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'हिंदी रंगमंच पीछे छूटता जा रहा है' | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
नसीरुद्दीन शाह के लिए नाटक और फ़िल्म, दोनों ही बहुत महत्व के हैं और इसलिए वह साफ़ तौर पर कभी भी तय नहीं कर पाते हैं कि दोनों में से अगर किसी एक को चुनना हुआ तो वह किसके साथ जाएंगे. पर दिल में तो नाटक ही है और इसीलिए नसीर कहते हैं कि जब तक लोगों को आपस में बातचीत करने की ज़रूरत महसूस होगी, रंगमंच तब तक ज़िंदा रहेगा. दोनों ही विधाओं में नसीर के काम का लोहा दुनिया भर में लोग मानते हैं. 1975 में निशांत नाम की फ़िल्म से अपना सफ़र शुरू करने वाले नसीर को रंगमंच का एक बड़ा नाम माना जाता है पर ऐसा नहीं है कि उन्होंने फ़िल्में कम की हैं. नसीर अब तक 114 फ़िल्मों में काम कर चुके हैं और करीब छह फ़िल्मों में छोटी-बड़ी भूमिकाओं के साथ वो 2006 तक पर्दे पर आएंगे. हालांकि रूपहले पर्दे पर वो अब कम ही नज़र आते हैं और इन दिनों दिल्ली में वे कथा कोलाज नाम का नाटक कर रहे हैं. अभी पिछले दिनों उन्होंने दिल्ली में एक संवाददाता सम्मेलन में पूछे गए कुछ सवालों के जवाब दिए. आप पिछले कुछ अर्से से रंगमंच में हिंदी की कहानियों को लेकर काम कर रहे हैं और उनको लेकर बहुत आकर्षित दिखते हैं, क्या वजहें हैं. जब लोग मुझसे पूछते थे कि आप अंग्रेजी में ही नाटक क्यों करते हैं, हिंदी में क्यों नहीं करते तो मैं हमेशा कहता था कि मैं तो अंग्रेजी को भी भारतीय भाषा मानता हूँ. अब हिंदी तो नहीं कहूँगा, हिंदुस्तानी भाषा में नाटक कर रहा हूँ. मैंने पाया कि नाटक दो तरह के हैं. एक तो वो, जो पहले कई बड़े निर्देशक कर चुके हैं और काफ़ी अच्छा काम हुआ है और दूसरे वो जो अनुवादित हैं. मुझे इन दोनों से ही परहेज है. मैं इसीलिए कुछ कहानियों पर काम कर रहा हूँ. इससे पहले मंटो और इस्मत चुगताई की कहानियों का मंचन कर चुका हूँ. इस बार कामता प्रसाद और प्रेमचंद की कहानियां लेकर दिल्ली आया हूँ. इसके बाद हरिशंकर परसाई के लेखों पर भी काम करना है जो इसी वर्ष सितंबर तक तैयार हो जाएगा. पिछले दिनों दिल्ली में जिन्ना पर आधारित एक नाटक के प्रदर्शन को रोक दिया गया, इसे आप कितना सही मानते हैं. मैं इसे ग़लत मानता हूँ और ऐसा तो हर तरफ़ हो रहा है. यहाँ तक कि अमरीका में भी आतंकवादी हमलों पर बनी फ़िल्म 9/11 के प्रदर्शन को प्रतिबंधित किया गया जबकि वो लोकतंत्र के सबसे बड़े पैरोकार बनते हैं. फिर अगर किसी ने अपने नाटक के माध्यम से जिन्ना को अच्छे या बुरे रूप में दिखाया भी है तो यह एक तरह का विचार हो सकता है और लोगों को इसे सामने रखने की आज़ादी होनी ही चाहिए. भारत में कला फ़िल्मों का बनना क्यों कम हो गया है. मुझे नहीं मालूम, ये सवाल तो बनाने वालों से उठाना चाहिए. मैं इस पर क्या कह सकता हूँ. रंगमंच के लोग क्यों बॉलीवुड की ओर जा रहे हैं और नाटक करना क्यों एक संघर्षों और अभावों भरा जीवन चुनने जैसा हो गया है. रंगमंच में अभाव तो है ही. नाटक हमेशा ही लोगों के वित्तीय सहयोग से चला है. यहाँ तक कि शैक्सपियर को भी अगर लोगों से आर्थिक मदद न मिलती तो शायद वो इतना काम न कर पाते. अगर व्यावसायिक रंगमंच को छोड़ दें तो नाटकों के लिए अपना खर्च निकालना हमेशा एक चुनौती रहा है. बड़ी संस्थाओं को इसे मदद देने के लिए आगे आना चाहिए पर वो नाटक की कथावस्तु की कीमत पर न हो, ऐसा ध्यान रखना होगा. अपने स्तर पर देखता हूँ तो पाता हूँ कि सिवाय एक अच्छे प्रदर्शन के और अपने काम के साथ पूरी ईमानदारी के मेरी ओर से और कुछ भी योगदान जैसा नहीं दिया जा सकता है.
