यक़ीन मानिए, आपकी ये ख्वाहिश पूरी होने वाली है. इस साल के आखिर तक या फिर ज़्यादा से ज़्यादा अगले साल की शुरुआत में आप इन फ़िल्मों को रंगों के साथ देख सकेंगे. पुरानी शराब को नई बोतल में भरने का ये सिलसिला शुरू हो चुका है. और इस सिलसिले की शुरूआत की है बीआर फ़िल्म्स ने अपनी शुरूआती सालों की सुपरहिट फ़िल्म 'नया दौर' के साथ. दूसरी ओर, के असिफ़ की मुगले आज़म में भी रंग भरने का सिलसिला शुरू हो चुका है. रंगों का सपना बीआर फ़िल्म्स की ब्लैक एंड व्हाइट फ़िल्मों में रंग भरना बीआर चोपड़ा के बेटे रवि चोपड़ा का सपना रहा है. 'नया दौर' इस सिलसिले की पहली कड़ी है. बीआर फ़िल्म का इरादा इसके बाद 'साधना' 'धूल का फूल', 'क़ानून' और 'गुमराह' जैसी फ़िल्मों में भी रंग भरने का है. रवि चोपड़ा बताते हैं कि एक फ़िल्म पर क़रीब 2.5 करोड़ रूपए का खर्च आ रहा है. उनके मुताबिक रंगीन 'नया दौर' का काम नवंबर तक पूरा हो जाएगा और जनवरी में इसे रिलीज़ करने की योजना है. इन फ़िल्मों को रंगने के पीछे वो तर्क देते हैं कि आज के दर्शकों ने ब्लैक एंड व्हाइट फ़िल्में देखना बंद कर दिया है, लेकिन उन फ़िल्मों की अपील आज भी बरकरार है. इसीलिए ये कोशिश शुरू की गई है. बीआर फिल्म्स इन फ़िल्मों का साउंड ट्रैक भी बेहतर बना रहा है. नया मुग़ले आज़म? मुग़ले आज़म पर तो जितना काम हो रहा है उससे लगता है कि उन्हीं दृश्यों और कलाकारों के साथ एक नई फ़िल्म ही देखने को मिलेगी. हालाँकि इस फ़िल्म के कुछ हिस्से पहले ही रंगीन हैं लेकिन पूरी फ़िल्म को एक रंगीन फ़िल्म के रूप में देखने का इंतज़ार लोगों को ज़रूर होगा.
सफलतम फ़िल्मों में गिनी जाने बाली क्लासिक मुग़ले आज़म अब स्टर्लिंग प्रोडक्शन नाम की कंपनी की मिल्कियत है. स्टर्लिंग फ़िल्म्स तो बीआर फ़िल्म्स से भी एक क़दम आगे है. वो सिर्फ फ़िल्म को रंग ही नहीं रहे, उसमें 'डिजिटल इफैक्ट' डालने के लिए पूरा साउंड ट्रैक भी अपग्रेड कर रहे हैं. इतना ही नहीं मुग़ले आज़म के संगीतकार नौशाद म्यूजिक में भी नई जान डाल रहे हैं. इस काम में उनकी मदद संगीतकार उत्तम सिंह कर रहे हैं. इसके संगीत के टुकड़े अलग से रिकॉर्ड किए जाएँगे, पर आवाजें वहीं पुरानी रहेंगी. बाज़ार और मुनाफ़ा फ़िल्मों की ट्रेड मैगजिन 'सुपर सिनेमा' के संपादक विकास मोहन के मुताबिक इस पूरी कसरत का मक़सद पुराने क्लासिक को नई तरह से आज के मुताबिक़ सँवार कर परोसना है. पुराने शौकीनों के अलावा नई पीढ़ी में भी पुराने फ़िल्मों के प्रति रुचि देखकर ये कोशिश शुरू की गई हैं इसलिए ये फ़िल्में बाजार में नई फ़िल्मों की तरह ही रिलीज़ की जाएँगी. इनको संवारने वाले बड़े मुनाफे की उम्मीद कर रहे हैं और अगर ये मुनाफा उनके हाथ लगा तो ये सिलसिला तेज़ हो सकता है. भारत के बाहर की बाज़ार पर इन लोगों की ख़ास नज़र है, विकास मोहन के मुताबिक नई तकनीक के साथ आने वाली इन फ़िल्मों को डीवीडी और वीसीडी का भी बड़ा बाजार मिलेगा. और फिर इनका जीवन काल बढ़ेगा तो ये आज की पीढ़ियों के भी काम आएँगी. इन फ़िल्मों के गीत-संगीत की भारी लोकप्रियता को भी इस कोशिश का एक कारण बताया जा रहा है. हिंदी फ़िल्म जगत इन फ़िल्मों की नयी रंगत और फिर नतीजे का बेसब्री से इंतज़ार कर रहा है. |
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