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कबीर बेदी दिल्ली लौटना चाहते हैं | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
बहुमुखी प्रतिभा वाले अभिनेता कबीर बेदी की ख़्वाहिश है कि वह एक बार फिर से दिल्ली की गलियों में अपनी ज़िंदगी गुज़ार सकें तो अपनी मिट्टी से नाता संपूर्ण जैसा हो जाएगा. ग़ौरतलब है कि कबीर बेदी की पैदाइश और परवरिश दिल्ली में ही हुई है और दिल्ली ने ही उन्हें कठिन समय से गुज़रते हुए एक प्रतिभाशाली अभिनेता के रूप में उभरते हुए देखा है. बाद के दिनों में कबीर के अभिनय का सिक्का ना केवल मुंबई फ़िल्म नगरी में चला बल्कि उन्होंने अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म जगत में भी अपने जलवे दिखाए. अभिनय के इन्हीं मुकामों को तय करते कबीर का समय इसके बाद मुंबई से लेकर यूरोप के विभिन्न शहरों में बीतता रहा है, लेकिन गाहे-बगाहे दिल्ली की याद उनके ज़हन में तैर जाया करती है. लंदन में बीबीसी के साथ बातचीत में कबीर बेदी ने, अपने बारे में, अपनी फ़िल्मों और अभिनय के बारे में खुलकर बात की. "दिल से और असलियत में दिल्लीवाला हूँ. दिल्ली की यादें हमेशा मेरे साथ रही हैं और ज़िंदगी भर रहेंगी. दिल्ली के व्यंजनों का मुझे काफ़ी शौक है क्योंकि वे सिर्फ़ खाने के लिए ही नहीं हैं बल्कि वे मेरे बचपन की याद भी दिलाते रहते हैं."
मिलकर लगा कि कबीर बेदी की अनूठी क़द-काठी और रौबदार आवाज़ सचमुच बिना किसी ख़ास कोशिश के ही उनकी शख़्सियत बयान कर देते हैं. कबीर बेदी भारत के ऐसे गिने-चुने अभिनेताओं में से हैं जिन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई है लेकिन अपनी सरज़मीं यानी दिल्ली से आज भी नाता जोड़े हुए हैं और ख़्वाहिश रखते हैं कि एक दिन फिर से दिल्ली लौट सकें. कबीर बेदी लंदन के वेस्ट एंड में एक संगीत नाटक - 'फ़ॉर पवेलियन' में ख़ान साहब की प्रभावशाली भूमिका निभा रहे हैं जिसे लेकर वह न सिर्फ़ उत्साहित हैं बल्कि संतुष्ट भी हैं. कबीर बेदी कहते हैं कि इस भूमिका ने सचमुच उन्हें अपनी अभिनय प्रतिभा निखारने का मौक़ा दिया है, "ख़ान साहब की भूमिका में समझिए की इस संगीत नाटक की रूह है." बेदी मानते हैं कि थियेटर में काम करना एक अभिनेता के लिए बहुत ज़रूरी है और बहुत संतुष्टि देने वाला भी है. "फ़िल्मों में तो कई बार में किसी दृश्य की शूटिंग पूरी होती है और कई बार तो कहानी के बीच-बीच में से ही शूटिंग होती रहती है और रिहर्सल करने का भी काफ़ी मौक़ा मिलता है इसलिए वह माध्यम बिल्कुल अलग है." बेदी कहते हैं, "थियेटर में रिहर्सल की बिल्कुल गुंजाइश नहीं होती और अभिनेता को अपनी प्रतिभा और क़ाबलियत साबित करनी होती है, थियेटर में एक भावनात्मक सफ़र चल रहा होता है जिससे उच्च दर्जे की पेशेवर संतुष्टि मिलती है." कबीर बेदी कहते हैं कि फ़िल्मों में तो एक दृश्य के लिए कई बार शूटिंग हो सकती है लेकिन थियेटर में रिहर्सल की बहुत अहमियत होती है क्योंकि दर्शकों के सामने अभिनय करने में ग़लती की कोई गुंजाइश नहीं होती है. ताजमहल कबीर बेदी नई फ़िल्म ताजमहल में बूढ़े शाहजहाँ की मुख्य भूमिका को लेकर काफ़ी उत्साहित हैं और इसे अपने अभिनय जीवन का एक बहुत अहम किरदार बताते हैं.
अपने किरदार के बारे में उन्होंने कहा कि औरंगज़ेब ने सियासत अपने हाथ में लेने के बाद शाहजहाँ को आगरे के क़िले में क़ैद कर लिया जहाँ की खिड़की से अपने अंतिम दिनों में वे ताजमहल को देखा करते थे और यहीं वे जहाँआरा को अपनी कहानी सुनाते हैं. "मेरे अभिनय जीवन के बहुत ही बढ़िया किरदारों में से एक है. इस किरदार के साथ अगर मेरा नाम जुड़ जाए तो मैं समझूँगा कि मैंने उच्च दर्जे की कामयाबी हासिल की है." कबीर बेदी बताते हैं कि उनकी तमन्ना एक आर्किटैक्ट बनने की थी लेकिन उस वक़्त परिवार के कुछ हालात ऐसे थे कि कॉलेज की पढ़ाई के लिए फीस भरने के लिए कुछ काम भी करना पड़ा. "इसलिए मैंने दिल्ली सेंट स्टीफ़ेंस कॉलेज में इतिहास में स्नातक उपाधि के लिए दाख़िला लिया और साथ-साथ आकाशवाणी और दूरदर्शन में भी काम करना शुरू किया जिससे कुछ आमदनी हो जाती थी." कबीर बेदी बताते हैं कि बस वहीं से फ़िल्मी करियर शुरू हुआ. इसके अलावा वह थियेटर तो करते ही रहते थे. जब कबीर बेदी से यह पूछा गया कि अब और क्या ख़्वाहिश और तमन्ना बाक़ी है करने की तो उनका जवाब था कि वह फिर से दिल्ली जाकर बसने की तमन्ना रखते हैं. "मेरी ज़िंदगी का सफ़र दिल्ली से शुरू हुआ और मेरी तमन्ना है कि वहीं जाकर ख़त्म हो. बस मुझे उस घड़ी का इंतज़ार है जब यह तमन्ना पूरी होगी, बस तभी ख़ुद को मुक़म्मल समझूंगा." कबीर बेदी कुछ और भी अंतरराष्ट्रीय फ़िल्मों में काम कर रहे हैं. |
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