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मेहदी हसन में संगीत ललक आज भी है | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
ग़ज़ल सम्राट मेहदी हसन की उंगलियों में हारमोनियम पर चलने जैसी जुम्बिश आज भी वैसी ही है जैसी उनकी आँखों में संगीत की ललक मगर... इस समय लकवे के कारण ये उंगलियां थोड़ी ठहर सी गई हैं. मेहदी हसन दिल्ली के एक आयुर्वेदिक अस्पताल में लकवे का इलाज करा रहे हैं, उसी मौक़े पर हमें उनसे मुलाक़ात का मौका मिला. व्हील चेयर पर बैठे 'केसरिया बालम' सुनते मेहदी हसन की ज़ुबान अब लकवे की वजह से लड़खड़ाने लगी है, जो उगलियाँ कभी हारमोनियम पर बिजली की तरह दौड़ती थीं, आज टेढी दिखने लगी हैं, पर संगीत को लेकर जो ललक, जो तलाश उनकी तरल आँखो में पहले नज़र आती थी, वह आज भी मौजूद है. 1927 में लूना राजस्थान में पैदा हुए मेहदी हसन से मिलने जब हम हस्पताल पहुँचे तो लगा, एक साथ कितने बरस जी उठे. कितनी पीढ़ियों ने अपनी कितनी रातें, अपने कितने सपने उनकी ग़ज़लों के साथ बुने हैं. मैंने जब उनसे पूछा कि राजस्थान में पैदा होकर फिर पाकिस्तान में रहना हुआ तो अब हिंदुस्तान के साथ कौन सी यादे जुड़ी हैं, तो उनके होंठो पर हल्की मुस्कुराहट आई और आँखे पुरानी यादों में खो सी गईं. कहा, हिंदुस्तान में तो हमारी सोलह पुश्तें रही हैं, तो यहाँ से बहुत सारी यादें जुड़ी हैं. यहाँ का मांड मुझे बहुत पंसद है. और इस बात का सबूत ये था कि मैं अब भी मांड ही सुन रहा था - केसरिया बालम पधारो म्हारे देस........ लंबी फ़ेहरिस्त मेहदी हसन की ग़ज़लों में उनकी मनपंसद कौन सी है, ये पूछने के साथ ही वो हँसने लगते है. कहते हैं कि इतनी लंबी फ़ेहरिस्त में किसको मनपंसद कहा जाए.
पर सरहदों के आर-पार मेहदी साहब की ग़ज़लों को पंसद करने वालों की कमी नहीं और सभी लोगों की अपनी-अपनी पंसद! तो क्या मुल्कों को बाँटने वाली सरहदें बेवजह हैं? मेहदी हसन कहते हैं, हाँ बेकार की चीज़े हैं ये सरहदें, पर जो अल्लाह को मंज़ूर होता है वही होता है. भारत-पाकिस्तान के बीच सीमाएँ सच्चाई है पर इन सीमाओं में बंधे लोगों को जोड़ने के लिए जो क्रिकेट सीरिज़ हो रही है उसके बारे में वो क्या सोचते हैं. क्या क्रिकेट का शौक है उन्हे? मेहदी साहब बच्चों की तरह चहक कर कहते हैं, बिल्कुल, सभी मैच देखता हूँ. पर किसकी जीत की दुआ करते हैं, जिस देश में जन्म लिया या जहाँ बाक़ी जीवन बिताया? कुछ देर के लिए थोड़ी असमंजस की स्थिति रही, फिर कहते हैं कि जीत की दुआ अपने क़ौम की करता हूँ, कि अल्लाह उन्हें जीत दे. लंबी बातचीत हो गई थी, थकावट उनके चेहरे पर झलकने लगी तो आख़िर में हमने पूछा कि भारत में सुनने वालों के लिए क्या संदेश देंगे. उन्होंने कहा, अपने रास्ते से न हटें, कामयाबी ज़रूर मिलेगी. उनसे विदा लेने का वक़्त आ गया था, पर हर समय की तरह, उनसे बातें करते हुए जी नहीं भरा था. उनकी लंबी उम्र की दुआ मांगते हुए और उनकी ग़ज़लों को याद करते हम भी निकल आए. |
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