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ग्रामोफ़ोन का जादू अब भी क़ायम | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
बिना बिजली या बैटरी के, चाभी भरकर चलाए जाने वाले ग्रामोफ़ोन पर घूमती तश्तरियों का जादू अब भी बरक़रार है. चाहे बार-बार रिकॉर्ड पलटना पड़े, चाहे गीत-संगीत के साथ-साथ धूल-गर्द से पैदा होने वाली घरघराहट भी सुनाई दे लेकिन सुरैया, नूरजहाँ, सहगल और गीता दत्त के गाने यक़ीनन आपको अतीत में खींच ले जाते हैं. पुरानी दिल्ली के चाँदनी चौक इलाक़े में अभी भी कुछ दुकाने ऐसी हैं जिन्होंने इस अनमोल विरासत को संभालकर रखा है. लगभग सत्तर वर्ष पुरानी दुकान के मालिक सैयद अकबर शाह कहते हैं, "चाहे सीडी और कैसेट ने लोगों की रूचि बदल दी हो लेकिन ओल्ड इज़ गोल्ड, रिकॉर्ड का ज़माना पुराना नहीं पड़ेगा." अकबर शाह के पास रिकॉर्डों का बड़ा ख़ज़ाना है, अठारह भाषाओं में गाए मोहम्मद रफ़ी के गानों से लेकर सुभाष चंद्र बोस और महात्मा गाँधी के भाषण तक सब कुछ. एक मिनट में 78 बार घूमने वाले यानी 78 आरपीएम वाले इन ग्रामोफ़ोनों पर रिकॉर्ड का एक हिस्सा सिर्फ़ साढ़े तीन मिनट चलता है लेकिन 'फ्लैशबैक' में जाने के लिए इतना समय काफ़ी है. ज़िंदगी का हिस्सा दिल्ली में पुराने संगीत के एक शौक़ीन अजय शर्मा कहते हैं, "ये ऐसा शोपीस है जो बोलता भी है, कभी दिल करता है तो इसे सुनते हुए अपने बचपन और जवानी के दिनों को याद कर लेता हूँ."
अजय शर्मा चाहते हैं कि 1934 में ख़रीदे गए ग्रामोफ़ोन को उनके बेटे भी संभालकर रखें. ग्रामोफ़ोन अपने चाहने वालों की ज़िंदगी का हिस्सा-सा बन गया है, ऐसे ही एक संगीत प्रेमी नीपेश तालुकदार कहते हैं, "ग्रामोफ़ोन हमारे परिवार के सदस्य की तरह है, क्या पुराना पड़ने पर परिवार के सदस्य को घर से निकाल देते हैं." तालुकदार अपना पुराना ग्रामोफ़ोन बेचने को कतई तैयार नहीं है. हाईफाई सिस्टम, सीडी प्लेयर और डिजिटल रिकॉर्डिंग के दौर में ग्रामोफ़ोन कहीं पीछे छूट गया है लेकिन उसका मोल पहचानने वाले कम नहीं हैं. पुरानी दिल्ली के बाज़ार में अभी भी वर्षों पुराना ग्रामोफ़ोन पाँच हज़ार से लेकर पंद्रह हज़ार रूपए तक में मिल जाता है, जितना पुराना, उतना महँगा. वैसे मरम्मत करके तैयार किए गए अपेक्षाकृत नए ग्रामोफ़ोन 800 से लेकर ढाई हज़ार तक में मिल जाते हैं. ग्राहक कई देशों में इनका निर्यात भी होता है, ग्रामोफ़ोन और पुराने रिकॉर्ड्स के शौक़ीन कनाडा, अमरीका, फिजी, पाकिस्तान, मॉरीशस जैसे देशों से आकर पुरानी दिल्ली में भटकते हैं.
रिकॉर्ड की क़ीमत उसकी दुर्लभता के हिसाब से तय होती है, पचास रूपए से लेकर हज़ारों तक. पुराने रिकॉर्डों की एक दुकान की मालकिन कृष्णा राजपाल कहती हैं, "हमें इन्हें जितना सहेजकर रखना पड़ता है, उसके हिसाब से हमें इसकी क़ीमत नहीं मिल पाती. वैसे शौक़ की कोई क़ीमत होती भी नहीं." ग्रामोफ़ोन की मशीनरी कोई ज़्यादा पेचीदा नहीं लेकिन पुर्ज़े मुश्किल से मिलते हैं, पिछले कई दशकों से रिकॉर्डों का उत्पादन भी बंद है लेकिन लोगों का शौक़ क़ायम है. ग्रामोफ़ोन के आविष्कारक थॉमस एल्वा एडिसन ने इसका पेटेंट कराते समय शायद मज़ाक में कहा था कि "इस मशीन की कोई ख़ास उपयोगिता नहीं है." लेकिन अजय शर्मा और नीपेश तालुकदार जैसे ग्रामोफ़ोन-प्रेमियों की एक बिरादरी है जो 125 वर्ष बाद भी ग्रामोफ़ोन के आविष्कारक की बात को झुठला रही है. |
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