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शनिवार, 09 अप्रैल, 2005 को 11:39 GMT तक के समाचार
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संगीत के रस में सराबोर हुई दिल्ली

संगीत समारोह
संगीत समारोह में दोनों देशों के कलाकारों ने लोगों को मुग्ध किया
नेहरू पार्क की हरी-भरी घास का गलीचा, पेड़ों की कुँज छाँव और सुरों के सागर में श्रोताओं को डुबोता सफेद-बसंती रंगों से सजा एक खुला मंच, राजधानी में कुछ इस तरह भक्ति उत्सव की शुरुआत हुई.

पर नाम पर मत जाइए.

‘अवध मा बाजेला बधइया’ की छन्नूलाल मिश्र की बनारस के रस में डूबी स्वर लहरी के साथ-साथ सीमा पार से आए ‘कलाम-ए-बाहू’ और ‘बुल्ले की जाणाँ मैं कौन’ की भी अपनी धूम थी जिसमें लोग झूम रहे थे.

भक्ति उत्सव केवल हिंदू धार्मिकता के इर्द-गिर्द नहीं है. बाहू से लेकर शाह हुसैन तक और कबीर-तुलसी के निर्गुन-सगुन से लेकर तमाम पारंपरिक और लोक संगीत को अपने में समेटे है यह उत्सव.

आठ से 10 अप्रैल तक चलने वाले इस संगीत समारोह में पाकिस्तान और भारत के कई क्षेत्रों से अपनी लोक धुनों को लेकर कलाकार शिरकत कर रहे हैं.

कार्यक्रम का आयोजन, राजधानी के बाकी ऐसे आयोजनों से अलग आम लोगों के लिए खुला है और वो इसका लुफ़्त बिना किसी टिकट के उठा सकते हैं. इससे कार्यक्रम सुनने ऐसे तमाम लोग भी पहुँचे जो इन सूफ़ियों-संतों के सबसे करीब तो रहा है पर इन दिनों इनके कलाम से वंचित ही है.

‘जिस दे अंदर इश्क न रचया’

समारोह के पाकिस्तान से आए सूफ़ी गायक इकबाल बाहू तो महान सूफ़ी संत हजरत बाहू का कलाम गाते-गाते ख़ुद इसी उपनाम से जाने जाने लगे.

 संगीत सरहदों का मोहताज नहीं. सबसे बड़ा मजहब मोहब्बत है, इससे ऊपर और कुछ भी नहीं है. आज तमाम सूफ़ी संत और उनका कलाम ज़िंदा है क्योंकि उन्होंने मोहब्बत को ही अपना मजहब माना
इक़बाल बाहू, पाकिस्तानी गायक

बीबीसी से अपनी ख़ास बातचीत में इकबाल बताते हैं, “संगीत सरहदों का मोहताज नहीं. सबसे बड़ा मजहब मोहब्बत है, इससे ऊपर और कुछ भी नहीं है. आज तमाम सूफ़ी संत और उनका कलाम ज़िंदा है क्योंकि उन्होंने मोहब्बत को ही अपना मजहब माना.”

और हमें ऐसा ही कुछ एक मजहब यहाँ पहुँचे लोगों का भी समझ आया. हर श्रोता संगीत और स्वरों के इस विविधता भरे सागर में डूब-उतर रहा था.

होता भी कुछ ऐसा ही है- ‘जो उतरा सो डूब गया, जो डूबा सो पार’.

पर सबसे बड़ी ख़ासियत तो यह रही कि तमाम नामचीनों को इस समारोह में बुलाने के बजाय ऐसे कलाकारों को महत्व दिया गया है जो ज़मीन के ज़्यादा करीब हैं और भले ही अख़बारों की सुर्खियाँ न बन पाते हों पर अपनी परंपराओं को सही मायने में आगे ले जाने में लगे हैं.

सातों सुर, सैकड़ों ताल

फिर वो कल्पिनी कोमकली के मालवी भजन हों और या फिर भगवती प्रसाद गंधर्व का हवेली संगीत, बॉम्बे जयश्री का कर्नाटक भक्ति संगीत हो और या फिर केशवराव बंधे और सत्यशील देशपांडे का मराठी संगीत.

पर लोगों की आँखें टिकी थीं इकबाल बाहू के अलावा पाकिस्तान से आए पारंपरिक भजनों के गायक कृष्णलाल भील और पाकिस्तान से ख़ास अंदाज़ की सूफ़ीयाना कव्वाली लेकर आए फ़रीद अयाज़ अल हुसैनी बंधुओं पर.

फिर तबले की थाप और सारंगी, पखावज, मृदंग, मंजीरे की धमक पर लोग ख़ुद-ब-ख़ुद सुरों और सरगमों के साथ ताल मिलाने लगे.

कानों में जो भी संगीत और आवाज़ पहुँची, सबके पीछे एक ही भाव दिखा-

भरे खजाने रब दे, जो भावे सो लूट.....

और समझ में आया कबीर का कलाम-

साहेब मेरा एक है, दूजा कहा न जाए....

चैत की बयार में सबने संगीत का रस छक कर पिया. इससे अच्छा माहौल और मौसम क्या हो सकता है.

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