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एक कोने में सिमटी ज़िंदगी | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
रोमांचक और लीक से हटकर फ़िल्में बनाने के लिए मशहूर स्टीवन स्पीलबर्ग की नई फ़िल्म 'द टर्मिनल' एक ऐसे व्यक्ति की कहानी पर आधारित है जिसकी एक नागरिक के रूप में कोई पहचान नहीं है यानी उसके पास कहने के लिए अपना कोई देश नहीं है. दिलचस्प बात ये है कि यह एक सच्ची ज़िंदगी पर आधारित पर बनी फ़िल्म है जो एक कोने भर में सिमट कर रह गई है. कहानी के असली नायक हैं मेहरान करीम नासिरी. वे पिछले क़रीब 16 साल से पेरिस के चार्ल्स डी गॉल हवाई अड्डे पर एक कोने में इतनी सी जगह पर ज़िंदगी गुज़ार रहे हैं कि उन्हें सोने के लिए टाँगें सिकोड़नी पड़ती हैं. यह एक ऐसी जगह है जहाँ हवाई अड्डे पर आने-जाने वाले यात्री इंतज़ार करना भी पसंद नहीं करते और वहाँ यात्रियों की भीड़ के अलावा हर पल तरह-तरह की उदघोषणाएँ होती रहती हैं यानी भारी शोर-शराबा. सोने के लिए उन्हें अपने कानों में रुई ठूँसनी पड़ती है और सुबह जल्दी उठना पड़ता है ताकि शौचालय में भीड़ से बचा जा सके. और ईरानी मूल के नासिरी को एक लाल रंग की बैंच भर मिली हुई है सोने या बैठने के लिए. दो ट्रॉलियों को उन्होंने अपने कोने की सीमा निर्धारित करने के लिए दो तरफ़ लगा रखा है जिस पर एक प्लास्टिक बैग लटका हुआ है जिसमें उनके कुछ कपड़े हैं. लुफ्थांसा के कुछ क़ाग़ज़ी डिब्बे हैं जिनमें उनका कुछ सामान बेतरतीब भरा हुआ है और भीगा तौलिया सूखने के लिए ट्रॉली पर डाला हुआ है. स्टीवन स्पीलबर्ग ने नासिरी की कहानी को दिलचस्प पाया तो उन पर 'द टर्मिनल' नाम से फ़िल्म बनाने का ऐलान किया हालाँकि शुरू में तो लोगों को यह भी पता नहीं था कि यह फ़िल्म नासिरी की ज़िंदगी पर आधारित है या किसी और पर. मुनाफ़े में हिस्सा लेकिन अब वह विवाद ख़त्म हो चुका है और फ़िल्म इस साल जून में प्रदर्शित होने के बाद से ख़ासी कमाई कर रही है जिसमें से तीन लाख डॉलर नासिरी को भी दिए गए हैं. नासिरी को यह धन उनके 'कोने' के नज़दीक ही स्थित डाकख़ाने में उनके खाते में भेजा गया, हालाँकि वह बहुत ज़्यादा धन ख़र्च नहीं करते हैं.
ब्रिटेन में यह फ़िल्म सितंबर में प्रदर्शित होगी और यह वहाँ कामयाब होती है तो नासिरी की ज़िंदगी पर उपन्यास भी लिखे जाने की योजना है जिससे उन्हें कुछ और धन मिलने की संभावना है. नासिरी फ़िल्म 'द टर्मिनल' के पेरिस में होने वाले विशेष शो में भी जाने से डर रहे हैं क्योंकि अगर उन्होंने टर्मिनल-1 पर स्थित अपना यह कोना छोड़ा तो हवाई अड्डे के सुरक्षाकर्मी उनका सामान वहाँ से हटा देंगे. नासिरी ने ब्रिटेन के गार्डियन अख़बार से कहा, "मैं बहुत धन नहीं ख़र्च करता हूँ क्योंकि मुझे ज़रूरत ही नहीं होती. मैं पास के एक रेस्तराँ में खाता-पीता हूँ और कुछ अख़बार और किताबें ख़रीदता हूँ, बस." कोना बना घर मेहरान करीमी नासिरी की उम्र के बारे में भी लोगों को ज़्यादा कुछ पता नहीं है. संभावना व्यक्त की जाती है उनका जन्म 1945 में ईरान में हुआ. उन्होंने ब्रिटेन के ब्रेडफ़र्ड विश्वविद्यालय में शिक्षा हासिल की और 1970 में ईरान के शाह के ख़िलाफ़ हुए प्रदर्शनों में हिस्सा लिया जिसकी वजह से उन्हें देश से निकाल दिया गया. ऐसी ख़बरें थीं कि ब्रिटेन ने उन्हें राजनीतिक शरण देने से इनकार कर दिया. 1988 में उनके यात्रा दस्तावेज़ खो जाने के बाद उन्हें कुछ महीने बेल्जियम की जेल में रहना पड़ा. किसी तरह से जुगाड़ करके नासिरी नवंबर 1988 में पेरिस से लंदन रवाना होने के लिए चार्ल्स डी गॉल हवाई अड्डे पर आए. उनके पास कुछ कपड़े और छोटी सी राशि थी. उस वक़्त उन्होंने कहा था कि उनका पासपोर्ट दो महीने पहले चोरी हो गया था. शायद हवाई अड्डे के कर्मचारियों को उन पर तरस आया और उन्होंने लंदन जाने वाली उड़ान के लिए इजाज़त दे दी लेकिन लंदन के हवाई अड्डे से उन्हें सीधे वापस पेरिस लौटा दिया गया. पेरिस पहुँचने पर उन्हें फ्रांस में घुसने की इजाज़त नहीं दी गई और किसी ऐसे देश की तलाश की गई जो नासिरी को स्वीकार कर सके. लेकिन ईरान में वापस जाने के नाम से घबराने वाले नासिरी ने हवाई अड्डे के एक कोने में जाकर ख़ुद को ऐसा व्यक्ति घोषित कर दिया जिसका कोई देश नहीं है और न ही वह कहीं के नागरिक है क्योंकि उनके पास कोई पासपोर्ट या अन्य शिनाख़्ती दस्तावेज़ नहीं था. बस तब से नासिरी की दुनिया उसी कोने तक सिमटकर रह गई है जबकि बाक़ी दुनिया वक़्त के साथ अपनी रफ़्तार से बढ़ती जा रही है. |
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