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गुरुवार, 10 जून, 2004 को 02:04 GMT तक के समाचार
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कर्नाटक संगीत में डूबा ज़ुलु युवक

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कठिन साधना करनी पड़ी पैट्रिक को
दक्षिण अफ़्रीकी ज़ुलु युवक पैट्रिक न्कोबो ने साबित कर दिखाया है कि संगीत की कोई भौगोलिक या भाषाई सीमा नहीं होती.

भारत से हज़ारों मील दूर दक्षिण अफ़्रीका में रहते हुए उन्होंने दक्षिण भारतीय शास्त्रीय संगीत में न सिर्फ़ दिलचस्पी ली, बल्कि महारत भी हासिल की है.

लेकिन इस मुकाम तक वो आसानी से नहीं पहुँचे.

जब उन्होंने कर्नाटक संगीत सीखने फ़ैसला किया तो डरबन में उनके दोस्तों ने उनका मज़ाक उड़ाया.

पैट्रिक के दोस्तों को यह बात पची नहीं कि कैसे नटाल प्रांत की लड़ाकू ज़ुलु जाति का एक लड़का भारतीय शास्त्रीय संगीत सीखेगा.

 पालथी मार कर घंटो बैठा रहना आसान नहीं था. अफ़्रीका में खान-पान की आदतों के कारण हमारी हड्डियाँ कड़ी हो गई हैं. मैंने किसी तरह बैठे रहना सीख लिया है, लेकिन अब भी गाते समय गद्दे का सहारा लेना पड़ता है.

लेकिन इन खिल्ली उड़ाए जाने और ताने मारे जाने पर ध्यान नहीं देते हुए पैट्रिक ने कर्नाटक संगीत सीखना जारी रखा.

और आज यह 37 वर्षीय ज़ुलु युवक सात भारतीय भाषाओं में गा सकता है.

एक राग से दूसरे राग तक वह बिना झटके के पहुँच जाते हैं.

येसुदास का असर

पैट्रिक न्कोबो के मन में भारतीय संगीत सीखने की ललक तब जगी, जब उन्होंने दक्षिण भारत के प्रमुख शास्त्रीय गायक डॉ. केजे येसुदास का एक गाना सुना.

वह कहते हैं, "मैंने ऐसा संगीत पहले नहीं सुना था. उस आवाज़ में बँध कर मैं जैसे किसी दूसरी दुनिया में जा पहुँचा. मैंने गाने की यह शैली सीखने की ठानी और येसुदास से मिलना मेरा सपना बन गया."

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येसुदास अपने शिष्य की तारीफ़ करते थकते नहीं

भाग्य ने पैट्रिक का साथ दिया जब 1990 के दशक के शुरू में येसुदास डरबन में एक कार्यक्रम में गाने के लिए पहुँचे.

पैट्रिक की गायन प्रतिभा से प्रभावित होकर येसुदास ने उसे प्रशिक्षण का प्रस्ताव दिया, बशर्ते वह चेन्नई पहुँच सके.

एक ग़रीब परिवार के युवक के लिए विदेश यात्रा आसान नहीं थी.

पैट्रिक कहते हैं, "मेरे पास पैसा नहीं था. न ही भारत में मेरा कोई दोस्त या रिश्तेदार था. लेकिन कुछ लोगों की मदद से मैं चेन्नई जा पहुँचा. इसके बाद तो तीन साल तक मेरा अपने परिवार से कोई संपर्क नहीं रहा."

कठिन साधना

चेन्नई प्रवास भी पैट्रिक के लिए आसान नहीं था.

लेकिन कर्नाटक संगीत सीखने के लिए उन्होंने जितना हो सकता था, किया. उन्होंने सात्विक जीवन अपनाते हुए माँस-मछली, शराब सब छोड़ दिया और औरतों से दूर रहे.

वह कहते हैं, "पालथी मार कर घंटो बैठा रहना आसान नहीं था. अफ़्रीका में खान-पान की आदतों के कारण हमारी हड्डियाँ कड़ी हो गई हैं. मैंने किसी तरह बैठे रहना सीख लिया है, लेकिन अब भी गाते समय गद्दे का सहारा लेना पड़ता है."

दक्षिण भारतीय भाषाएँ सीखने में उन्हें मुश्किलें आईं, ख़ास कर सही उच्चारण सीखने में.

 एक कीर्तन के बोल सीखने में मुझे छह महीने लगे थे. लेकिन अंतत: मैंने भाषाएँ सीख ली.

उन्होंने कहा, "मैं पाँच बजे सुबह से मध्य रात्रि तक अभ्यास करता रहता था. एक कीर्तन के बोल सीखने में मुझे छह महीने लगे थे. लेकिन अंतत: मैंने भाषाएँ सीख ली."

येसुदास अपने शिष्य से बहुत ख़ुश हैं.

चेन्नई से बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, "शुरू से ही मैं उसकी कड़ी मेहनत और दृढ़ इच्छाशक्ति से प्रभावित रहा हूँ."

येसुदास के अनुसार पैट्रिक ने दिखा दिया कि समर्पण भाव से लगे रह कर कुछ भी सीखा जा सकता है.

सपना

चेन्नई में सफल प्रशिक्षण के बाद पैट्रिक 1996 में दक्षिण अफ़्रीका लौट आए और अपनी गायकी का सार्वजनिक प्रदर्शन किया.

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कर्नाटक संगीत की महानता का गुणगान

उन्होंने ज़ुलु गीतों को भारतीय रागों पर आधारित संगीत देने का काम भी किया है.

लेकिन दक्षिण अफ़्रीका में बसे 12 लाख भारतीय मूल लोगों की आबादी से उन्हें ज़्यादा प्रोत्साहन नहीं मिला.

पैट्रिक कहते हैं, "कर्नाटक संगीत सीखने वाला पहला अश्वेत व्यक्ति होने के नाते मुझे प्रोत्साहन की अपेक्षा थी. ये कहते हुए निराशा होती है कि मुझे दक्षिण अफ़्रीका में गायकी के प्रदर्शन का कम ही मौक़ा लगता है."

उन्हें बोत्सवाना जैसे देशों में गाने का मौक़ा मिलता है लेकिन उनकी संगीत की भूख मिटाने के लिए ये काफ़ी नहीं है.

सात सदस्यीय परिवार में सबसे बड़े होने के कारण उनकी और भी ज़िम्मेदारियाँ हैं.

वो बाग़वानी में दक्ष हो चुके हैं और टैक्सी भी चलाते हैं.

लेकिन वो किसी पौधे की छँटाई कर रहे हों या टैक्सी चला रहे हों, संगीत हमेशा उनके मन में रहता है.

और पैट्रिक का सपना है- दुनिया भर में घूम-घूम कर गाना और कर्नाटक संगीत की महानता को दिखाना.

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