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गुरुवार, 10 जून, 2004 को 11:06 GMT तक के समाचार
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जैसे सूफ़ी का अपने इष्टदेव को पुकारना

सहगल
उनकी सोज़भरी आवाज़ साज़ की कमी को पूरा करती थी
सहगल से मेरा परिचय बचपन में ही हो गया था.

मेरी मां अकसर सहगल के गीत गुनगुनाया करतीं और घर में 'न्यू थियेटर्स' की फ़िल्मों की चर्चा होती. 'न्यू थियेटर्स' से ही सहगल ने अपना फ़िल्मी सफ़र शुरु किया था.

'जब दिल ही टूट गया', 'करूं क्या आस निरास भई', 'सोजा राजकुमारी सोजा' और 'दो नैना मतवारे तिहारे' जैसे गीत, मैंने छुटपन में ही सीख लिये थे, लेकिन सहगल के संगीत की गहराई समझ में आई थोड़ा बड़ा होने पर.

सोज़भरी आवाज़

वैसे साठ के दशक तक सहगल की शैली पुरानी पड़ चुकी थी, नए संगीतकारों, नए गायकों का बोलबाला था, ऑर्केस्ट्रा हावी हो चुका था.

जब सहगल गाते थे तो ऑर्केस्ट्रा के नाम पर हारमोनियम, सारंगी तबला जैसे दो तीन साज़ हुआ करते थे लेकिन उनकी सोज़भरी आवाज़ सारी कमी पूरी कर देती थी.

जब भी मैं रेडियो पर उनके गीत सुनती तो उनका असर कहीं बहुत गहरे होता.

सहगल की आवाज़ में एक अजब सी टीस थी, वो जो कुछ गाते पूरी तरह डूब के गाते, जैसे कोई सूफ़ी सन्त अपने इष्टदेव को पुकार रहा हो.

भले ही अभिनय और गायन उनका पेशा रहा हो, लेकिन संगीत उनका जीवन था उनकी आत्मा थी.

ग़ज़लों का बादशाह

सहगल को ग़ज़लों का बादशाह कहा जाता है.

ये कहना ग़लत न होगा कि उन्होने फ़िल्मों के ज़रिए ग़ज़लों को लोकप्रिय बनाया.

पार्श्वगायक मुकेश ने शुरु की ग़ज़लों में सहगल की ऐसी नक़ल की, कि सुनने वाले को भी भ्रम हो जाये कि कहीं सहगल ही तो नहीं गा रहे.

सुप्रसिद्ध संगीतकार अनिल बिस्वास ने एक बार कहा था कि जब मुकेश उनके पास आए तो वो दूसरे सहगल बनना चाहते थे. 'दिल जलता है तो जलने दे...' ग़ज़ल गाकर उन्होने ये भी साबित कर दिया.

ग़ज़ल गायकी में सहगल की वही जगह है, जो उर्दू शायरी में ग़ालिब की है.

आज ग़ज़ल गायकी इतनी लोकप्रिय हो चुकी है कि लगभग हर कलाकार ग़ज़ल गाना चाहता है, लेकिन इसके लिये उर्दू शायरी को समझना और अपनी गायकी से ग़ज़ल के जज़्बात पेश कर पाना शायद सब के बस की बात नहीं.

उसके लिये सहगल का दिल और सहगल की आत्मा चाहिए.

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