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अपनी दुनिया से बाहर निकलना है: करण | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
बीबीसी वर्ल्ड के टेलीविज़न चैनेल के लिए प्रोड्यूसर अनिता होरम ने बॉलीवुड के पाँच बड़े फ़िल्मकारों पर आधारित वृत्तचित्रों की एक श्रृंखला की शुरुआत की है. इसी की तीसरी कड़ी है कुछ-कुछ होता है, कभी ख़ुशी कभी ग़म और कल हो न हो जैसी फ़िल्मों के निर्माता करण जौहर. पेश हैं उन पर आधारित डॉक्यूमेंटरी के वे अंश जहाँ वह ख़ुद अपने बारे में बता रहे हैं... "मेरा हमेशा यह मानना रहा है कि मेरे भाग्य ने मुझे यहाँ तक पहुँचाया. क्योंकि मेरा रास्ता तो कुछ और ही था. इसके लिए मैं बहुत से लोगों का आभारी हूँ. पहले तो नियति का. और फिर, शाहरुख़, आदित्य चोपड़ा और अपने पिता का जिन्होंने मेरे पूरे कैरियर में मेरा साथ दिया. मैं मनोरंजन में यक़ीन रखता हूँ. मैं अपने दर्शकों को अपनी दुनिया की सैर कराना चाहता हूँ. क्योंकि वह दुनिया मेरी बनाई हुई है. मैं स्वभाव से पलायनवादी हूँ. तकलीफ़ों से भागता हूँ और यही मैं अपने दर्शकों से अपेक्षा रखता हूँ. अपनी परेशानियों से भाग कर मेरी दुनिया में आइए. मुझे फ़िल्म बनाते वक़्त हमेशा उसके व्यवसायिक पक्ष का ध्यान रहता है. मैं कई ऐसे फ़िल्मकारों को जानता हूँ जो कहते हैं कि फ़िल्म चले न चले, हमें फ़र्क़ नहीं पड़ता. फिर हम इतने बड़े सितारों को क्यों ले रहे हैं? बड़ी फ़िल्म क्यों बना रहे हैं? फ़िल्मों में गाने क्यों डाल रहे हैं? यह असलियत से भागना ही तो हुआ. असली ज़िंदगी में तो हम गाने नहीं गाते. हमें व्यावसायिक पक्ष का ख़्याल रखना ही पड़ता है. यह हर फ़िल्म निर्माता की सूची में पहले नंबर पर होता है. मैं अपने पिता के पास गया और मैंने कहा कि मुझे अमिताभ बच्चन, जया बच्चन, शाहरुख़ ख़ान, काजोल, ऋतिक रोशन और करीना कपूर को लेकर फ़िल्म बनानी है. मेरे पिता ने मेरी ओर देखा और बोले, तुम एक फ़िल्म बनाओ. दो या तीन क्यों बनाना चाहते हो? मैंने कहा कि नहीं, ये सब एक ही फ़िल्म में होंगे. मैं कभी ख़ुशी कभी ग़म बना रहा हूँ. बड़े सितारों को ले रहा हूँ और आपका बहुत सा पैसा ख़र्च करने जा रहा हूँ. मैं एक ऐसी फ़िल्म बनाना चाहता था जो भारतीय सिनेमा की सही परिचायक हो. इसमें भावुकता है, गाने हैं, नाच हैं, चमकदमक है, सब कुछ है.
परंपरा और आधुनिकता का सुंदर मिलन है. यह वह फ़िल्म थी जो मैं हमेशा बनाना चाहता था. मैंने यह पारिवारिक गाथा लिखी. गोद लिया हुआ बेटा, उसका भाई, और माता-पिता से उसका रिश्ता. वह सब जिस पर मैं बचपन से ही यक़ीन करता था. उस समय लोगों ने कहा, कुछ-कुछ होता है की एक आत्म थी जो कभी ख़ुशी कभी ग़म में नहीं है. और आज हाल यह है कि हरेक के3जी की बात कर रहा है. जैसा नाम और शोहरत मुझे अब मिली है वह पहले कभी नहीं मिली. यह एक ज़बरदस्त हिट फ़िल्म रही है. अब मुझे एक ऐसी फ़िल्म बनाने की ज़रूरत है जो मेरा आंतरिक अनुभव न हो. मुझे बाहर निकलना है-मैं ख़ुद पर नज़र डालूँ तो यही कहूँगा कि अब इस लड़के को परिपक्व होना है. उसे अपने ख़ोल से बाहर निकल कर कुछ नया करना है. उसे अपनी दुनिया से बाहर आना ही पड़ेगा". (31 जुलाई से 28 अगस्त तक जारी रहने वाली यह श्रृंखला हर शनिवार भारतीय समयानुसार रात दस बजे और ग्रीनिचमान समयानुसार शाम साढ़े चार बजे देखी जा सकती है. इस श्रृंखला में रामगोपाल वर्मा, संजय लीला भंसाली, करण जौहर, राकेश रोशन और यश चोपड़ा के बारे में ख़ुद उनसे और उनसे जुड़ी हस्तियों से बातचीत की गई है) |
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