आज के दौर में सिनेमा और रंगमंच, दोनों को किस रूप में देखते हैं. देखिए, रंगमंच एक जीवंत संवाद का ज़रिया है. मैंने फ़िल्में भी की हैं पर मैं हीरो की छवि से पहले एक रंगकर्मी था और आज भी हूँ. तमाम लोग तो फ़िल्मों से रिटायर होकर नाटकों की तरफ़ चलते हैं और ऐसा हो भी रहा है पर मैं रंगमंच से फ़िल्मों की तरफ़ गया. नाटक मैं हमेशा करता रहा, नाटकों से ही शुरुआत की और आज भी नाटक कर रहा हूँ. फिलहाल फ़िल्में इसलिए नहीं कर रहा हूँ क्योंकि मेरे पास फ़िल्मों के प्रस्ताव नहीं हैं. जो हैं वो दोस्तों की हैं जैसे पंकज पराशर की 'बनारस' और रजत कपूर की 'मिक्स्ड डबल्स'. पर कभी फ़िल्म और रंगमंच में से एक को चुनने का सवाल होता है तो यह तय कर पाना मुश्किल हो जाता है कि किसे चुनूँ. बॉलीवुड को अंतरराष्ट्रीय विस्तार मिल रहा है पर कहाँ है रंगमंच इसकी तुलना में. बॉलीवुड के विस्तार की केवल हवा ही है पर ऐसा दमखम मुझे दिखाई नहीं देता. अगले एक साल में अगर इन्होंने अपना स्तर नहीं सुधारा तो औंधे मुँह गिर सकते हैं. ये चमक बहुत समय तक नहीं रहेगी अगर गुणवत्ता अंतरराष्ट्रीय मानकों के मुताबिक नहीं हुई. रही बात नाटकों की तो उन्हें अंतरराष्ट्रीय होने के बजाय अपने ही लोगों के करीब होने की ज़्यादा ज़रूरत है. रंगमंच में बड़े पैमाने पर रंगकर्मियों को काम करना चाहिए और अपने काम को विस्तार देना चाहिए. छोटे पर्दे पर मिर्ज़ा ग़ालिब जैसे नाटक में आपने काम किया है पर उसके बाद दिखाई नहीं दिए. क्या वजहें थीं. उस तरह का काम करने के लिए निर्देशक आगे नहीं आ रहे हैं. मुझे भी लगता है कि इस तरह के काम होने चाहिए क्योंकि ग़ालिब पर बने धारावाहिक को लोगों ने ख़ासा पसंद किया था. क्या आपको नहीं लगता कि रंगमंच अब बड़े लोगों का शौक बनता जा रहा है. पंचसितारा होटलों में महंगे टिकटों के साथ शो हो रहे हैं पर आम लोगों के बीच न के बराबर. मैं इससे सहमत नहीं हूँ क्योंकि इससे रंगमंच सीमित नहीं हुआ है. मैं छात्र जीवन में देखता था कि नाटकों के सुपरहिट शो होते थे पर अब ऐसा नहीं होता. असल बात तो यह है कि अब लिखने और करने वालों की कमी है. जो उच्चवर्ग के लिए काम कर रहे हैं उनके अलावा भी रंगमंच हमेशा हुआ है और होना चाहिए. क्या वजहें हैं कि मुंबई में रंगकर्म, दिल्ली के रंगमंच से कहीं बेहतर हालत में है. मैं इसकी वजह आज भी नहीं समझ पाया हूँ. वहाँ हफ्ते के किसी भी दिन 20 से भी ज़्यादा नाटक हो रहे होते हैं और यहाँ तो नाटक अपना खर्च तक नहीं निकाल पाते. हिंदी में तो लिखने वालों की भी कमी है. अच्छी पटकथाएं लिखी ही नहीं जा रही हैं. इतने अच्छे कहानीकार है, उपन्यासकार हैं पर नाटककार क्यों नहीं हैं. एक वजह यह भी हो सकती है कि ऐसे लेखकों ने फ़िल्म जगत का रुख़ कर लिया. हिंदी के तमाम बड़े लेखक मुंबई में बैठकर फ़िल्मों के लिए लिखते रहे क्योंकि शायद मंच प्रभावी थे ही नहीं लेकिन दूसरी भाषाओं में ऐसा नहीं हुआ और मराठी रंगमंच इसका सशक्त उदाहरण है. |
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